सिर्फ औरत हो इसलिए इज़्ज़त करें?
हां, सिर्फ इसलिए
पर क्यों, फिर कहाँ गयी बराबरी के हक़ वाली दलीलें? कहाँ गया तुम्हारा फेमिनिज़्म?
तुम्हारा मतलब है कि अब मुझे इज़्ज़त पाने के लिए भी फेमिनिस्ट बनना पड़ेगा? मतलब जिसके पास तुम्हारे बराबर का हक़ होगा उसे तुम इज़्ज़त नहीं दोगे?
तुम दलीलों की बात करते हो! उन दलीलों को तुम कान से सुन कर, मल निकालने वाले रास्ते से बाहर निकाल देते हो, इसलिए उन दलीलों का कोई अर्थ नहीं है।
तुम्हें वो महज़ दलीलें लगती हैं? एक बार औरत की कमीज़ के अंदर हवसज़दा नज़रों से नहीं, इज़्ज़त की नज़र से झांको।
क्या हो अगर तुम्हें दिन रात, आते जाते, हर रास्ते, हर चौराहे, हर गली में दो आंखें घूरती रहें। तुम खुद को ऊपर से नीचे तक परखो, कपड़ों से बाहर निकलते हर अंग को ढक लो, फिर भी तुम्हें सामने से आते, और पीछे निकल जाते लोग देखें। तुम खुद को कोसो, हैरान रहो, की आखिर मुझमें ऐसा क्या है जो इतना घूरा जा रहा है। सुबह सो कर उठने से रात को सोने जाने तक तुम एक अभिनय करते रहो, जिसमें हर कोई निर्देशक बन कर ये बताता रहे कि ऐसे मत बैठो, वैसे मत उठो, अपना शरीर छुपाओ नहीं तो किसी और को तुम्हें देख कर समस्या होने लगेगी।
क्या हो अगर चंद रुपये ज़्यादा कमाने से तुम्हारा कोई अपना ही तुमसे ईर्ष्या करने लगे?
उस डर से कैसे निपटोगे की कहीं तुमसे किसी मर्द का ईगो ना हर्ट हो जाये?
उस शर्म को कहां छुपाओगे जब निक्कर पहने एक छोटे बच्चे को, जो अभी ठीक से गिनती भी नहीं सीख पाया है, मर्दानगी का अनुभव कराते हुए सिर्फ इसलिए तुम्हारे साथ भेजा जाए कि वो तुम्हारी रक्षा करेगा?
इस कटाक्ष से कैसे बचोगे की हर लड़की एक जैसी है, तुम्हारा चूतिया काट कर किसी और से शादी कर लेगी? कैसे बताओगे की नहीं तुम वैसे नहीं हो?
जब समाज का हवाला दे कर तुम्हारे अपने ही तुम्हें किसी अपने से अलग कर दें, वो अपना जिसके साथ तुम हम-बिस्तर सिर्फ इसलिए नहीं हुए क्योंकि तुम्हारा रिश्ता एक बिस्तर के चार कोनों से अधिक विस्तृत है, तब तुम क्या करोगे और क्या करोगे जब किसी अनजान के बिस्तर में सिमटने के लिए तुम्हें छोड़ दिया जाए?
क्या हो अगर तुम्हें चंद रुपयों के लिए जलाया जाए, वो भी उनके हाथों जो तुम्हारा परिवार हुआ करते हैं।
मैं इज़्ज़त की भीख नहीं मांगती, वो मेरा हक़ है, क्योंकि जितना तुम इस समाज, इस दुनिया के हो, उतनी मैं भी हूँ!
तुम दलीलों की बात करते हो? तुम खुद को किसी अदालत का वकील बना कर मेरे ऊपर आरोप मढ़ते हो और फिर खुद ही जज बन कर उसकी सज़ा सुना देते हो। मेरी दलीलों को तुमने मेमने का मिमियाना समझा है, और खुद को वो कसाई, जिसे सिर्फ अपनी जेब को गर्म करने का ध्यान है, उस कराहते शोर से कोई मतलब नहीं।
मुझे इसलिए इज़्ज़त मत दो क्योंकि मैं कह रही हूं, ना इसलिए इज़्ज़त दो की मेरी व्यथा ऐसी है। मुझपर दया भी मत खाओ, ना ही हास्य की वस्तु बनाओ। मुझे इसलिए इज़्ज़त दो की मैं तुम जैसी ही हूँ.... मैं तुम ही हूँ...
This is my personal blog about my personal thoughts. Every person has a world deep inside him, the feelings and emotions which a person never share, even with himself or herself. The world which knows everything about that person, the world which no one else can see, the world which is buried deep inside our soul, its 'The World Within'
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Tuesday, 3 April 2018
तुम और तुम्हारा फेमिनिज़्म
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