सिर्फ औरत हो इसलिए इज़्ज़त करें?
हां, सिर्फ इसलिए
पर क्यों, फिर कहाँ गयी बराबरी के हक़ वाली दलीलें? कहाँ गया तुम्हारा फेमिनिज़्म?
तुम्हारा मतलब है कि अब मुझे इज़्ज़त पाने के लिए भी फेमिनिस्ट बनना पड़ेगा? मतलब जिसके पास तुम्हारे बराबर का हक़ होगा उसे तुम इज़्ज़त नहीं दोगे?
तुम दलीलों की बात करते हो! उन दलीलों को तुम कान से सुन कर, मल निकालने वाले रास्ते से बाहर निकाल देते हो, इसलिए उन दलीलों का कोई अर्थ नहीं है।
तुम्हें वो महज़ दलीलें लगती हैं? एक बार औरत की कमीज़ के अंदर हवसज़दा नज़रों से नहीं, इज़्ज़त की नज़र से झांको।
क्या हो अगर तुम्हें दिन रात, आते जाते, हर रास्ते, हर चौराहे, हर गली में दो आंखें घूरती रहें। तुम खुद को ऊपर से नीचे तक परखो, कपड़ों से बाहर निकलते हर अंग को ढक लो, फिर भी तुम्हें सामने से आते, और पीछे निकल जाते लोग देखें। तुम खुद को कोसो, हैरान रहो, की आखिर मुझमें ऐसा क्या है जो इतना घूरा जा रहा है। सुबह सो कर उठने से रात को सोने जाने तक तुम एक अभिनय करते रहो, जिसमें हर कोई निर्देशक बन कर ये बताता रहे कि ऐसे मत बैठो, वैसे मत उठो, अपना शरीर छुपाओ नहीं तो किसी और को तुम्हें देख कर समस्या होने लगेगी।
क्या हो अगर चंद रुपये ज़्यादा कमाने से तुम्हारा कोई अपना ही तुमसे ईर्ष्या करने लगे?
उस डर से कैसे निपटोगे की कहीं तुमसे किसी मर्द का ईगो ना हर्ट हो जाये?
उस शर्म को कहां छुपाओगे जब निक्कर पहने एक छोटे बच्चे को, जो अभी ठीक से गिनती भी नहीं सीख पाया है, मर्दानगी का अनुभव कराते हुए सिर्फ इसलिए तुम्हारे साथ भेजा जाए कि वो तुम्हारी रक्षा करेगा?
इस कटाक्ष से कैसे बचोगे की हर लड़की एक जैसी है, तुम्हारा चूतिया काट कर किसी और से शादी कर लेगी? कैसे बताओगे की नहीं तुम वैसे नहीं हो?
जब समाज का हवाला दे कर तुम्हारे अपने ही तुम्हें किसी अपने से अलग कर दें, वो अपना जिसके साथ तुम हम-बिस्तर सिर्फ इसलिए नहीं हुए क्योंकि तुम्हारा रिश्ता एक बिस्तर के चार कोनों से अधिक विस्तृत है, तब तुम क्या करोगे और क्या करोगे जब किसी अनजान के बिस्तर में सिमटने के लिए तुम्हें छोड़ दिया जाए?
क्या हो अगर तुम्हें चंद रुपयों के लिए जलाया जाए, वो भी उनके हाथों जो तुम्हारा परिवार हुआ करते हैं।
मैं इज़्ज़त की भीख नहीं मांगती, वो मेरा हक़ है, क्योंकि जितना तुम इस समाज, इस दुनिया के हो, उतनी मैं भी हूँ!
तुम दलीलों की बात करते हो? तुम खुद को किसी अदालत का वकील बना कर मेरे ऊपर आरोप मढ़ते हो और फिर खुद ही जज बन कर उसकी सज़ा सुना देते हो। मेरी दलीलों को तुमने मेमने का मिमियाना समझा है, और खुद को वो कसाई, जिसे सिर्फ अपनी जेब को गर्म करने का ध्यान है, उस कराहते शोर से कोई मतलब नहीं।
मुझे इसलिए इज़्ज़त मत दो क्योंकि मैं कह रही हूं, ना इसलिए इज़्ज़त दो की मेरी व्यथा ऐसी है। मुझपर दया भी मत खाओ, ना ही हास्य की वस्तु बनाओ। मुझे इसलिए इज़्ज़त दो की मैं तुम जैसी ही हूँ.... मैं तुम ही हूँ...
