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Tuesday, 10 April 2018

एक अनजान व्यक्ति

तेज़ रफ़्तार से गाड़ियां धुआं उड़ाते हुए निकल रही थीं।  हॉर्न का शोर था और उमस भरी रात थी। वक़्त तो ज़्यादा नहीं हुआ था, यही कोई 9 बजे होंगे। नोएडा की सड़कें धीरे धीरे शांत होती जा रहीं थीं। जो लोग सड़क पर दिख रहे थे वो या तो फुटपाथ पर ही अपनी ज़िंदगी गुज़ारने वाले इंसान थे या माचिस के डिब्बों में अपनी ज़िंदगी काटने वाले वो रोबोट थे जो 9-10 घंटे काम कर के अपने रिचार्ज सेंटर लौट रहे थे जिससे अगली सुबह फिर काम पर जा सकें।
मैं अपने एक जिगरी दोस्त से मिल कर अपने माचिस के डिब्बे में लौट रहा था। फुटपाथ पर मूर्तिकार बल्ब की रौशनी में अपनी मूर्तियां बनाने में लगे हुए थे। जिस फुटपाथ को आम लोगों के चलने के लिए बनाया गया था उसपर भगवन बैठे अपना आकार सुनिश्चित करवा रहे थे। थोड़ी दूर सड़क पर चलने के बाद गाड़ियों के गति से डर कर मैंने फुटपाथ पर ही चलना ठीक समझा।
उसी फुटपाथ पर कुछ दूर एक बाइक का मिस्त्री अपनी दुकान बंद कर रहा था। दुकान से थोड़ा सा आगे एक व्यक्ति फुटपाथ पर उकड़ू बैठा अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों में छिपाये हुए था। दूर से मैंने उसे नज़रंदाज़ कर दिया और तेज़ क़दमों से आगे बढ़ता रहा। जब उसके कुछ नज़दीक से गुज़रा तो मैंने ध्यान दिया कि वो व्यक्ति रो रहा है!
ओह! वो पथराई आँखें, बिलखता चेहरा, आंसू से गीली हो चुकी हथेली, मानो उसका सारा गम उसकी किस्मत की लकीर के रास्ते होता हुआ सूखी धरती को तर कर रहा हो।
मैं उसके पीछे से हो कर गुज़रा और कुछ दूर हट कर कुछ क्षण के लिए खड़ा हो गया। दूर से आती कार की रौशनी उसके चेहरे और पड़ रही थी। उम्र कोई 40-45 की थी। कपड़ों से निम्न वर्ग का साधारण सा व्यक्ति लग रहा था पर उसका दुःख, उसके आंसू, रुंधे गले का स्वर...वो असाधारण था। वो पागल नहीं था, वो शराबी नहीं था, वो जज़्बाती था...वो आंसू नहीं थे, जज़्बात थे जो उसकी आँखों से बह रहे थे।
किस बात का गम होगा उसको, किस दुःख को झेला होगा उसने, क्या उस दुःख को झेलनी की हैसियत थी उसकी?
दुःख को झेलने की हैसियत!
हाँ हैसियत! वो हैसियत जो अमीरी गरीबी से परे है, धर्म और जाती से भी परे है। हर किसी की औकात नहीं होती जो दुःख को झेल जाए। क्योंकि जिनमें उसे झेलने का बूता होता है ना वो उस तड़प को महसूस करते हैं, उनके गर्म आंसू रूह की वो आवाज़ होते हैं जो दूसरे नहीं समझ सकते।
उस आदमी को देख कर एहसास हो गया कि पैसे के मामले में शायद उसकी हैसियत कम हो, दुःख के मामले में हमसे उसकी हैसियत बहुत ज़्यादा है। मैं उसे कुछ देर वहीं खड़ा देखता रहा।
फिर शून्य खयालों से मुड़ा और अपने माचिस के डिब्बे की ओर जाने लगा। एक और कार की रौशनी उस व्यक्ति की ओर पड़ी और फिर वो परछाई अँधेरे में गुम हो गयी।

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