सोशल मीडिया पर M TV द्वारा एक मुहिम चलाई जा रही है #MTVBaarBraDekho
बार ब्रा देखो! रियली!
ब्रा होना आसान नहीं है जनाब! खूबसूरत होने के बावजूद अगर गलती से दिख जाए तो समाज की भावनाएं आहत हो सकती हैं। ब्रा के साथ तो दलितों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। अगर कोई पढ़ा लिखा दलित किसी बड़े ओहदे पर पहुँच जाए तो कम से कम उसकी इज़्ज़त तो होती है, मगर एक ब्रा की किस्मत में दुत्कारा जाना ही लिखा है फिर चाहे वो एक करोड़ रुपए कमाने वाली महिला के बदन से चिपकी हुई हो या एक हज़ार रुपये कमाने वाली स्त्री से!
ब्रा के अस्तित्व पर वैसी ही जंग छिड़ी है जैसे आस्तिक और नास्तिक के बीच भगवान के अस्तित्व को लेकर छिड़ी रहती है। एक पक्ष उसके होने को ही नकार देता है और दूसरा उसकी मौजूदगी साबित करते-करते थक जाता है।
लड़कियों के लिए ब्रा को पहनना और उसका ना दिखना एक दूसरे से इन्वर्स्ली प्रोपोर्शनल है। वैसे लड़कियों की ज़िंदगी भी बेहद कठिन है। सारी ज़िंदगी कुछ न कुछ बदन से चिपकाए ही रहना पड़ता है। पैदा होते ही डायपर चिपका दिया जाता है, थोड़े बड़े होने पर पैड और फिर कुछ वक्त बाद ब्रा, और फिर ब्रा और पैड का बोझ उठाये-उठाये ज़िंदगी आधी से ज़्यादा बीत जाती है। बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम रखते ही पैड से पीछा छूट जाता है और कुछ वक्त बाद ब्रा से भी रिश्ता खत्म होने लगता है मगर एक उम्र आते-आते डायपर फिर से शरीर की ज़रूरत बन जाता है जो अंत तक शरीर से जुड़ा रहता है।
शायद मैं किसी कट्टर फेमिनिस्ट की तरह साउंड कर रहा होऊंगा मगर फिलहाल मैं ब्रा की आपबीती शेयर करने में इंटरेस्टेड हूँ...महिलाओं की फिर किसी रोज़ बताऊंगा।
तो, मैं ये बता रहा था कि ब्रा होना कितना कठिन है!
कई बार सोचता हूँ कि अंडरगारमेंट्स की दुनिया की बनियान डोमिनटेड सोसाइटी में ब्रा होना श्राप है! उसे सूरज की किरणें भी ठीक से नसीब नहीं हो सकतीं। साड़ी, टीशर्ट या किसी अन्य कपड़े के नीचे रह कर ही उसने मौसमों का आनंद लिया है। ब्रा अपने जीवनकाल में या तो चांद से रूबरू होती है या फिल्टर के साथ सूरज देख पाती है। वो तो अपनी मालकिन का चेहरा भी कभी ठीक से नहीं देख पाती। हां कभी-कभी कुछ परवर्ट नज़रों से आंखें मिल जाती हैं मगर फिर उसे संकोच के साथ कपड़े के अंदर छुपा लिया जाता है। उसे अपने रंग पर भी गुरूर करने का मौका नहीं मिलता। कपड़ों की दुनिया में जहां काली टीशर्ट कूल बन जाती है वहां बिचारी काली ब्रा स्लट का ही खिताब हासिल कर पाती है।
इन सबके बावजूद वो सहारा प्रदान करती हैं मगर इसी बीच न जाने कहाँ से कल्चर और सोसाइटी का झंडा हाथ में थामे एक आंटी प्रकट होती हैं और आकाशवाणी की तरह अनाउंस करते हुए निकलती हैं - तुम्हारी ब्रा दिख रही है...बस फिर क्या, खुली हवा में सांस ले रही ब्रा को फिर कपड़े के अंदर ढकेल दिया जाता है।
वो यही सोचती है कि मेरा किरदार भी तो बनियान जैसा ही है मगर उस मासूम को ये नहीं पता होता कि जब समाज में औरतों को पुरुषों के बराबर दर्जा नहीं मिलता तो उसको बनियान के बराबर होने का मौका कैसे मिल जाएगा।
खैर, ब्रा को बराबरी का दर्जा दिलाना आसान है। करना ये है कि उसकी बराबरी के लिए उसे दूसरों पर थोपना नहीं है। उसे बस स्वाभाविक और आम बनाना है। वो तभी हो सकता है जब उसे कपड़ों के नीचे नहीं, अन्य कपड़ों के साथ उसके बगल में सुखाने को छोड़ दिया जाए। जब उसे गुरमेठ कर अलमारी में सबसे अंदर नहीं, बाकी के कपड़ों के साथ रखा जाए। जब उसे बदन को कसाव देने वाला महज़ एक कपड़ा माना जाए.... और जब उसे पहनने वाले उसे सिर्फ इसलिए ढकने की सलाह न दें क्योंकि उसे देख कर समाज को आपत्ति होती है! तभी कोई ब्रा ये कह पाएगी कि 'ब्रो, अगले जन्म मोहे ब्रा ही कीजो!'
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