This is my personal blog about my personal thoughts. Every person has a world deep inside him, the feelings and emotions which a person never share, even with himself or herself. The world which knows everything about that person, the world which no one else can see, the world which is buried deep inside our soul, its 'The World Within'
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Tuesday, 3 April 2018
तुम और तुम्हारा फेमिनिज़्म
Tuesday, 12 December 2017
दाढ़ी
यूं ही कभी एक दोस्त ने बात बात में कह दिया कि तुम्हारी दाढ़ी देख कर दाढ़ी रखने की इंस्पिरेशन मिलती है। यूं ही कभी परिवार वालों ने मज़ाक मज़ाक में कह दिया कि जानवर लगने लगे हो, दाढ़ी काट लो। यूं ही कभी किसी आदरणीय ने गुस्से गुस्से में कह दिया कि दाढ़ी साफ हो जानी चाहिए नहीं तो समझे रहना।
बहुतों ने आलोचना की, बहुतों ने तारीफ, मगर गौर करने वाली बात है कि मेरे अपने मन ने इसे कैसे अपनाया है।
दाढ़ी मेरे लिए आलस की निशानी नहीं है। महीने में एक या दो बार बाल कटवाने जाता ही हूँ। सिर्फ इशारा करना होता है और दाढ़ी साफ हो सकती है।
दाढ़ी मेरे लिए स्टाइल स्टेटमेंट भी नहीं है। मैं स्टाइल बदलते रहने वाले लोगों में से हूँ। डेथ टू रेज़र, लौंग लिव बियर्ड के दौर से ब्रेक द बियर्ड दौर को अपना सकता हूँ।
पर मैंने अपने लिए दाढ़ी चुनी है। अपने जीवन में इसे जगह दी है। अपने अस्तित्व में इसे भी एक छोटा सा कोना दिया है क्योंकि ये दाढ़ी मेरे वजूद का हिस्सा है। ये दाढ़ी ना मेरी पहचान है, ना ही मैं इसे अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ, ये दाढ़ी मेरे जीने का तरीका है।
जब मन में काम की उलझन हो, दिमाग ने सोचना बंद कर दिया हो, तब महज़ दाढ़ी के स्पर्श से ही दिमाग और मन सरपट भागना शुरू कर देते हैं।
ठुड्डी से एक इंच नीचे लटक रही दाढ़ी को उंगलियों से घुमाने की खुशी, ग़ालिब की महबूबा की उलझी लटों को सुलझाने से ज़्यादा खुशनुमा एहसास दे जाती है।
किसी की गंभीर बातों को मूंछों पर ताव देते हुए सुनने से लगता है जैसे बात दिमाग से होते हुए सीधे दिल में उतर रही है।
नहाने के बाद कंघी से बाल झाड़ने के साथ दाढ़ी को झाड़ने से जो पूर्णता का अनुभव होता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
किसी और के द्वारा आपकी दाढ़ी को घूरे जाने से जो गर्व का एहसास होता है, वो अद्वितीय है।
मैं इस बात के खिलाफ हूँ कि दाढ़ी से ही मर्द की असली पहचान होती है, या मूंछ नहीं तो कुछ नहीं। इन बातों से दाढ़ी के लिए जो इबादत का पहलू है वो छिछला दिखाई पड़ने लगता है।
दाढ़ी मेरे लिए शिव के सर पर आसीन चंद्रमा के समान है, किसी सागर में छोटे से टापू के समान है, किसी गुलाबी होंठ के नीचे मासूम से तिल के समान है, किसी ब्राह्मण के श्वेत जनेऊ के समान है। दाढ़ी अंत का प्रतीक नहीं, पूर्णता का प्रतीक है। दाढ़ी महज़ मर्द होने का प्रतीक नहीं, मर्द के पुरषार्थ का प्रतीक है।
आप पुरुष हैं और आपकी दाढ़ी नहीं उगती या आपको क्लीन शेव रहना पसंद है, तो मेरी इज़्ज़त आपके लिए कम नहीं होगी क्योंकि वो आपके जीने का तरीका है। वैसे ही दाढ़ी मेरे लिए मेरे जीने का तरीका है।
#जियो_और_जीने_दो
#आशुतोष
Tuesday, 17 May 2016
कितनी अकेली है ये पीढ़ी
लेखक: आशुतोष अस्थाना
दुनिया का हर जीव
अपने बच्चों के प्रति बेहद संवेदनशील होता है. बच्चे को जन्म देने से लेकर उसके
पालनपोषण तक, उसकी देखभाल करने से लेकर उसकी ज़रूरतों को पूरा करने तक, चाहे वो कोई
भी जीव हो अपने बच्चे को सबसे अधिक स्नेह करता है. माता-पिता किस तरह ज़रा सी चोट
लग जाने पर अपने बच्चे के लिए आंसू बहाने लगते हैं. सिर्फ माँ-बाप ही नहीं, बच्चे
भी अपने घर, माता-पिता और परिवार के लिए संवेदनशील होते हैं. पर समय के साथ इस
संवेदनशीलता में कई तरह के परिवर्तन देखने को मिल रहे हैं.
