लेखक: आशुतोष अस्थाना
ख़ुशी का ठिकाना नहीं
था, उस किलकारी से मन गद-गद हो उठा था . आशाओं का महल सजना शुरू होगया था, एक
चिराग मिल गया था. “बुढ़ापे की लाठी” मिल गई, जीवन साकार होगया. लालन-पालन का दौर
चला और उस माँ ने अपना दूध पिलाया, आशा थी वो क़र्ज़ उतारेगा, अपनी नींद, अपनी
खुशियाँ, अपना जीवन सब न्योछावर कर दिया. आखिर उस माँ से ही तो निकला था वो, उसी
का तो अंश था. पिता ने भी कोई कम बलिदान नहीं दिया, खून का कतरा-कतरा उसके नाम
करदिया. उस पिता के खून-पसीने से मिल कर ही तो वो पलना आया था घर में, जिसमें लेट
कर वो बड़ा हुआ था. बाकियों से ज़्यादा दुलार और प्यार मिला उसे, गलतियों को ढक दिया
जाता, आखिर वो बेटा था, वोही माता-पिता के बुढ़ापे का सहारा था. हर सुख, हर सुविधा,
हर आराम दिया जाता उसे, विशेष ध्यान रखा जाता उसका, बेटा जो था!!
फरमाईशों का दौर
शुरू हुआ, आशाओं का महल बनने लगा. माँ मुझे ये चाहिए, बाबा मुझे वो चाहिए.
उसके खातिर माता-पिता ने अपना खून-पसीना, सुख,चैन सब त्याग दिया. बच्चा बड़ा होता
गया, स्कूल से कॉलेज में पंहुच, अपनी नज़रो में वो बड़ा होगया था, खुद सही-गलत का
निर्णय लेने लगा था जैसे समझदारी की एक लहर-सी दौड़ गई हो उसमें. क्या करना ह और
क्या नहीं, कहा जाना है और कहा नहीं, इन सभी चीजों का निर्णय वो खुद से लेने लगा
था, वैसे इसमें कोई बुराई भी नहीं थी लेकिन!!........बात बिगड़ना तब शुरू हुई जब वो
अपने आप को सबसे बड़ा समझने लगा था, माता-पिता से भी बड़ा!!
वो ये समझने लगा था
की मैंने समस्त दुनिया देख ली है, मेरा अनुभव उनसे ज़्यादा बढ़ गया है. वो ये समझने
लगा था की माता-पिता पुराने ज़माने के है, वे मूर्ख हैं जिन्हें दुनिया के बारे में
कुछ नहीं पता. वो ये नहीं समझ पारहा था की उसकी उम्र के साथ उसके माता पिता की भी
उम्र बढ़ रही है, जितनी उसकी उम्र थी उससे ज्यदा उनके पास दुनिया का तजुर्बा था.
बस यही से दूरियों
की शुरुआत हुई!!
सम्मान से झुका सिर
और डर से झुकी आँखें अब उठने लगी थीं. यह सत्य उसे चुभने लगा था कि वो उन्ही का
अंश है. उनके साथ रहने में उसे घुटन होने लगी थी. वो उनसे दूर होने लगा था. जब
नशा और गलत संगत दोस्ती का हाथ बढ़ाते हैं तो हाथ पीछे लेजाना मुश्किल होजाता है और
यही दो मित्र उसे अपने माता-पिता से दूर लेजा रहे थे. उनके खून पसीने की कमाई को
वो बहाता चला गया, रिश्तों में दरार आती चली गई. पिता उसपे हाथ उठाता, वो उन हाथों
को पकड़ लेता, हालात खराब हुए........एक दिन उसने पिता पे हाथ उठा दिया!!! “आप” तुम
बन गया, “तुम” को “तू” बनते देर नहीं लगी. पिता के सामने अकड़ आने लगी, सीना तन
गया.....लेकिन पिता का नहीं......सिर झुक गया......लेकिन आदर में नहीं, शर्म में,
लाचारी में!! आखिर जिसका डर था वही हुआ, बुढ़ापे की लाठी चिटक गई!!! सम्मान, आदर सब
खत्म, वो सिर्फ पैसों के लिए माता-पिता के साथ था.
माता-पिता तो अभी भी
उसे चाहते थे, अपने पूरे प्यार और लगाव के साथ उसे अपनी ओर खीचते थे लेकिन वो
दीवार जो उनके बीच बन चुकी थी अबतक बहुत मज़बूत होगई थी. फिर भी माता-पिता
छोटी-छोटी खुशियाँ ढूंड ही लेते थे, आखिर जिंदगी तो जीना ही थी. अक्सर घुटन में वो
दोनों कह जाते, इसे पैदा ही नहीं होना चाहिए था लेकिन फिर खुद को समझाते......
जिस पल वो दोनों
घुट-घुट के रो रहे थे, उस पल किसी अस्पताल में एक माँ ने एक नई जिंदगी को जन्म
दिया, डॉक्टर ऑपरेशन करके बाहर निकला और ख़ुशी से पिता को बताया, मुबारक हो......बेटा हुआ है!!!
आशाओं का एक और महल बनना शुरू होगया........
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