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Thursday, 19 August 2021

स्वतंत्रता दिवस का 'घोटाला'

भारत का सबसे बड़ा घोटाला 15 अगस्त और 26 जनवरी के दिन होता आया है जिसका मैं साक्षी रहा हूँ। स्कूल में मिलने वाली दो चॉकलेट कैसे 3, 4 या 5 में तब्दील हो जाती थी, ये ना ही कोई शराब कारोबारी समझ सकता है और ना ही किसी हीरा कारोबारी को इसका हुनर पता है। ये सिर्फ उन कुछ चुनिंदा आस्तीन के सांपों को पता है जो स्वतंत्रता दिवस या गणतंत्र दिवस के दिन दोस्त बनकर स्कूल में प्रवेश करते थे और स्कूल में दगा देकर कई चॉकलेटों की डकार मारते हुए घर की ओर प्रस्थान कर जाते थे।

'सावधानी हटी दुर्घटना घटी' का सबसे बड़ा उदाहरण जश्न-ए-आज़ादी के रोज़ नज़र आता था। स्कूल में बच्चों को दो-दो चॉकलेट भेंट की जाती थी। कुछ समझदार साथी उसी वक्त चॉकलेट निपटा देते थे मगर कुछ लड़के घर ले जा कर खाने में विश्वास करते थे। ऐसा नहीं है कि बाहर से चॉकलेट खरीद कर खाना बड़ी बात थी। मगर पहला तो ये कि लड़के कभी खुद से अपने लिए चॉकलेट जैसी फ़िज़ूल की चीज़ में पैसा इंवेस्ट नहीं करते...(प्रेमिका के लिये खरीदने का मसला अलग है), दूसरा कि लड़कों को अगर फ़िज़ूल की चीज़ भी मुफ्त में मिल जाये तो उसके लिए छीना-झपटी करने में परहेज़ नहीं करते।

'एक का डबल' वाला फार्मूला सिर्फ दोस्त की चॉकलेट चोरी कर के ही नहीं सिद्ध होता था। लड़कों में टीचर को भी डबल क्रॉस करने का हुनर कूंट-कूंट कर भरा था। 
'रोल नंबर 13, हैव यू गॉट द चॉकलेट्स?' लाइट की स्पीड से भी तेज़ इस सवाल का जवाब 'नो' में आता था। इधर नो निकला और उधर तीसरी चॉकलेट मिल गयी। हालांकि टीचर को गलती से भी याद रहा कि वो उस लड़के को चॉकलेट दे चुके हैं, तो पहले दी हुई चॉकलेट भी ज़ब्त कर ली जाती थी। 

घोटाले का दूसरा तरीका पहले से भी ज़्यादा इंटरेस्टिंग था। कई बार टीचर क्लास के मॉनिटर को चॉकलेट बांटने का ज़िम्मा दे देते थे, बिल्कुल वैसे ही जैसे सरकारी बाबू ठेका अलॉट करते हैं। लड़के लाइन से अपनी चॉकलेट लेने आते थे मगर घपलेबाज़ी में महारथ हासिल कर लिए कुछ साथी चॉकलेट लेने के बाद घूम कर उसी लाइन में फिर से लग जाते थे। इस केस में दो चीज़ें होती थीं...अगर मॉनिटर ने चॉकलेट बांटते वक़्त सिर्फ लेने वालों का हाथ देखा था और शक्ल नहीं तो फिर से उसी शख्स को चॉकलेट मिल जाती थी और अगर चेहरा देख भी लिया तो कूंटे जाने के डर से वो मुंह नहीं खोलता था। बहरहाल, आखिर के 15 बच्चों के लिए एक भी चॉकलेट नहीं बचती थी तो एसबीआई के हताश कर्मचारी की तरह मॉनिटर को आरबीआई को इस घोटाले की जानकारी देनी पड़ती थी। फिर एसबीआई पर जुर्माना के तौर पर उसके हिस्से की चॉकलेट में कटाई की जाती थी और तत्काल प्रभाव से लड़कों की डेस्क पर छापे मारे जाते थे। उसके बाद जो हश्र होता था उसका ज़िक्र करने की शायद आवश्यकता नहीं है।

कई बार ऐसा भी होता था कि 15 अगस्त या 26 जनवरी को लड़के एब्सेंट रहते थे तो उनके हिस्से की चॉकलेट शेयर्स के रूप में मौजूद लड़कों को बांट दी जाती थी। उस दिन स्कैम होते होते रह जाता था।

आप सभी को स्वतंत्रता दिवस की शुभकामनाएं 🇮🇳
#AA

Monday, 15 June 2020

'मीडिया और टीआरपी'

आप मीडिया को दलाल कहते हैं, शेमलेस कहते हैं, मगर ये नहीं समझ पाते कि मीडिया ऐसा इसलिए है क्योंकि आपने मीडिया को ऐसा बनाया है! आपने उसे ऐसा बनने पर मजबूर किया है। आप तो एक दस मिनट के पैकेज को कुछ सेकंड में बकवास बोल कर चैनल बदल देते हैं मगर उस पैकेज को बनाने में कितनी मेहनत लगती है आप उसे नहीं जानते। हर वक़्त चैनल या अखबारों को इसलिए कोसते हैं क्योंकि उनमें विज्ञापन बहुत ज़्यादा हैं मगर आपको अंदाज़ा नहीं है कि उस मीडिया संस्थान की मार्केटिंग टीम का कोई व्यक्ति कितनी मेहनत से एक-एक विज्ञापन लेकर आता है जिससे उसकी नौकरी बच सके और उसके साथ-साथ अन्य डिपार्टमेंट के लोगों की सैलरी उन्हें मिल सके। किसी न्यूज़ वेबसाइट को खोलते वक़्त उसमें आने वाले पॉपअप विज्ञापन से आप इतना इरिटेट हो जाते हैं कि उस वेबसाइट की खबर छोड़कर आगे बढ़ जाते हैं मगर आपको नहीं पता होता कि उस वेबसाइट में डेस्क पर बैठे लोग एक दिन में 15-20 खबर लिखने का टारगेट किस तरह पूरा करते हैं। सोशल मीडिया पर महज़ मात्रा की गलती या टाइपो एरर हो जाने पर आप उस खबर का स्क्रीनशॉट ले लेते हैं और उसे वायरल होने के लिए सोशल मीडिया पर छोड़ देते हैं मगर आपको अंदाज़ा नहीं है कि उस मीडिया संस्थान की सोशल मीडिया टीम में काम कर रहे व्यक्ति को कितनी शर्मिंदगी और प्रताड़ना झेलनी पड़ती है अगर उसकी छोटी सी गलती से उसकी संस्थान सोशल मीडिया पर ट्रोल होने लगे!

आप रिपोर्टरों को कोसते हैं कि वो लोगों को परेशान करते हैं या किसी की निजता का हनन करते हैं मगर आप ये भूल जाते हैं कि वो ऐसा अपने निजी स्वार्थ के लिए नहीं करते, वो अपनी नौकरी बचाने के लिए करते हैं। 

आपको लगता है कि मीडिया TRP का भूखा है? 
हां है! मगर ये भूख अप्रत्यक्ष रूप से आप उसके अंदर पैदा करते हैं! 

फर्ज़ करिए कि आपकी किराने की दुकान है। जिस इलाके में वो दुकान है, वहां अन्य कोई दुकान नहीं है...इसलिए आपका ग्राहक, आपके ही पास घर के ज़रूरी सामान लेने के लिए आता है। कोई सामान ना मिले तो वो उस दिन लौट जाता है और अगले दिन इस उम्मीद से फिर आता है कि शायद वो सामान आ गया हो। वो हमेशा आपके पास आता रहेगा, सामान चाहे अच्छा हो या खराब, ...अब अगर उसी इलाके में एक दूसरी किराने की दुकान खुल जाए तो ग्राहक के पास सामान खरीदने के लिए एक और विकल्प सामने आ जाता है। जब आपके यहाँ कोई सामान उपलब्ध नहीं होता तो वो उस दूसरी दुकान से खरीद लेता है। ऐसा करते-करते ग्राहक को दूसरी दुकान पर ज़्यादा भरोसा होने लगता है। इस स्थिति में आपकी दुकान में बिक्री कम होने लगती है। बिक्री बढ़ाने के लिए आप कोशिश करते हैं कि आप अपनी दुकान में वो हर सामान रखें जिसकी ज़रूरत ग्राहक को पड़ सकती है। 
कुछ वक्त बाद उस इलाके में एक और दुकान खुल जाती है, फिर एक और, एक और...और काफी दिन बाद उस इलाके में भीड़-भाड़ वाला बाज़ार सजने लगता है। अब आप अपनी बिक्री बढ़ाने के लिए हर संभव प्रयास करते हैं। ग्राहक को दिन में 10 बार खुद से फ़ोन कर के पूछ लेते हैं कि कहीं उसे किसी सामान की आवश्यकता तो नहीं...और अगर आवश्यकता होती है तो आप उसका सामान घर तक भी पहुंचा देते हैं। आप काफी कोशिश करते हैं मगर फिर भी आपकी बिक्री नहीं बढ़ती....तब आप कई कड़े कदम उठाते हैं और खर्चे बचाने के लिए सबसे पहले अपनी दुकान के 4 नौकरों में से 2 को नौकरी से निकाल देते हैं और बाकी 2 को ये चेतावनी देते हैं कि अगर वो ग्राहक नहीं लेकर आये तो उन्हें भी नौकरी से निकाल दिया जाएगा। 
अब वो 2 नौकर सुबह-शाम दुकान के बाहर खड़े होकर ग्राहक जुटाने में लग जाते हैं। जब ग्राहक आपकी दुकान के सामने से गुज़रता है तो नौकर उसे खींच-खींच कर आपकी दुकान में बुलाते हैं, ग्राहक इससे झुंझला भी जाता है और परेशान होकर नौकरों को भला-बुरा कह कर दूसरी दुकान की ओर बढ़ जाता है। देखते-देखते वक़्त ऐसा आ जाता है कि आपके पास खुद के खर्चे चलाने के लिए रुपये नहीं रह जाते, नौकरों को देना तो दूर की बात है....समस्या बढ़ती है और आपको आखिरकार अपनी दुकान बंद करना पड़ता है, नौकरों की भी नौकरी इसी चक्कर में चली जाती है....