बदलते दौर में
इंसानों के हर वर्ग में बदलाव देखने को मिल रहे हैं, चाहे वो शारीरिक हो या
मानसिक. बदलाव आना स्वाभाविक भी है लेकिन आज के युवाओं में जिस तरह का बदलाव देखने
को मिल रहा है वो चौंकाने वाला है. आज की पीढ़ी की सोच एक विपरीत दिशा में बढ़ रही
है जिसे सही या गलत ठहराना मुश्किल है. वो परिवार के लिए संवेदनशील नहीं हैं,
माता-पिता के साथ समय बिताना उन्हें उबाऊ लगता है और इस बात का सबसे बड़ा कारण वो
पीढ़ी का अंतर या जनरेशन गैप बताते हैं. युवा अपने चारों तरफ एक अजीब सी दीवार खड़ी
करते जा रहे हैं जिसको वो ‘पर्सनल स्पेस’ कह कर समायोजित करते
हैं. इस दीवार में वो अपनी भावनाएं क़ैद कर लेते हैं. परिवार के निकट न होने के
कारण वो इन भावनाओं को किसी से साझा नहीं करते, अपने मन में एक अँधेरा कमरा बनाकर
उन भावनाओं को वो उसमें छुपा ले रहे हैं जो समय के साथ एक विस्फोट के साथ बाहर
निकल रहा है! उन्हें ये भ्रम है कि उनकी बातों को कोई नहीं समझेगा, उन्हें अपने से
बड़े या समझदार पर भरोसा नहीं है, उन्हें अपने मित्रों पर भरोसा है लेकिन वो भूल जा
रहे हैं कि उनके मित्र जो उन्हीं की उम्र के हैं, उसी समस्या से जूझ रहे हैं.
उन्हें खुद नहीं पता की वो किस अनजान चीज़ की तलाश में हैं और अपने मनगढ़ंत खयालों
से दुखी हो कर मन में एक दर्द को बसा ले रहे हैं. असल बात तो ये है की वो अपनी
स्थिति को अतिरंजित कर रहे हैं जिसके चलते उन्हें अपनी स्थिति पर दया आने लग रही
है. उन्हें ऐसा प्रतीत होने लगता है की दुनिया का सबसे बड़ा दर्द उन्हीं का है
जिससे पार पाना मुश्किल है. कम उम्र में दुनिया की बुरी छवि उनके मन में बस जा रही
है जिसके चलते हर वो चीज़ जो उनके खिलाफ है, उन्हें गलत लगने लग रही है.
