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Friday, 3 July 2015

रेत पर देखा निशान !!

                             लेखक: आशुतोष अस्थाना 

आस्था और धर्म के संगम में जीवन को जीते देखा
देवताओं के देवत्व को और साधुओं की साधना को देखा
अमृत की वर्षा को देखा गंगा की पवित्रता को देखा
आँखों में पुण्य की लालसा लिए श्रद्धालुओं का सैलाब देखा
और देखा मैंने उस मीलों दूर फैली रेत को
हर तरफ थी वो
कुछ अनकही सी बात थी उसमें
छुपाए अपने अंदर करोड़ों निशान
वह कदम जो गुजरे थे उस पर से
वो निशान जो बसाया उसने अपने सीने में
कहने को तो वो है सिर्फ पानी उसकी महत्वता तो इन्हीं
कदमों से झलकती है
उसकी पवित्रता की निशानी इन्हीं से तो बनती है गंगा की
कहानी।।
कदमों के हर निशान को यह रेत अपने में समा लेती है
कोई फर्क नहीं है न ही कोई ऊँच-नीच है इन निशानों में
सिखाते हैं यह निशान हमको जातीयता तो है इंसानों में
कौन राजा है कौन रंक
रक्षक कौन है और कौन है भक्षक
कौन देव है और कौन मनुष्य
समान है यह निशान
कहीं दूर से आते आपस में वो मिल जाते मंजिल तो एक ही है उनकी
जो कभी नहीं मिलते आपस में यह निशान उन्हीं की एकता
की है पहचान
वह निशान नही है मराठी गुजराती पंजाबी और सिंधी
एकजुट होकर जीवन को जीना सिखाते है।
मुख होते नहीं उनके फिर भी वो बोलते हैं
यथार्थ का परिचय करा कर भावनाओं का रस घोलते है।
माँ गंगा से मिलने को बेचैन किसी नागा के उत्साह को
दर्शाते
किसी पेश्वाई के गुजर जाने का एहसास जताते
तो श्रद्धालुओं की भीड़ में कभी-कभी खो जाते।
कभी ये खाकी वर्दी की मदद भी कर जाते 
तो कभी किसी भटके को रास्ता दिखाते
तो घिसटते हुए किसी बूढ़ी भिखारिन की फटी बिवाईयों के खून को
सूरज की लालिमा के भांति अपने में हैं बसाते
कुछ नन्हे निशान उस पकड़ा-पकड़ी के खेल सेें बन जातें
तो वो गहरे निशान किसी के अन्त पे रोते इंसान की पीड़ा बताते।।
लोग आते गंगा में डुबकी लगाते और चले जाते
यह निशान लेकिन सदा उनका परिचय कराते।

इस कुछ दिन के शहर में उनकी याद हेशा दिलाते।

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