TRP का खेल भी कुछ ऐसा ही है। दर्शकों को सब कुछ जानना है। उन्हें सबसे पहले हर खबर देखनी है। उन्हें खबर से जुड़ा हर पहलू समझना है मगर जब कोई रिपोर्टर ऐसा करता है तो दर्शक ही उसे कोसते हैं और कहते हैं कि ऐसे पत्रकार पत्रकारिता के नाम पर कलंक हैं!
आप जानते हैं कि स्वर्ग की सीढ़ी, अश्वत्थामा और तैमूर से जुड़ी खबरें चैनल क्यों दिखाता है? क्योंकि आप वो देखते हैं और जब आप वो देखते हैं तब चैनल की TRP रेटिंग बढ़ती है। 
चैनलों पर सुरक्षा मुद्दों पर बात करने के लिए एक पाकिस्तानी विशेषज्ञ इसीलिए बुलाया जाता है क्योंकि आपको ये देखने में मज़ा आता है कि कैसे भारतीय विशेषज्ञ उसे धूल में मिला रहे हैं। आप आंखें गड़ा कर टीवी देखते हैं जब एक रिपोर्टर जान पर खेलकर हिंसा से जुड़े क्षेत्रों से रिपोर्टिंग करता है और आप ही रस लेकर उस दृश्य को देखते हैं जब कोई पब्लिक फिगर रिपोर्टर को डांट देता है क्योंकि वो उसे सवाल पूछ-पूछ कर तंग कर रहा है। 
हर चैनल एक्सक्लूसिव दृश्य दिखाने के लिए इसलिए बेताब रहता है क्योंकि आप उन्हीं एक्सक्लुसिव दृश्यों को चैनल बदल-बदल कर तलाशते हैं और एक चैनल पर नहीं मिलता तो तुरंत दूसरे पर कूद जाते हैं। बेशक सुशांत सिंह राजपूत के रोते हुए पिता के सामने माइक लगा देना गलत है मगर आप इस सच को क्यों नहीं अपना लेते कि आपकी नज़रें उस चैनल पर टिक गई हैं जहां रोते हुए उसके परिवारवालों को दिखाया जा रहा है! 
मीडिया को गैर ज़िम्मेदार और शेमलेस कहने वाले लोग वहीं हैं जो कल सुशांत के मृत शरीर की फ़ोटो सोशल मीडिया पर वायरल कर रहे थे! 

बेशक आपको क्या देखना है वो आपको ही चुनना है, मगर ये आपकी ज़िम्मेदारी है कि आप ऐसी चीज़ें न देखें जिसको दिखाने के लिए एक रिपोर्टर को अपने जज़्बात ताक पर रखने पड़ते हैं। विश्वास मानिए, एक मीडियाकर्मी भी इंसान है, जिसके पास दिल है, जिसे पीड़ा होती है...भयावह खबरों को कवर करते समय या उनपर न्यूज़ लिखते समय एक मीडियाकर्मी का भी दिल पसीजता है मगर वो अपना दिल मज़बूत कर के और अपने जज़्बातों पर लगाम लगाकर आपके लिए वो खबरें लेकर आता है जो आप देखना चाहते हैं....ज़्यादा नहीं, मगर मीडियाकर्मियों से भी थोड़ी सहानभूति रखिये, उन्हें भी आपके प्रेम की आवश्यकता है...
#Ashutosh

Wednesday, 29 April 2020

एक अभिनेता जो था, जो है और जो रहेगा!

साल 2020 में बेशक ये साबित हो गया है कि सबसे बड़ा 'मदारी' वो ऊपर वाला है....रह-रह कर ऊपर वाले की बात इरफान खान की आवाज़ में कानों में गूंज रही है,
"तुम मेरी दुनिया छीनोगे, मैं तुम्‍हारी दुनिया में घुस जाऊंगा!"
हमने उसकी दुनिया के साथ जो सुलूक किया, उसने उसका बदला एक महान अभिनेता को अपने पास बुलाकर ले लिया। 
"जो कहूंगा नहीं समझोगे...5, 10, 15 साल बाद शायद कहे का असर होगा...गहरा!"
असर तो होने लगा है। अभी से ही। अब वो जज़्बात से भरी आंखें, वो चीखती खामोशी और असलियत को छूता अभिनय दोबारा देखने को नहीं मिलेगा।
इरफान अभिनेता नहीं जज़्बात हैं, वो जज़्बात जो उन करोड़ों लोगों के मन में कैद है जिनकी शक्ल-सूरत फिल्मों के लायक नहीं है मगर कहीं न कहीं उन्हें खुद को बड़े पर्दे पर जीना है। इरफान ने उन लोगों की परछाई प्रस्तुत की...आम आदमी को बड़े पर्दे पर दर्शाया और शायद आज वही आम आदमी इरफान के जाने से सबसे ज़्यादा दुखी है।
"ये शहर हमें जितना देता है, बदले में कहीं ज्‍यादा हम से ले लेता है"
शहर का तो पता नहीं मगर भगवान ऐसा ही...जो थोड़ा भी हमसे लेता है वो हमारे लिए बहुत होता है।
पान सिंह तोमर, हासिल, डी-डे, मदारी, हैदर, हिंदी मीडियम, लाइफ इन मेट्रो, पीकू...आप फिल्मों का नाम लीजिये और हर बार एक ऐसे इरफान की शक्ल ज़हन में आती है जो पिछली फिल्म से अलग होती है। 
लॉकडाउन के पहले मैंने जो आखिरी फ़िल्म देखी थी वो इरफान की ही अंग्रेज़ी मीडियम थी...और उस फिल्म को देखकर इरफान खान से फिर प्यार हो गया था। 
"टोटल तीन बार इश्क़ किया, और तीनों बार ऐसा इश्क़, मतलब जानलेवा इश्क़, मतलब घनघोर, हद पार!"
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था...इरफान की तो सभी फिल्में बेहतरीन थीं, मगर मदारी, पान सिंह तोमर और अंग्रेज़ी मीडियम मेरे दिमाग में चिपक गयी हैं। 
इरफान से जुड़ी पहली याद 'हासिल' फ़िल्म की है। फ़िल्म इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर बनी थी इसलिए भी बेहद करीब थी और उसमें इरफान का अंदाज़... 
"...और जान से मार देना बेटा, हम रह गये ना, मारने में देर नहीं लगायेंगे, भगवान कसम!"
काश की इरफान रह जाते। अभी उनको और देखना था। उस बड़े कलाकार को बूढ़ा होते देखना था। उनके अंदाज़ पर तालियां पीटनी थीं मगर ये बात भी सच है कि "डेथ और शिट, किसी को, कहीं भी, कभी भी, आ सकती है!"

होनी को कोई नहीं टाल सकता...इरफान हमारे बीच नहीं हैं...अब सिर्फ हैं तो उनकी फिल्में...जिसके सहारे आने वाली पीढ़ी ये जानेगी कि इरफान खान होने के क्या मायने थे। 
रूहदार ने सच ही कहा था, "दरिया भी मैं दरख्त भी मैं, झेलम भी मैं, चेनाब भी मैं...दैर हूँ, हरम भी हूँ...शिया भी हूँ, सुन्नी भी हूँ...मैं हूँ पण्डित!...मैं था, मैं हूँ, और मैं ही रहूँगा..."
#Ashutosh