भारत में हर साल 15
से 29 साल के हजारों युवा आत्महत्या कर रहे हैं. इन सब में कई ऐसे हैं जो प्यार में
मात खा जाने के कारण, परीक्षा में असफल होजाने के कारण और घर के किसी विवाद के
कारण ऐसा कदम उठा रहे हैं. हाल ही में छोटे परदे की मशहूर कलाकार प्रत्यूष बनर्जी
की आत्महत्या का मामला सामने आया जिसने सभी को चौंका दिया. खबर मिली की प्रत्यूष
अपने परिवार से अलग मुंबई में रहती थी. उसने अपने जीवन में घट रही छोटी-बड़ी घटनाओं
के बारे में अपने माता-पिता को नहीं बताया था. वो खुद अपने में इतना उलझ गयी थी कि
उसे आत्महत्या करना सही लगा होगा. लेकिन इस घटना में एक बड़ा सवाल ये उठता है की
जिंदगी को खत्म कर लेना किसी भी समस्या का समाधान कैसे है? ये स्वभाव आज के युवाओं में काफी देखने को मिल रहा
है. उन्हें गाँठ खोलना नहीं, उसे काट देना सिखाया जाता है. शायद यही कारण है कि वो
समस्याओं से लड़ते नहीं, उस जड़ को ही खत्म करने की कोशिश करते हैं जिससे वो समस्या
पैदा हुई है. हर रोज़ अखबार ऐसे युवाओं की आत्महत्या की ख़बरों से पटा पड़ा रहता है
जो जीवन से हार कर ख़ुदकुशी कर लेते हैं. जीवन को
खत्म कर लेना समाधान नहीं है, चुनौतियों से डरने के बजाये उनका सामना करना ही
समाधान है. वैसे मैं इन सारी बातों का दोष सिर्फ युवाओं को ही नहीं दूंगा. बचपन में
बच्चों के स्कूल से घर आते ही माता-पिता उनसे दिन के बारे में पूछते थे, बड़े होते
ही उनके जीवन के बारे में वो पूछना ही छोड़ देते हैं. बच्चों के लिए समय निकालना
मुश्किल हो जाता है. कई बातें ऐसी होती हैं जो वो अपने बच्चों से नहीं कर पाते.
इसमें हमारे समाज और संस्कृति की भी कुछ बातें कुरीतियाँ बनती हैं. अगर कोई युवा
धुम्रपान या शराब का सेवन करता है तो उसके माता-पिता
उसे उन चीजों की शरीर पर पड़ने वाली खामियां नहीं बताते बल्कि वो उन्हें सामाजिक
दबाव के रूप में पेश करते हैं. वो उन्हें शराब या सिगरेट पीने से डांटते हैं लेकिन
सेहत का हवाला देकर नहीं, घर की बदनामी होने की बात से डराते हैं. अपने बच्चों से
उनकी पसंद-नापसंद के बारे में बात तक नहीं करते, उनकी
भावनाओं को जानने और समझने की कोशिश तक नहीं करते. यौवनावस्था उम्र का एक ऐसा पड़ाव
है जब प्रेम और संबंधों में युवा अपने आपको बांधना शुरू कर देते हैं. माता-पिता को
उनके रिश्तों को जानना चाहिए और वो रिश्ते उनके बच्चों के लिए क्या एहमियत रखते
हैं वो समझना चाहिए लेकिन माता-पिता को जब ये पता चलता है तो वो बच्चों की भावनाओं
को नहीं समझते यही कारण है की बच्चे खुद को अकेला समझने लगते हैं. उन्हें लगता है
कि माँ-बाप उनसे प्यार नहीं करते. सिर्फ यही नहीं, कम उम्र में बहकावे के और भी
रास्ते हैं जिनपर माता-पिता ध्यान नहीं देते. कितने ही नौजवान आतंकवाद की ओर अपने
कदम बढ़ाते हैं, इन सब में कई ऐसे होते हैं जो सही मार्गदर्शन के बिना बहक जाते
हैं.