Saturday, 18 April 2020

मेरा पहला सफेद बाल

सुबह शीशे के सामने खड़े हो कर ब्रश करना इसलिए भी ज़रूरी होता है जिससे चेहरे को अलग-अलग एंगल से देर तक देखा जा सके। आज की सुबह भी अलग नहीं थी। ब्रश करते-करते चेहरे के तमाम हिस्सों पर नज़र दौड़ रही थी कि तभी सर पर नज़र पड़ी और मैं हैरान रह गया! माथे के ठीक ऊपर वाले बालों पर एक पतला, कमज़ोर सा बाल सफेद दिखाई दे रहा था। पहली नज़र में तो लगा कि लाइट शायद इस अंदाज़ से पड़ रही होगी कि बाल चमक रहा होगा। मगर मामला गंभीर था तो अंदाज़े पर रफा-दफा करना ठीक नहीं था। उसी वक़्त ब्रश करने जैसे निरर्थक कार्य को बीच में ही समाप्त कर के मैंने बड़े ही एहतियाद से बाल को परखना शुरू किया। उस पतले, कमज़ोर और महीन बाल का रंग वाकई सफेद हो चला था। 
क्या मैं बूढ़ा हो रहा हूँ? क्या अभी से सारे बाल पक जाएंगे? सवाल तो मन में कई उठ रहे थे मगर उन सवालों के बारे में सोच कर चिंता नहीं हो रही थी। खयाल आया कि जॉर्ज क्लूनी की तरह सारे बाल सफेद कर लेंगे। या डॉक्टर स्ट्रेंज की तरह दोनों तरफ की कलम के आसपास के बालों को सफेद छोड़ कर बाकी के बालों को काला रंग लिया जाएगा। 
कुछ वक्त बाद लगा कि अभी उम्र ही क्या है, इतनी जल्दी तो बाल नहीं सफेद होना चाहिए था, फिर ध्यान आया कि स्कूल के दौरान ही कुछ दोस्तों के बाल सफेद हो गए थे। 
वैसे देखा जाए तो बाल हमेशा के लिए सफेद हो जाना कितना अजीब है ना! आधी ज़िंदगी बाल के जिस रंग की आदत हो गयी थी अब बाल वैसे न रह कर उस रंग के हो जाएंगे जिससे लोग आपको बुज़ुर्ग समझने लगेंगे। एक बार गुरुजी ने कहा था कि बाल पक जाने का अलग आनंद होता है, मगर अब महसूस हो रहा है कि उन्होंने ये तो बताया ही नहीं कि जब सर पर पहला सफेद बाल दिखाई दे तो उसे अपनाया कैसे जाए। ज़ुल्फ़ों पर हाथ फेरने में डर बना रहेगा कि कहीं वो एक बाल टूट गया और उससे सारे बाल सफेद हो गए तो! 
कुछ देर के लिए अजीब सा एहसास होता रहा। न जाने किस बात का...फिर बालों को झाड़ने के बाद वो सफेद बाल आसानी से नज़र नहीं आया इसलिए उस पर से ध्यान हट गया। वैसे अब मैं भी आधिकारिक रूप से कह सकता हूँ कि मैंने धूप में बाल नहीं सफेद किये हैं!
#आशुतोष

सही-गलत के बीच फंसा धर्म

हो ये रहा है कि पूरी शिद्दत से गलत को गलत कहा जा रहा है और साथ ही ढिंढोरा पीट-पीट कर सही को सही भी कहा जा रहा है...मगर समस्या ये है कि खुद की गलत मान्यताओं या कृत को कोई गलत नहीं कह रहा और दूसरे की मान्यताओं या कृत को गलत ठहराने की होड़ लगी है। 
अपनी गलती को ढकने के लिए सामने वाले की गलती को उजागर किया जा रहा है। खुद की गलती को छोटा बताने के लिए दूसरे की गलती को बड़ा बनाया जा रहा है। कहा ये जा रहा है कि अकेले मैं ही गलत नहीं हूं तुम भी गलत हो...और इस उधेड़बुन में कोई ये ध्यान नहीं दे रहा कि दो गलत चीज़ों को जोड़ कर सही चीज़ की उतपत्ति नहीं होगी। 
तुम अगर हिन्दू हो और मुसलमान की गलती ढूंढ रहे हो या फिर तुम मुसलमान हो और हिन्दू की गलती ढूंढ रहे हो तो तुम वाकई अंदर से खोखले हो क्योंकि दूसरे पर सवाल उठाने से पहले अगर तुम खुद ही अपनी कमियां और खामियां नहीं देख पा रहे तो तुम कट्टरपंथी विचारधाराओं के द्वारा मूर्ख बनाये जा चुके हो। 

ये सच है कि हर किसी के लिए उसका धर्म सम्मानजनक है, इसलिए किसी और के द्वारा बार बार उसपर सवाल उठाया जाना गलत है, लेकिन तुम खुद भी अपने धर्म और उसके गलत कृत पर अगर सवाल नहीं उठा रहे तो समझ जाओ कि तुम धर्म के चंगुल में फंस चुके हो।
खुद को अपने धर्म का रक्षक समझना बंद करो! और बंद करो अपने ज़हरीले दिमाग के साथ सोशल मीडिया के अखाड़े में कूदना! 5-6 इंच के मोबाइल फोन से तुम अपने 'धर्म' को बचाने के लिए जिस धर्म युद्ध को इस सोशल मीडिया पर छेड़ रहे हो उसकी ज़रूरत नहीं है! बंद करो ये सोचना कि धर्म खतरे में है क्योंकि जिस धर्म की गलत तस्वीर तुम्हारे प्रिय नेताओं ने तुम्हें दिखाई है वो असल धर्म नहीं है! तुम्हें अगर धर्म के लिए कुछ करना है तो घर में बैठकर एक दूसरे के धर्म पर कटाक्ष करना बंद करो! उस धर्म के लोगों के उत्थान के लिए कुछ करो! तुम्हें अपने धर्म की अच्छाई बताती एक फेक न्यूज़ मिलती है और तुम उसे झटपट सोशल मीडिया पर शेयर कर देते हो ताकि तुम दूसरे धर्म वाले पर हमला कर सको और ये बात सको कि तुम्हारा धर्म उसके धर्म से कितना महान है! 
ये धर्मों की तुलना करने से, और एक को दूसरे से बेहतर बना लेने से तुम क्या हासिल कर लोगे? राजनीतिक दलों ने हमें बिना बताए अपने अपने धर्मों का 'रक्षक' बना दिया है...विश्वास मानो धर्म को ऊंचा या नीचा दिखाने का ये खेल इतना बुरा है कि इसका कोई अंत नहीं है क्योंकि कोई भी दूसरे पर लांछन लगाने का मौका नहीं छोड़ना चाहता। 

क्या वाकई हमें अपने धर्म को लेकर इस प्रकार संवेदनशील होने की ज़रूरत है और इस कदर कि ज़हर फैलाते फैलाते हम खुद ज़हर बन जाएं!
खतरे में धर्म नहीं इंसान है और इस देश का हर नागरिक जिसने आंखें मूंद रखी हैं। 
अक्सर फेसबुक पर हम ये तंज़ मारते हैं कि 'अब फलाने धर्म के लोग चुप रहेंगे' या 'अब फलाने धर्म के लोग इसपर कुछ नहीं बोलेंगे'...सोच कर देखिए तो आप पाएंगे कि आप वाकई चुप हैं, क्योंकि आप सही चीज़ों के खिलाफ सवाल नहीं खड़ा करते! आप बेरोज़गार हैं तो आप क्यों नहीं आवाज़ बुलंद करते कि काबिल होने के बावजूद आपको नौकरी क्यों नहीं मिल रही! आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते कि आपके शहर की सड़कें क्यों नहीं बनती! आपके धर्म के नेता आपको ये कह कर भड़काता है कि आप खतरे में हैं तो आप उससे ये सवाल क्यों नहीं पूछते कि अगर हमने तुम्हें चुना तो तुम हमें खतरे से कैसे बाहर निकालोगे? मगर ये सवाल तो काफी उलझे हुए हो जाएंगे! आपको अगर धर्म पर ही सवाल करना है तो अपने अपने धर्मों पर नज़र क्यों नहीं डालते! क्यों नहीं पूछते कि हमारे धर्म में ये जो कृत हो रहा है वो क्यों हो रहा है....मगर नहीं! आपको सिर्फ लड़ना है, दूसरों पर सवाल खड़े करने हैं और फिर सोचना है कि देश तरक्की क्यों नहीं कर रहा! देश इसलिए तरक्की नहीं कर रहा क्योंकि आप खुद को बदलना नहीं चाह रहे। आप राजनीतिक दलों की कठपुतली बने रहना चाहते हैं। आप अगर किसी भी पार्टी के अंध समर्थक हैं या अंध विरोधी हैं तो आप भी भक्त की ही श्रेणी में आते हैं, इसलिए खुद को भी ये उपाधि दे दीजिएगा। 
अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात, आप देश में रहते हैं, अपने नेता चुनते हैं इसलिए उन्हें आपके जीवन को बेहतर करने का ज़रिया बनने दीजिये, आप उनकी राजनीति चमकाने का ज़रिया मत बनिये...रही बात धर्म की, तो ये शाश्वत सत्य है कि व्यक्ति पैदा होते के साथ ही धर्म में बंध जाता है मगर इसके ये मायने नहीं हैं कि आप मानवता भूल जाएं!
Jai Hind!
#Ashutosh

Tuesday, 31 March 2020

जवान होती धरती, बंदिशों में इंसान

जिस आसमान को अब तक आग बरसाना शुरू कर देना चाहिए था वो पानी बरसाए जा रहा है। बादलों में जैसे बरस जाने की होड़ लगी है। जिस हवा से अब तक होंठों पर पपड़ियां पड़ जानी चाहिए थीं उसकी सोहबत बदली सी लग रही है। सड़क पर पड़ी नीम की पत्तियां ही एक मात्र सबूत हैं कि पतझड़ बीत रहा है। सड़कें किसी विधवा की मांग की तरह सूनी हो चुकी हैं। घरों के अंदर सुगबुगाहट तो है मगर इंसानी शोर शून्य हो चुका है। लग रहा है मानो मुर्दों की बस्ती है। शोर है, कुत्तों का, जो अब रोड पर अपना मालिकाना हक समझने लगे हैं। किसी घर के अंदर से बर्तन गिरने की आवाज़ आती है तो लगता है कोई अपशकुन होने वाला है। ये दौर अपशकुन का है।
ये अंत है...अंत ही तो है! लग रहा है प्रकृति करवट ले रही है। सालों तक मानवता ने उसका बलात्कार किया है। शायद अब उसने हिसाब चुकता करने का प्रण लिया है। 
हर दिन मौत की खबर आ रही है,...इंसान की, यहां से, वहां से...उन जगहों से भी जहां लोगों ने मौत पर विजय पा लेने का दावा किया था। इंसान के बीच दायरे बन चुके हैं। अब कोई किसी से नहीं मिलता। हाथ मिलाने से भी कतराते हैं। हर कोई फिक्रमंद है। ये दौर फिक्र करने का है, अपनों की फिक्र। हर सुबह उठ कर लगता है कि बस आज का दिन गुज़र जाए। गुज़र रहे हैं, दिन और उसके साथ वो लोग भी जो किसी न किसी के अपने थे।
घरों में कैद, कमरे में बंद, बाहर कोई दुर्गा का पाठ कर रहा है। मगर दुर्गा सब देख रही है। हंस रही है। उसकी बूढ़ी धरती फिर जवान हो रही है। 
कूड़ा ले जाने वाली गाड़ी अब भारत को स्वच्छ रखने के गीत नहीं गाती। मौत से बचने के उपाय दे जाती है। चौकीदार गेट के कोने पर दुबका बैठा रहता है। अब वो रात को सीटियां बजाता, घर की खिड़कियों से अंदर नहीं झांकता है। अंदर झांकती है अब लाचारी, असहाय होने की लाचारी। लोग अपने अंदर मौत लिए घूम रहे हैं। वो मौत जो एक एक कर के सबको निगलती जा रही है। किसी के मुंह से होकर किसी के हाथ के सहारे भीतर घुसती जा रही है।
मंदिर की घंटी, अज़ानें शांत हैं, चर्च की लॉ बुझ चुकी, गुरुद्वारे की अरदासें शांत हैं। शांत वो हंगामा भी है जो धर्म और समुदाय में बंधे लोग करते थे। सियासत घुटनों पर आ चुकी है। ट्रेनें न जाने किस स्टेशन पर गुमसुम सी खड़ी हैं। बसें भी सवारी का रस्ता देख रही हैं। मज़दूर सर पर मुफलिसी की गठरी उठाये निकल पड़े हैं...अपने घरों की ओर,जो मीलों दूर से, बहुत दूर से उन्हें बुला रहे हैं। उनके चेहरे पर खौफ है...खौफ है मर जाने का...खौफ है इस बात का कि वो मर गए तो उनके परिवार का पेट कौन भरेगा। 
ये दौर खौफ का है...और ये खौफ उन लोगों में भी है, जिनकी रगों में अमीरी खून बनकर बहती थी, जो हर मर्ज़ पर दौलत से मरहम लगा सकते थे। हर चेहरा खौफ को नकाब से ढके, चरमराई हिम्मत से सड़कों पर निकलने की कोशिश कर रहा है, पर हार जा रहा है। 
चिड़ियों का कलरव, नीला आसमां और लहराते हरे पेड़ देखकर लग रहा है, जैसे प्रकृति झूम रही है, जैसे अरसे बाद अपने प्रियतम से मिल रही है। 
मगर इंसान, इंसान बेचैन है। मौत सर पर खड़ी नाच रही है और इंसानों को अपनी उंगलियों को पर नचा रही है। रातें उदास मालूम हो रही हैं और दिन चहकते हुए से लग रहे हैं। लग रहा है जैसे अस्तित्व मिटने वाला है, मानव का, मानवता का और उस अहंकार का जिसने मानव को अन्य जीवों से बेहतर प्राणी घोषित कर दिया था। 
हर कोई एक दूसरे को हौसला दिलाये जा रहा है, मगर वो खुद अंदर से खोखला हो चुका है और हौसला, पंख लगाकर बादलों के पार उड़ गया है। 
तभी एक रोज़ बारिश थम जाती है। सूरज निकलने लगता है। किरणे चेहरे को छूती हैं, फिर मन को। बेचैनी थम जाती है। दिल स्थिर हो जाता है। हौसला रखो। कानों में एक आवाज़ गूंजती है...हौसला रखो!

Sunday, 1 March 2020

दिल्ली हिंसा पर

पढ़े लिखे हिन्दू मुसलमानों द्वारा उपद्रव मचाने की तस्वीरें, वीडियो, और खबरें सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे हैं। पढ़े लिखे मुसलमान हिंदुओं द्वारा उपद्रव मचाने की तस्वीरें, वीडियो, और खबरें सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे हैं।

जाहिल हिन्दू और मुसलमान इन तस्वीरों, वीडियो और खबरों को देख कर सड़क पर कूद जा रहे हैं।
मीडिया दिन-रात दंगाइयों को ही दिखाए जा रहा है। वो कह रहा है कि जो हो रहा है हम तो वही दिखा रहे हैं।

 सरकारें सोई हैं, बस एक एडवाइज़री जारी कर देती हैं कि मीडिया कोई भी भड़काऊ चीज़ें न दिखाए। 
मीडिया मान जाता है मगर अपने चैनल की छोटी खिड़कियों के दरमियाँ ऐसी कमरों में बैठे प्रवक्ताओं को चुप नहीं कराता।

पढ़े लिखे सरकार को दोष दे रहे, सरकार पढ़े लिखों को दोष दे रही है, मीडिया दोनों को दोष देते दिखा रहा है और सड़क पर पागल भीड़ एक दूसरे की जान लेने पर तुले हैं। 
उन 22 लोगों की मौत के और उस एक पुलिसवाले की मौत के हम सब ज़िम्मेदार हैं।

ब्रो, it's about ब्रा!

सोशल मीडिया पर M TV द्वारा एक मुहिम चलाई जा रही है #MTVBaarBraDekho 
बार ब्रा देखो! रियली!
ब्रा होना आसान नहीं है जनाब! खूबसूरत होने के बावजूद अगर गलती से दिख जाए तो समाज की भावनाएं आहत हो सकती हैं। ब्रा के साथ तो दलितों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। अगर कोई पढ़ा लिखा दलित किसी बड़े ओहदे पर पहुँच जाए तो कम से कम उसकी इज़्ज़त तो होती है, मगर एक ब्रा की किस्मत में दुत्कारा जाना ही लिखा है फिर चाहे वो एक करोड़ रुपए कमाने वाली महिला के बदन से चिपकी हुई हो या एक हज़ार रुपये कमाने वाली स्त्री से!

ब्रा के अस्तित्व पर वैसी ही जंग छिड़ी है जैसे आस्तिक और नास्तिक के बीच भगवान के अस्तित्व को लेकर छिड़ी रहती है। एक पक्ष उसके होने को ही नकार देता है और दूसरा उसकी मौजूदगी साबित करते-करते थक जाता है।

लड़कियों के लिए ब्रा को पहनना और उसका ना दिखना एक दूसरे से इन्वर्स्ली प्रोपोर्शनल है। वैसे लड़कियों की ज़िंदगी भी बेहद कठिन है। सारी ज़िंदगी कुछ न कुछ बदन से चिपकाए ही रहना पड़ता है। पैदा होते ही डायपर चिपका दिया जाता है, थोड़े बड़े होने पर पैड और फिर कुछ वक्त बाद ब्रा, और फिर ब्रा और पैड का बोझ उठाये-उठाये ज़िंदगी आधी से ज़्यादा बीत जाती है। बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम रखते ही पैड से पीछा छूट जाता है और कुछ वक्त बाद ब्रा से भी रिश्ता खत्म होने लगता है मगर एक उम्र आते-आते डायपर फिर से शरीर की ज़रूरत बन जाता है जो अंत तक शरीर से जुड़ा रहता है।
शायद मैं किसी कट्टर फेमिनिस्ट की तरह साउंड कर रहा होऊंगा मगर फिलहाल मैं ब्रा की आपबीती शेयर करने में इंटरेस्टेड हूँ...महिलाओं की फिर किसी रोज़ बताऊंगा।

तो, मैं ये बता रहा था कि ब्रा होना कितना कठिन है!
कई बार सोचता हूँ कि अंडरगारमेंट्स की दुनिया की बनियान डोमिनटेड सोसाइटी में ब्रा होना श्राप है! उसे सूरज की किरणें भी ठीक से नसीब नहीं हो सकतीं। साड़ी, टीशर्ट या किसी अन्य कपड़े के नीचे रह कर ही उसने मौसमों का आनंद लिया है। ब्रा अपने जीवनकाल में या तो चांद से रूबरू होती है या फिल्टर के साथ सूरज देख पाती है। वो तो अपनी मालकिन का चेहरा भी कभी ठीक से नहीं देख पाती। हां कभी-कभी कुछ परवर्ट नज़रों से आंखें मिल जाती हैं मगर फिर उसे संकोच के साथ कपड़े के अंदर छुपा लिया जाता है। उसे अपने रंग पर भी गुरूर करने का मौका नहीं मिलता। कपड़ों की दुनिया में जहां काली टीशर्ट कूल बन जाती है वहां बिचारी काली ब्रा स्लट का ही खिताब हासिल कर पाती है।
इन सबके बावजूद वो सहारा प्रदान करती हैं मगर इसी बीच न जाने कहाँ से कल्चर और सोसाइटी का झंडा हाथ में थामे एक आंटी प्रकट होती हैं और आकाशवाणी की तरह अनाउंस करते हुए निकलती हैं - तुम्हारी ब्रा दिख रही है...बस फिर क्या, खुली हवा में सांस ले रही ब्रा को फिर कपड़े के अंदर ढकेल दिया जाता है।
वो यही सोचती है कि मेरा किरदार भी तो बनियान जैसा ही है मगर उस मासूम को ये नहीं पता होता कि जब समाज में औरतों को पुरुषों के बराबर दर्जा नहीं मिलता तो उसको बनियान के बराबर होने का मौका कैसे मिल जाएगा।
खैर, ब्रा को बराबरी का दर्जा दिलाना आसान है। करना ये है कि उसकी बराबरी के लिए उसे दूसरों पर थोपना नहीं है। उसे बस स्वाभाविक और आम बनाना है। वो तभी हो सकता है जब उसे कपड़ों के नीचे नहीं, अन्य कपड़ों के साथ उसके बगल में सुखाने को छोड़ दिया जाए। जब उसे गुरमेठ कर अलमारी में सबसे अंदर नहीं, बाकी के कपड़ों के साथ रखा जाए। जब उसे बदन को कसाव देने वाला महज़ एक कपड़ा माना जाए.... और जब उसे पहनने वाले उसे सिर्फ इसलिए ढकने की सलाह न दें क्योंकि उसे देख कर समाज को आपत्ति होती है! तभी कोई ब्रा ये कह पाएगी कि 'ब्रो, अगले जन्म मोहे ब्रा ही कीजो!'