ये सही है कि हर
पीढ़ी उम्र के एक जैसे पड़ाव से घुज़रती है. हमसे पहले की पीढ़ी भी युवा उम्र से गुज़री
थी, हम भी गुज़र रहे हैं और आगे की पीढ़ी भी गुज़रेगी. लेकिन पहले की पीढ़ी के साथ
परिवार का लगाव कुछ अलग ही था. इंटरनेट, मोबाइल जैसे बहकाने वाले उपकरण तब नहीं
थे. पूरा घर एक दूसरे की समस्याओं को सुलझाता था. अब के समय में हम पूरी दुनिया के
साथ तो जुड़ गए हैं लेकिन अपने माता-पिता और घर से अलग होते जारहे हैं. परिवार किसी
भी ईमारत की बुनियाद की तरह होता है. उससे दूर हमारा कोई वजूद ही नहीं है. युवाओं
को खुद को अकेलेपन से बचाने के लिए परिवार के निकट रहना ज़रूरी है क्यूंकि वो हमारा
शकित केंद्र है और माता-पिता को अपने बच्चों की भावनाओं को समझना ज़रूरी है. इस
21वीं सदी की पीढ़ी को हम ऐसे ही आत्महत्या करने के लिए अकेला नहीं छोड़ सकते
क्यूंकि यही पीढ़ी देश का भविष्य है.
Wednesday, 11 May 2016
Nothing Intended: Kejri’s next big accusation on Modi
By: Ashutosh Asthana
When God was
creating this world, He made everything in balance. With heat, He gave cold,
with light He gave darkness, with winters He gave summers, with horses, He gave
donkeys and after making Modi, He made Kejriwal. Since the formation of this
world, Modi’s fate was already written. God made him to withstand allegations
and bundle of accusations. From Godhra to the false promises during the
election campaign, from ache din aane wale hain to crediting the
accounts of Indians with the black money, from being communal to being a capitalist,
Narendra Modi have had it. He would have never thought that after becoming the
Prime Minister of India and facing accusations bravely (sometimes cowardly walking
out of an interview) his biggest challenge and the allegation machine, Mr Kejriwal
is waiting for him with open arms. Since Modi came into power, Kejriwal is
accusing him for every petty issue, but this time its rather 'big' and 'important'
for Aam Admi Party.
Issue of Modi’s
degree is trending on social media and in Indian politics these days. Kejriwal
accused Modi of false graduation and post-graduation degree. The conflict
reached to such an extent that the BJP has to publicize the degree of Modi.
This is one big issue that AAP is
fighting for these days after protesting for the famous Jan Lokpal Bill. This
battle between Kejri and NaMo will certainly come to an end one day, but it is
worth thinking that what allegations would Kejriwal put forward in the future
for Modi? Considering the present and earlier scenario, Kejri’s next big
allegation on Modi would be his beards!
Sir ji will
stage a protest against Modi and will accuse him of having a fake beard. In the
words of Kejriwal, “Modi ji’s beards are fake and Supreme Court should look
into the matter!” The Aam Admi Party workers will protest near parliament. BJP
will counter Kejriwal by accusing him of being jealous with Modi’s great white
beards. After the resistance Amit Shah will organise a press conference and
distribute a hair of Modi ji’s daadhi to each reporter in the press conference
and the famous ‘parrot of the cage’ will confirm that the berads of Modi are
not fake and neither dyed, they are naturally white because of his huge
experience of politics. May be Kejriwal can come up with the allegation that
Modi’s chest does not measure 56 inches and he should be put behind bars for his
false claim. ‘Pappu’ tailor from the interiors of east Delhi will be called
upon to take the measurement of Modi.
The baseless
and useless issues which the politicians are raising these days give me hysterics.
The country is facing severe drought conditions, a thousand crore scam of
helicopters, a business tycoon in huge debt running away from the country and
among all this Aam Admi Party is raising the issue of PM’s degree. There is
nothing mention in our constitution regarding the education of MPs and MLAs, so
this hue and cry doesn’t make any sense. Allegations for the improvement of the
democracy is welcome, but such allegations, what should I say about them!
Happy reading!
Tuesday, 10 May 2016
बरमूडा ट्रायंगल है ये मीडिया
लेखक-आशुतोष अस्थाना
बरमूडा ट्रायंगल, नार्थ अटलांटिक महासागर का एक ऐसा रहस्यमय हिस्सा है जिसके
बारे में अभी तक वैज्ञानिक अधिक नहीं जान सके हैं. ये एक ऐसा हिस्सा है जिसमें हवाईजहाज़
या पानी का जहाज़ जाते ही रहस्यमय ढंग से गायब हो जाता है. वर्षों से ऐसी कई घटनाएँ
यहाँ दर्ज हो चुकी हैं जिससे इस इलाके का नाम ‘हौंटेड’ जगहों में दर्ज हो चुका है.