Monday, 16 December 2019

जाने वाले दशक को अलविदा!

2019 खत्म होने को है। इस साल के खत्म होने के साथ ही एक दशक का अंत हो रहा है। पिछले दशक ने व्यक्तिगत तौर पर मेरे अंदर कई बदलाव किए साथ ही इस देश में भी परिवर्तन को जन्म दिया।

2010, दशक की शुरुआत स्कूल में ही हुई। ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पलों को जी रहा था। 10वीं की बोर्ड परीक्षा दे कर 11वीं क्लास में आया था। वो क्लास जिसने हलका-हलका ये अनुभव देना शुरू कर दिया था कि स्कूल से निकलने के बाद जीवन और कठिन होने वाला है, फिर भी फिक्र को स्कूल कैंटीन के समोसे की भाप में उड़ाता चला जा रहा था। लगभग सारे पुराने सब्जेक्ट से याराना खत्म हो चुका था और कॉमर्स, एकाउंट्स और इकोनॉमिक्स जैसे नए साथी मिल गए थे। उसके साथ ही एक बड़ी जिम्मेदारी भी। हिंदी साहित्य समिति का उपाध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। खुद के अंदर दायित्वों को पूरा करने की शक्ति महसूस होने लगी, कुछ खुद से, कुछ गुरुओं के मार्गदर्शन से। कई नए दोस्त बने,कई पुरानी दोस्ती की नींव डगमगाने लगी मगर ज़िंदगी बेहद खूबसूरत ढंग से बीत रही थी।

10वीं के बाद 11वीं में भी ट्यूशन करना पड़ा मगर दूसरी जगह। वहां नए शिक्षक मिले और नए दोस्त बने। सब मुसलमान थे...मगर उन दिनों हम हिंदू मुसलमान से ज़्यादा महज़ इंसान हुआ करते थे। शिक्षक भी मुसलमान थे मगर इस बात का कभी फर्क नहीं पड़ा, ना उन्होंने कभी एहसास दिलाया, ना मैंने कुछ अलग महसूस किया। वो सिर्फ गुरु थे और मैं उनका शिष्य। उनकी डांट सुन कर बुरा भी लगा तो अपने लिए सबके सामने पढ़े गए तारीफ के कसीदों से खुशी भी हुई। उनका दिया एक गुरु मंत्र आज भी याद है, 'कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे!'

2011 में 12वीं क्लास के रंग भी देखे। विद्यालय का सबसे सीनियर विद्यार्थी होने का सुख भी अपने में अनोखा होता है। 12वीं में हिंदी एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उसी वक़्त धोनी की कप्तानी में भारत ने क्रिकेट का विश्वकप अपने नाम कर लिया। यूँ तो मैं स्पोर्ट्स प्रेमी नहीं हूं मगर वो पल आज भी मेरे ज़हन में कैद है।
वो पहली बार था जब न्यूज़ में बेहद रुचि होने लगी, सिर्फ खेल या मनोरंजन की खबरों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि दिल्ली के रामलीला मैदान में एक मराठी भाषी टूटी फूटी हिंदी में पूरे देश को एक सूत्र में बांध रहा था। राजनीति के प्रति पैदा हुई रुचि के साथ बदलाव की एक किरण मुझे भी दिखने लगी। पता नहीं कौन से बदलाव की, पता नहीं क्या बदलने वाला था, मगर अन्ना को देख कर हौसला बढ़ रहा था।

2012 की शुरुआत में बोर्ड परीक्षा का डर सताने लगा...वैसे डर एक और चीज़ का सता रहा था, वो था दुनिया खत्म होने का। उसी साल दिसंबर के महीने में दुनिया खत्म होने की घोषणा हो चुकी थी। रह रह कर वो ख्याल दिमाग में तैर जाता था। 2012 की शुरुआत में ही बड़ी बहन की शादी के कारण प्री-बोर्ड की परीक्षा नहीं दे पाया था। आज भी उस बारे में सोचता हूँ तो निश्चित नहीं कर पाता कि परीक्षा न देने का निर्णय सही था या गलत!

खैर, मार्च में बोर्ड की परीक्षा खत्म हो गयी और कॉलेज के एंट्रेंस की ओर पूरा ध्यान केंद्रित हो गया। स्कूल से निकलना खुद पर पहाड़ टूटने जैसा था। स्कूल से निकलने का मतलब था कि 13 साल के बने बनाए शेड्यूल को एक झटके में तोड़ना, स्कूल के दोस्तों से रोज़ न मिलना, बेफिक्र ज़िंदगी को अलविदा कहना। स्कूल से निकलते ही ज़िंदगी बदल गयी थी।

बोर्ड के नतीजे आने के बाद एक ओर जिधर एंट्रेंस की हलचल थी वहीं दूसरी ओर विधानसभा चुनावों का शोर शहर में चारों ओर सुनाई दे रहा था। राजनीति में रुचि रखने वाले दोस्तों और बड़ों से पता चला कि समाजवादी पार्टी का सत्ता में आना लगभग तय है। राजनीति में बहुत ज़्यादा रुचि तो नहीं थी मगर फिर भी चुनावी तैयारियां और उनके बारे में सुनना अच्छा लगने लगा।

नतीजे आये...एंट्रेंस परीक्षा के भी और चुनाव के भी। नतीजे आने के बाद सिर्फ मैं ही नहीं दुखी था जिसका इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बीएचयू के मेन ब्रांच में बीकॉम में चयन नहीं हुआ था, 'बहन जी' भी दुखी थीं जिन्हें अपनी सत्ता त्यागनी पड़ रही थी.

मुझे पता लग चुका था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की भी पढ़ाई होती है...मैंने बिना वक़्त गंवाए उसका फॉर्म भरा और परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर एंट्रेंस में चौथा स्थान हासिल किया। लग रहा था जैसे चारों ओर शंखनाद हो रहा हो। वैसे शंखनाद तो हो रहा था क्योंकि उत्तर प्रदेश में समाजवादियों के युवराज सत्ता पर आसीन हो चुके थे। सत्ता में आते ही अखिलेश यादव ने विद्यार्थियों को मुफ्त के लैपटॉप बांटने वाली स्कीम की घोषणा कर दी थी और इसी के साथ मुझे 2013 में मेरा पहला लैपटॉप मिला था।
इधर मैंने पहली बार कॉलेज की दहलीज़ पर कदम रख दिया था। 2012 से 2015 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज ने मुझे एक अलग पहचान दी, साथ ही ऐसे लोगों का साथ दिया जो ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए।

वैसे इन तीन सालों को इतनी जल्दी फ़ास्ट फारवर्ड नहीं किया जा सकता।
2012 के निर्भया मामले ने देश को जिस तरह से एक जुट किया वो देखने लायक दृश्य था। उस वक़्त दिन भर टीवी से लग कर यही देखता था कि दोषियों को कब और कैसे सज़ा होगी। वैसे उसी साल मुझे पहली बाइक मिली थी। वैसे मुझे रफ्तार का शौक नहीं था मगर उस साधारण सी बाइक पर बैठ कर भी धूम के जॉन अब्राहम वाली फीलिंग आती थी।

साल 2013 में जहां मेरा पसंदीदा खिलाड़ी क्रिकेट की दुनिया को अलविदा कह रहा था वहीं दूसरी ओर राज्य की राजनीति का एक मंझा हुआ खिलाड़ी केंद्रीय राजनीति में ओपनिंग करने को तैयार था।
सचिन के रिटायरमेंट के बाद क्रिकेट से अचानक मेरी रुचि खत्म हो गयी मगर मोदी जैसे कुशल वक्ता को सुनकर राजनीति में भी फिल्मों जैसी रुचि पैदा होने लगी थी।
2G, CWG और 'जीजाजी' से देश इतना त्रस्त हो चुका था कि लोगों को यकीन होने लगा था कि अच्छे दिन ज़रूर आएंगे। वैसे अच्छे दिन आये भी, काफी हद तक देश के, उससे थोड़ा अधिक हद तक बीजेपी के! लंबे वक्त के बाद बीजेपी को लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल हुई और 2014 में नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए।

एक ओर जहां पीएम मोदी के विदेश दौरे शुरू हो चुके थे, दूसरी ओर 2015 में भारत की सर्वश्रेष्ठ पीरियड फ़िल्म बाहुबली बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी थी। 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?', फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद देश में दूसरा सर्वाधिक पूछे जाने वाला सवाल बन गया था। पहले नंबर पर, '15 लाख रुपये खाते में कब आएंगे?', सवाल बरकरार था।

2015 में कॉलेज खत्म होने के बाद नौकरी के लिए दौड़ भाग शुरू हो गयी। इसी बीच बड़े भाई की शादी के बाद इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से निकल कर दिल्ली और नोएडा में ज़िंदगी गुज़रने लगी। दूरदर्शन और इंडिया न्यूज़ में ट्रेनिंग करने के बाद इंडिया टुडे में पहली नौकरी हाथ लगी।

इस बीच सोशल मीडिया पर ट्रोल्स की फौज खड़ी होना शुरू हो गयी थी। सत्ताधारी पार्टी देशभक्ति का पर्याय बन गयी थी और उसके खिलाफ खड़ी होने वाली हर शक्ति देशद्रोही बन गयी थी। देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटे जाने शुरू हो गए थे। एक पार्टी और एक व्यक्ति के लिए समर्थन, प्रेम में बदलता जा रहा था। ऐसा प्रेम जिसके साय में उस पार्टी और व्यक्ति का हर गुनाह नज़रअंदाज़ किया जाना शुरू हो चुका था। आलम ये था कि लोग अपने प्रधानमंत्री से सिर्फ इसलिए प्यार करने लगे थे क्योंकि वो 4 घंटे सोते थे और नवरात्रि पर व्रत भी रहते थे।
चीज़ें फिर भी काफी हद तक सामान्य थीं मगर 2016 में बंधी कलाइयां खुलने लगीं। मुकेश अंबानी प्रसन्न देवता की तरह प्रकट हुए और वरदान स्वरूप देशवासियों को मुफ्त का इंटरनेट बांटने लगे। इंडिया टुडे में रहते हुए मुझे भी फ्री में जियो का सिम प्राप्त हो गया था।

जियो का सिम आते ही देश में इतना बड़ा बदलाव आया कि सब हैरान रह गए। अब भारत का युग BC और AD में नहीं BJ ( Before Jio) और AJ (After Jio) से आंका जाने लगा। देश का युवा जो अखबार, पुस्तकों के नज़दीक था, देश से जुड़ी समस्याओं पर सोच विचार करता था, वो अब इस बात पर विचार करने लगा कि 1 GB डेटा पूरे दिन में कैसे खत्म किया जाए।

धीरे-धीरे वीडियो कंटेंट में इतनी वृद्धि हुई कि हर दूसरा व्यक्ति वीडियो कंटेंट का क्रिएटर बन गया। लोगों ने पढ़ना कम कर दिया, वीडियो देखना अधिक कर दिया मगर इस बात से अनजान रहे कि वीडियो की दुनिया में फेक न्यूज़ और फ़र्ज़ी वीडियो का बाज़ार भी बढ़ रहा है। इन्हीं फ़र्ज़ी वीडियो और खबरों को देख कर लोगों में द्वेष इतना बढ़ गया कि महज़ अफवाहों पर लोगों को पीट पीट कर मार डालने की प्रथा शुरू हो गयी।

2016 के अंत में नौकरी करते एक ही साल हुए थे कि सरकार ने 500-1000 के नोटों को बंद कर सबको सकते में डाल दिया। नोटबंदी के कुछ ही दिन बाद बड़े भाई की शादी हुई जिसमें घरवालों को काफी मुश्किल हुई थी। आम जनता में नोट बंदी के फैसले को लेकर काफी गुस्सा था।
इस वक़्त तक प्रेम भक्ति में तब्दील हो चुका था। लोग धर्म के आधार पर बंट चुके थे। सबसे ज़्यादा दुख इस बात का था कि 11वीं और 12वीं में जो दोस्त साथ पढ़े थे, जो एक ही टिफिन से खाना खाया करते थे, एक साथ खेलते थे...वो अब सिर्फ नाम के दोस्त रह गए थे। वो अब अपने धर्म से पहचाने जाने लगे थे। एक दोस्त भक्त बन गया तो दूसरा पाकिस्तानी। एक दोस्त आरएसएस की संतान बन गया तो दूसरा बाबर की औलाद!
अब राजनीतिक पार्टीयों या नेताओं को अपना बचाव नहीं करना पड़ रहा था, आम लोग खुद उनके पैरोकार बन कर घंटों सोशल मीडिया पर अपनों के दुश्मन बन गए थे।
2016 के अंत तक सेना की एंट्री मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में हो गयी। सेना अलग इंस्टीट्यूशन न रह कर वोट मांगने का माध्यम हो गयी थी।

2017 में जहां निजी ज़िंदगी में काफी हलचल पैदा हो रही थी, वहीं मेरे गृह राज्य में एक नया नेता मुख्यमंत्री के तौर पर चुना जाने वाला था। वो उन नेताओं का उत्तर था जो दाढ़ी रखते थे और अपने धर्म की टोपी लगाकर धर्म की राजनीति करते थे। वो नेता भगवाधारी था, गाय से प्रेम करता था, अनुशासित जीवन बिताता था, घंटों पूजा करता था और अपनी पार्टी का स्टार प्रचारक था। अखिलेश की साईकल को किनारे कर के योगी ने उत्तर प्रदेश में लंबे वक्त बाद कमल खिलाया था।
2017 में लोगों को ये भी पता चल गया कि 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा!'
इसी साल अपनी दूसरी नौकरी में रहते हुए पहली बार हवाईजहाज़ में बैठने का मौका मिला साथ ही खुद के अंदर घुमक्कड़ी स्वभाव पैदा हो गया। 2017 और 2018 में कई नए शहरों को देखने का मौका मिला। 2018 के दौरान कई बड़े एंटरप्रेन्योर का इंटरव्यू करने का मौका मिला। इस दौर तक एक पार्टी और व्यक्ति के लिए भक्ति अंधभक्ति में बदल चुकी थी। अब निर्णय चाहे कोई भी हो, उसका समर्थन ही हो रहा था और जो समर्थन न करे वो लाखों लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर इस कदर ट्रोल होने लगा था कि वो फिर कभी कुछ और कहने से डरता था। अब तक छात्र दुश्मन बन चुके थे और दुश्मन सिर्फ पाकिस्तन रह गया था, जिसके सहारे देशभक्ति की अलख हमारे अंदर जली हुई थी।

2018 के अंत में फिर इंडिया टुडे में काम करने का अवसर मिला। 2019 आते-आते कई रिश्ते मज़बूत हो गए, और उसी मज़बूती के साथ बीजेपी ने फिर सत्ता पर अधिकार जमा लिया था। खबरों पर विश्वास नहीं रह गया था, विपक्ष विश्वास के लायक नहीं था और सरकार विश्वास पैदा नहीं होने दे रही थी। लोग धर्म को लेकर इतने कट्टर हो गए कि वो इंसानियत भूल गए। पूरी आबादी अपने में लड़ते, भिड़ते, जलते, जलाते, बनते, बिगड़ते साल के अंत तक पहुँच आयी थी।

आज जब हम 2010-2019 के दशक को अलविदा कह रहे हैं तो मैं अभी भी ये आशा कर रहा हूँ कि आने वाला दशक मेरे लिए ही नहीं, इस देश के लिए भी नई उम्मीदें ले कर आएगा। अगर आप यहां तक पहुँच आये हैं तो आपको 2020 की ढेर सारी बधाई!

#अशुतोष
दिसंबर, 2019

Saturday, 14 September 2019

हिंदी दिवस

13 साल इंग्लिश मीडियम के कॉन्वेंट स्कूल में पढ़ने के बाद भी मेरा लगाव हिंदी से अटूट है। वो इसलिए कि हिंदी मुझे अपनी माँ से विरासत में मिली है। हिंदी मेरी माँ की ज़बान है इसीलिए वो मेरी मातृभाषा है। मेरी ही नहीं, हिंदी पट्टी में रहने वाले बहुतों की मातृभाषा हिंदी है।
अंग्रेज़ी में वो बात नहीं जो हिंदी में है क्योंकि मातृभाषा से अधिक खूबसूरत कोई भाषा नहीं हो सकती। आपकी मातृभाषा मराठी, बंगाली, पंजाबी, गुजराती, तमिल, कन्नड़...कोई भी हो सकती है। ज़रूरी ये है कि आप अपनी मातृभाषा पर गर्व करें। उससे भी ज़्यादा ज़रूरी आज के वक़्त में अपने बेटे बेटियों को भाषा का ज्ञान देना है। दिल्ली एनसीआर में जब से रह रहा हूँ, ये देख रहा हूँ कि लोग अपनी भाषा से कटते जा रहे हैं। दिल्ली के पॉश इलाकों में बड़ी मुश्किल से आपको कोई व्यक्ति अपनी मातृभाषा में बात करते हुए मिलेगा।
‌पिछले साल अपनी पुरानी कंपनी के एक इवेंट के सिलसिले में दिल्ली के एक बड़े होटल में जाना हुआ था। इवेंट में शामिल होने वाला हर स्पीकर अंग्रेज़ी में ही बात कर रहा था। दर्शक भी आपस में अंग्रेज़ी में ही बात कर रहे थे। इवेंट के अंत में पेटीएम कंपनी के मालिक विजय शेखर भी  स्पीकर के तौर पर शामिल हुए और उन्होंने अपनी आधी से ज़्यादा बात हिंदी में रखी। लोग चौंके, फिर उनकी बातों पर तालियां पीटने लगे। दूसरों के सेशन से ज़्यादा विजय शेखर के सेशन की चर्चा हुई। वो इसलिए कि उन्होंने अपनी भाषा में संवाद किया...जिससे दर्शक उनसे अधिक जुड़ सके। मातृभाषा में बात करने से नज़दीकियां झलकती हैं। अंग्रेज़ी में औपचारिकता महसूस होती है। वही औपचारिकता जो विजय शेखर के सेशन से पहले के सेशन में दिखाई दे रही थी।
‌वैसे यहां गौर करने वाली बात ये भी है कि अगर विजय शेखर की जगह कोई आम आदमी ऐसी जगह पर हिंदी में बात करता तो लोग हेय दृष्टि से देखते। वो इसलिए आज कल लोगों को अपनी भाषा में बात करने में शर्मिंदगी महसूस होती है। कभी कभी सोचता हूँ कि क्या उन्हें अपनी माँ से भी बात करने में शर्मिंदगी होती होगी...शायद नहीं...तो मातृभाषा में बात करने में क्यों शर्म महसूस होती है! ये दुर्भाग्यपूर्ण है। सिर्फ अगली पीढ़ी के लिए ही नहीं, हमारे लिए भी दुर्भाग्यपूर्ण है कि हम अगली पीढ़ी तक भाषा की विरासत को नहीं बढ़ा पा रहे हैं।
‌अलग अलग भाषाओं का ज्ञान होना अच्छी बात है। अंग्रेज़ी एक ग्लोबल ज़बान है, उसे सीखना भी आवश्यक है मगर अपने देश और अपने क्षेत्र में रह कर कोई दूसरी ज़बान बोलना ठीक नहीं है।
#आशुतोष