कुछ ऐसी ही विशेषता इन दिनों भारतीय मीडिया में भी देखने को मिल रही है. बरमूडा
ट्रायंगल और मीडिया दो अलग चीज़ें हैं लेकिन इनके स्वरुप में आज कल काफी समानता
देखने को मिल रही है.
भारत में मीडिया का विकास एक मिशन के रूप में हुआ था. साहित्यकारों और समाज
सेवकों की एक बड़ी फ़ौज इस मिशन को आगे ले जाने का कार्य कर रही थी. भारत में मीडिया
के माध्यम से कई बड़े परिवर्तन देश में हो रहे थे. 90 के दशक तक स्थिति सामान्य थी.
भारतवासियों को जागरूक करने का कार्य मीडिया बेहतर ढंग से कर रहा था. 90 के दशक
में एफडीआई के निवेश के साथ देश की रूपरेखा बदलने लगी थी. उसी दौरान मीडिया में भी
बाहरी रुपयों का निवेश शुरू हुआ और वही समय था जब इस मिशन में कमीशन का आदान-प्रदान
शुरू होगया. इक्कीसवीं सदी की शुरुआत तक स्थिति काफी हद तक काबू में थी लेकिन
ब्रेकिंग और एक्सक्लूसिव ख़बरों ने मीडिया में उथल-पुथल का दौर शुरू कर दिया. क्रॉस
मीडिय ओनरशिप का दौर शुरू होते ही मीडिया पर चिटफंड कंपनी के मालिकों ने अपना कब्ज़ा
जमा लिया. फिर शुरू हुआ मीडिया में खबरों को तोड़ने-मरोड़ने का दौर. जो मिशन की तरह
शुरू हुआ था आज वो व्यपार मात्र ही रह गया है. अब आप सोच रहे होंगे की इन सब बातों
में मीडिया को बरमूडा ट्रायंगल से जोड़ने का अर्थ क्या है. जबसे न्यूज़ चैनलों और
अख़बारों में टीआरपी की जंग शुरू हुई है तब से ख़बरों की वास्तविक्ता और विश्वसनीयता
पर बट्टा लग चुका है. अब खबरों के मामले में वो नहीं दिखाया जाता जो दर्शक देखना
चाहते हैं, अब सिर्फ वो दर्शाया जाता है जिससे चैनलों की टीआरपी बढ़े. आज के समय
में मुद्दे चैनलों की टीआरपी में बिलकुल वैसे ही खोते जा रहे हैं जैसे बरमूडा ट्रायंगल
में हवाईजाहाज़ खो जाते हैं.
हालही की घटनाओं की बात करें तो ऐसी कई खबरें हैं जिन्हें मीडिया ने ज़ोरों से
कवर किया लेकिन मीडिया में अब उनका अस्तित्व ही नहीं है. उन ख़बरों की चर्चा ही नहीं
होती. राधे माँ को कौन भूल सकता है. अपने ढोंग से सुर्ख़ियों में आईं राधे माँ का
अब कोई अता-पता नहीं है. राधे माँ के खिलाफ कई इलज़ाम लगे, मामले दर्ज हुए, मीडिया
ने भी उनको अपनी ‘ब्रेकिंग न्यूज़’ बना डाला, लेकिन अब, उनकी चर्चाएँ ही ख़त्म हो
गयीं. एक समय में लग रहा था मानों पूरा देश सहनशील-असहनशील जैसे दो भागों में बंट
चुका है. मीडिया ने तो ‘असहिष्णुता’ शब्द को इतना प्रचलित कर दिया था की कई ऐसे
लोग थे जिनकी शब्दावली में पहली दफा ये शब्द जुड़ा था. लग रहा था मानों देश में हर
व्यक्ति असहिष्णु होचुका है. इस मुद्दे को इतनी हवा दी गयी कि इसके परे कोई दूसरा
मुद्दा देश में बचा ही नहीं था. लेकिन ये मुद्दा भी कुछ ही दिनों में इस बरमूडा
ट्रायंगल में खो गया. कुछ दिनों पहले के जवाहरलाल नेहरु विश्वविद्यालय से जुड़े विवाद