Saturday, 4 May 2019

ब्रांडेड बचपन

जब 10-11 साल के बच्चों से ब्रांड और कीमत के बारे में बात करते सुनता हूँ तो बड़ी कोफ्त होती है। उनसे ज़्यादा उनके परिजनों पर हैरानी होती है जो अपने बच्चों को इतनी छोटी उम्र में ब्रांड और सामान की कीमत बताते हैं। ऐसा कर के हम उन बच्चों की मानसिकता को सही राह नहीं देते जिससे समाज की कई मायनों में हानि होती है।

योनेक्स के बैडमिंटन रैकेट, 200 रुपये वाली पार्कर पेन, 3 हज़ार का बैट, रीबॉक के 2 हज़ार के जूते, 100 रुपये वाली क्लासमेट की कॉपी, 4 हज़ार की जीन्स...परिजन हर वस्तु की कीमत और वस्तु का बाज़ार में कितना महत्व है, इसकी जानकारी दे कर बच्चों को छोटी उम्र में ही मटीरियलिस्टिक बना देते हैं। इससे बौद्धिक विकास की दिशा ही बदल जाती है। जिस उम्र में उन्हें ये प्रश्न करना चाहिए कि रात में सूरज कहाँ छिप जाता है, या फिर चाँद हमारे साथ क्यों चलता है, वो अपने से 3 गुना बड़ी उम्र के लोगों से ये पूछते हैं की आपने जो घड़ी पहनी है वो कौन सी कंपनी की है? मेरे पापा के पास तो 15 हज़ार की फॉसिल की घड़ी है! आपकी की घड़ी तो सस्ते ब्रांड की है!

इस उम्र में बच्चों को जानवरों और पेड़ों से परिचित कराना चाहिए, उन्हें प्यार करना सिखाना चाहिए। बच्चों को खिलौनों के तालाब में फेंकने के बजाए किताबों के महासागर में गोते लगाने के लिए छोड़ना चाहिए। हर मांग को पूरी करने के साथ साथ उन्हें ऐसे लोगों के बारे में भी बताना चाहिए जो अपनी हसरतों को पूरा नहीं कर पाते। अगर ऐसा नहीं किया तो ये बच्चे इंसान या अन्य जीवों से प्यार करना नहीं, सिर्फ भौतिक वस्तुओं और दिखावे से ही प्यार करना सीखेंगे, उन्हें जीवन में अधिक महत्व देंगे।

अब इसमें आप ये तर्क भी दे सकते हैं कि अरे बच्चे ही तो हैं, इतनी चिंताएं लाद देंगे तो बचपन ही खत्म हो जाएगा। तो जनाब बचपन तो आपने उसी दिन खत्म कर दिया था जब आपने उसकी ज़िद पर बेहद महंगा खिलौना उसे दिलाया था और टूट जाने पर उसे ये कह कर डांटा था कि जानते हो कितने रुपये का था!
या फिर आपने उसे रिश्वतखोरी सिखाते हुए ये कहा था कि मेरी बात मान लो तो तुम्हारी पसंद की कार ला कर देंगे।

आप ये भी कह सकते हैं कि बच्चों की अलग अलग रुचि हो सकती है। क्या पता उसे बचपन से ही गैजेट या टेक संबंधी चीज़ों के बारे में जानना पसंद हो, तो उनके बारे में जानने में क्या हर्ज है?
आप भी समझते होंगे कि बच्चों को समाज की कई चीजों की जानकारी कम उम्र में देना ठीक नहीं है। जिस प्रकार फिल्मों में आपत्ति जनक दृश्यों को बच्चों को दिखाने से परहेज़ करते हैं, उसी प्रकार कई जानकारियां ऐसी हैं जो इस उम्र के लिए ठीक नहीं हैं। रुचि विकसित करने के लिए और उस रुचि को पेशा बनाने के लिए बच्चों के सामने बहुत लंबा वक्त पड़ा है मगर बौद्धिक विकास इस उम्र से ही शुरू हो जाता है।

बच्चों को खुद से मोबाइल का लॉक खोल कर गेम खेलते देख कर कुछ पल के लिए खुश तो हुआ जा सकता है मगर अगले ही पल ये सोच कर भी चिंता करनी चाहिए कि वो बच्चा बड़ा हो कर समाज में क्या योगदान देगा।
समाज के निर्माण में हर व्यक्ति खास है और हर इकाई ज़िम्मेदार है। हमें खुद की ज़िम्मेदारी समझनी होगी और बच्चों को समझानी होगी, तभी एक बेहतर समाज निर्मित होगा।
#आशुतोष

Monday, 4 March 2019

सूजी का हलवा


ऑफिस में काम करते-करते वक़्त का पता ही नहीं चलता. अचानक से कंप्यूटर की दाहिनी ओर नीचे बनी छोटी सी घड़ी पर ध्यान गया तो देखा दिन के 2 बज कर 5 मिनट हो गए थे. मुझे भूख का ध्यान घड़ी देख कर आता है. 2:04 पर ज़रा भी आभास नहीं हुआ कि भूख जैसी भी कोई चीज़ होती है मगर घड़ी पर जैसे ही नज़र पड़ी तो ऐसा मालूम हुआ जैसे भूख पेट से निकल कर हलक के रस्ते मुंह से बाहर निकलने को बेचैन हुई पड़ी है. काम समेट कर ऑफिस की कैंटीन में पहुंचा तो सामने सजे खाने पर नज़र दौड़ गयी. बाईं ओर सोयाबीन की सब्ज़ी, उसके बगल में बीमार सी दाल, उससे सट कर बिना पनीर के मटर-पनीर की सब्ज़ी बड़े-बड़े डोंगे में रखी हुई थी. मैंने जल्दी से एक वेज-थाली का आर्डर दिया और अपनी थाली को सजते हुए देखने लगा. तभी अचानक दाहिनी ओर नज़र पड़ी तो देखा आज मीठे में हलवा बना रखा है. जो लोग मुझे नज़दीक से जानते हैं उन्हें मालूम है की मैं मीठा खाने का बड़ा शौकीन हूँ. बस फिर क्या था, मैंने पूछा की हलवा कौन सा है तो कैंटीन वाले ने तपाक से कहा, "सूजी का!" मैंने फिर हलवे की ओर देखा. "कितने का है?" मैंने कैंटीन वाले से पूछा. "30 रुपये का, निकाल दूँ?" मैंने हाँ में सर हिला दिया. उसने लकड़ी की छोटी सी अलमारी से प्लास्टिक की छोटी सी एक कटोरी निकाली और उसमें छोटे से पौने के सहारे जितना हलवा फिट हो सकता था, उतना डाल दिया. रुपये अदाएगी के बाद एक कुर्सी और मेज़ पर बैठ गया. खाना खाने से पहले हलवे को चखने का मन हो गया तो उसी पर टूट पड़े. अभी दूसरा ही निवाला खाया था कि 30 रुपये के उस 40-50 ग्राम हलवे के स्वाद ने अचानक एक ऐसी याद ज़हन में ताज़ा कर दी जो कहीं गुम सी हो गयी थी.