को कौन भूल सकता है. उस पर तो ऐसी राजनीती हुई थी जैसी पहले कभी किसी मुद्दे पर नहीं
हुई. तब मीडिया ने भी पूरी शिद्दत से छात्रों पर देशद्रोह का ठप्पा लगाया. कन्हैया
कुमार को राष्ट्रीय नेता बनाने की ओर अग्रसर होचुका था मीडिया. झूठे विडियो को
बेझिझक प्राइमटाइम पर चलाया गया. बाद में कुछ चैनलों ने माफ़ी मांगी लेकिन कुछ तो
उस गलती को करने के बाद डकार लेना भी भूल गए. बेशक इससे जनता पर बुरा प्रभाव पड़ा
पर देखते ही देखते जेएनयू का मुद्दा भी हवा होगया. अवार्ड वापसी, बीफ पर बवाल, इक्लाख की मौत, तोमर की डिग्री, और कई ऐसे मुद्दे पिछले कुछ दिनों में इस त्रिकोण
में आये और रहस्यमय ढंग से गायब होगए. आज कल विजय माल्या, मोदी की डिग्री और उत्तराखंड
मामले जैसे बड़े मुद्दे इस बरमूडा ट्रायंगल की ओर बढ़ रहे हैं, कुछ समय और, ये भी
उनमें गायब होजाएंगे.
जहाँ मीडिया समाज का एक हिस्सा मात्र होना चाहिए था, वहीँ आज मीडिया समाज के
निर्माता का किरदार निभा रहा है. दर्शकों को क्या देखना है, क्या सुनना है और क्या
पढ़ना है ये दर्शक और पाठक खुद नहीं, मीडिया तय कर रहा है. कहा जाता है कि इंसान को
अपनी सूझ-बूझ से अपनी राय खुद बनानी चाहिए, लेकिन मीडिया ऐसा होने ही नहीं दे रहा
है. वो अपने दृष्टिकोण को पाठक या दर्शकों के दृष्टिकोण पर थोप राह है और गौर करने
वाली बात ये है की मीडिया का दृष्टिकोण असल में उस मीडिया कंपनी में किसी बड़े पद पर
आसीन व्यक्ति का होता है जो लोगों पर भी हावी होता है. आज के समय में किसी के भी
वामपंथी या दक्षिणपंथी होने का श्रेय मीडिया पर काफी हद तक जाता है क्यूंकि चैनल
और अखबार अपनी राजनीतिक विचारधारा को लोगों पर थोपते हैं. इसका जीता-जागता सबूत इन
दिनों सोशल मीडिया पर खूब देखने को मिल रहा है जहाँ लोग पूरी बात जाने बिना ही
किसी विचारधारा पर अंधविश्वास कर ले रहे हैं. इससे साम्प्रदायिकता का स्तर तेज़ी से
बढ़ रहा है.
बेशक मीडिया लोकतंत्र का चौथा स्तंभ है लेकिन आज जो वो कर रहा है वो
लोकतंत्र के खिलाफ है. चैनलों पर चार पांच लोग किसी को भी मुजरिम घोषित कर दे रहे
हैं जिससे जनता भी उस व्यक्ति को उसी नज़रिए से देख रही है. किसी भी मुद्दे के पैदा
होते ही मीडिया उसपर मंथन शुरू कर देता है, मीडिया में ऊंचे पद पर आसीन लोग अपने दृष्टिकोण
से खबर दिखाते हैं और जनता को उस पर अपनी राय बनाने का समय ही नहीं मिलता. नतीजा
ये होता है की देश के किसी बड़े शैक्षणिक संस्थान पर आतंकवाद का अड्डा होने का
ठप्पा लगा दिया जाता है.
आज स्थिति कुछ ऐसी है की इस बरमूडा ट्रायंगल से पार पाना मुश्किल सा लग रहा
है. मीडिया जनता को सच से रूबरू कराने के लिए था न की नया सच खुद गढ़ कर जनता के
सामने पेश करने के लिए. रहस्य बरकरार है. अभी ये त्रिकोण और क्या क्या निगलेगा,
देखना बाकी है.
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