उन दिनों ठंड की छुट्टियां लंबी हुआ करती थीं. ठंड भी कड़ाके की पड़ती थी. लाइट अक्सर गायब रहती थी इसलिए हीटर की जगह गर्म कोयले को तसले या तवे पर डाल कर कमरों में रख लिया जाता था. अलसाए से दिन होते थे और सुस्त से हम पड़े रहते थे मानों सारी स्फूर्ति मुंह से गरम भाप की तरह उड़ी चली जाती थी. हमारी छुट्टियां, और कड़ाके की ठंड सबसे अधिक परेशानी मम्मी और चची के लिए पैदा कर देती थीं. घर में 7 भाई-बहन थे जो ठंड की छुट्टियों में भूखे भेड़िये बन जाते थे. आठों पहर पेट भरने के लिए कुछ न कुछ खाते रहते इसलिए चूल्हे पर कढ़ाई हमेशा चढ़ी रहती थी. ठंड की शाम को कुछ गरम, कुछ मीठा खाने का मन हो जाता था. ऐसे में "हलुआ" ही सबसे बेहतर विकल्प होता था जिसे बनाने के लिए तुरंत मान भी लिया जाता था. फिर हलवे में भी फरमाइश की जाती थी. कोई कहता था की आज आटे का हलवा खायेंगे, कोई गाजर का हलवा खाना चाहता था, किसी को मूंग का हलवा पसंद था. जब कुछ देर बाद हलवा बन कर हाज़िर होता था तो सब निराश हो जाते थे. गाजर, मूंग, आटे के हलवे का सपना देखने वालों को सूजी के हलवे से गुज़ारा करना पड़ता था. उन दिनों सूजी के हलवे की स्थिति बहुत ख़राब होती थी. उसके साथ दलितों वाला व्यवहार किया जाता था. भूख को तृप्त करने के लिए किसी ने पूरा निगल लिया, तो किसी ने आधा खाया, आधा कटोरी सहित बिस्तर के नीचे चीटियों के लिए खिसका दिया, किसी ने ज़रा भी नहीं छुआ. वो बिचारा पाव भर से अधिक हलवा, पीड़ित और शोषित वर्ग की तरह कढ़ाई में पड़ा-पड़ा सूख जाया करता.

कभी-कभी किस्मत अच्छी होती तो मूंग या गाजर का हलवा भी नसीब हो जाता था. उस वक़्त वो हलवा लेने के लिए कटोरी नहीं सीधे बड़ा कटोरा उठाया जाता था जिससे की अधिक से अधिक हलवा उसमें फिट हो जाये.
कई बार सूजी खरीदने के लिए जब बाज़ार भेजा जाता था तो सबसे ज़्यादा आना-कानी की जाती थी. अभी नहीं जायेंगे, बाहर बहुत कोहरा है, बहुत ठंड लग रही, अरे अभी तो पढ़ रहे हैं कतई नहीं उठ सकते, ओफ्फो! कितना डिस्टर्ब करती हो मम्मी. मगर कहीं अगर ये कह दिया गया कि ज़रा बाज़ार जा कर गाजर ले आओ, तो फिर बस ये उठे और वो भागे.....
अगर गाजर खरीदने के बाद अधिक रुपये बच जाते थे तो हलवे में डालने के लिए काजू और बादाम भी खरीद लेते थे. स्वाद का पूरा ध्यान रखा जाता था. घर पर कोई मेहमान आ जाए तो हम बोल-बोल कर गाजर या मूंग का हलवा बनवाते थे जिससे हम भी हलवे पर हाथ साफ़ कर सकें. बस सूजी के हलवे के साथ ऐसे ही परायों सा व्यवहार किया जाता था.  
आज 30 रुपये का थोड़ा सा सूजी का हलवा खाया, एक एक दाना साफ़ कर गया तो ध्यान आया की किसी कढ़ाई में पड़ा वो पाव भर से अधिक हलवा भी सोच रहा होगा की काश उसे भी कोई पूरा चट कर जाये....
#आशुतोष

Sunday, 30 December 2018

क्या अर्धकुम्भ के नाम पर अपने राजनीतिक पत्ते बिछा रही है बीजेपी?

कहते हैं की आप एक इलाहाबादी को इलाहाबाद से निकाल सकते हैं मगर इलाहाबाद को एक इलाहाबादी के अंदर से नहीं निकाल सकते. दिल्ली-एनसीआर आए यूँ तो मुझे 3 साल से ऊपर हो चुके हैं मगर मेरी रूह आज भी मेरे शहर इलाहाबाद की गलियों में ही फिरती है. खबरों की दुनिया से जुड़े होने के चलते आँख और कान देश-दुनिया की तमाम खबरों के बीच इलाहाबाद को खोजते रहते हैं...इलाहाबाद को...प्रयागराज को नहीं! खैर शहर का नाम बदलने का विषय दूसरा है जिस पर कई बुद्धिजीवियों ने पिछले कुछ दिनों में अपनी राय रखी है, उन लोगों ने भी रखी है जिनका इलाहाबाद से कोई वास्ता नहीं है. व्यक्तिगत तौर पर शहर के नाम को बदलना मुझे ठीक नहीं लगा मगर हाल के दिनों में मेरे शहर से जुड़ी एक और ऐसी चीज़ है जो मुझे सहज नहीं लग रही, वो है अर्धकुम्भ 2019.
मैंने 2001 के महाकुम्भ की भव्यता देखी है. मैं 2007 के अर्धकुम्भ का साक्षी रहा हूँ. 2013 के महाकुम्भ में दो बार आस्था की डुबकी लगाई है और उसी महाकुम्भ में इलाहाबाद रेलवे स्टेशन पर मची भगदड़ में श्रद्धालुओं की लाशें भी देखी हैं. इलाहाबाद में रहते हुए हर साल माघ के महीने में लगने वाले माघ मेले का भी मैंने आनंद उठाया है. मैंने कुम्भ के दिनों में एक शहर के अंदर नए शहर को बसते देखा है. मैंने पीपे के पुलों को बनते और नष्ट होते देखा है. मैंने कपड़े के घरों में लोगों को एक महीने जीवन बसर करते देखा है, मैंने अखाड़ों की पेशवाई देखी है, नागाओं का माँ गंगा से भेंट करने का उत्साह देखा है और मैंने कुम्भ में अपने परिवार के एक सदस्य को लगभग खोते भी देखा है. मगर इस बार जो मैं देख रहा हूँ वो पहले कभी नहीं देखा. कुम्भ में बाज़ार सजते देखा है मगर मैंने इससे पहले कुम्भ का बाज़ारीकरण नहीं देखा.

इतिहास के पन्नों में कुम्भ
कुम्भ मेले का इतिहास हज़ारों साल पुराना है. ऋग्वेद, यजुर्वेद और अथर्ववेद में ‘कुम्भ’ शब्द का उल्लेख है मगर वो उल्लेख सांकेतिक है जिसके कारण कुम्भ पर्व की सही जानकारी उनसे नहीं हासिल हो पाती है. पुराणों में कुम्भ के संदर्भ में जिन कथाओं का वर्णन है उनमें सबसे प्रचलित प्रसंग श्रीमद्भागवतपुराण का समुद्र मंथन से जुड़ा प्रसंग है. मान्यता है कि जब समुद्र मंथन के दौरान अमृत कलश निकला तो उसे हासिल करने के लिए देवताओं और राक्षसों में छीना-झपटी शुरू हुई. उसी वक़्त अमृत की बूंदें नासिक, उज्जैन, हरिद्वार और प्रयाग में गिरीं. तब से इन चार जगहों पर हर तीन साल के अंतराल पर कुम्भ का आयोजन किया जाता है. 12 साल बाद ये मेला अपने पुराने स्थान पर लौटता है. वैसे कुम्भ मेले के आयोजन का प्रावधान कब से है इस विषय पर विद्वान अलग-अलग राय रखते हैं. कुछ कहते हैं कि ये 500 ईसा पूर्व से शुरू हुआ तो कुछ मानते हैं की गुप्त काल में इसका आयोजन शुरू हुआ. कुम्भ के एतेहासिक पहलु पर गौर करें तो पता चलता है कि ह्वेनसांग ने अपने भारत भ्रमण के दौरान प्रयाग में सन 634 में एक बड़े स्नान पर्व का ज़िक्र किया था. राशियों और ग्रहों से भी कुम्भ का आयोजन जुड़ा हुआ है. प्रयाग में कुम्भ का आयोजन तब होता है जब माघ के महीने में अमावस्या के दिन सूर्य और चंद्रमा मकर राशी में होते हैं और गुरु मेष राशी में. इसी प्रकार अन्य तीन शहरों में भी कुम्भ से जुड़ी अपनी पौराणिक और एतेहासिक मान्यताएं हैं मगर इलाहाबाद का कुम्भ इस लिए प्रमुख माना जाता है क्यूंकि ये गंगा, यमुना और विलुप्त सरस्वती के संगम स्थल पर आयोजित होता है.
कुम्भ के इतिहास के साथ-साथ ये जान लेना आवश्यक है कि हिन्दू मान्यताओं में अर्धकुम्भ की जड़ें आदिकाल से नहीं जुड़ी हैं जिस तरह महाकुम्भ की हैं. कहा जाता है कि अर्धकुम्भ का आयोजन मुस्लमान शासकों के आने के बाद से किया जाता है. उस समय उन शासकों द्वारा हिन्दुओं और उनकी मान्यताओं पर अत्याचार होता था जिसके कारण हिन्दू धर्मगुरुओं ने हिन्दुओं की एकता के बारे में सोचा और बारह साल नहीं हर छह साल पर एकत्रित होने का निर्णय लिया. इससे उन्हें हिन्दुओं को संगठित करना था. तब से महाकुम्भ के बीच में हर छह साल पर अर्धकुम्भ का आयोजन किया जाने लगा. 

अर्धकुम्भ की तैयारी से शहर का हाल बेहाल
2017 में जब उत्तर प्रदेश में योगी आदित्यनाथ की सरकार बनी थी, तब से ही उन्होंने इलाहाबाद में लगने वाले साल 2019 के अर्धकुम्भ की तैयारी का बीड़ा उठा लिया था. अर्धकुम्भ के नाम पर शहर को तोड़ा गया, सड़कों को उखाड़ा गया और अवैध कब्ज़ा किये लोगों को खदेड़ा गया. इस तमाम उधेड़-बुन में शहर की संरचना में काफी बदलाव किये गए. शहर के नए इलाकों में इस तोड़-फोड़ का उतना प्रभाव नहीं पड़ा जितना पुराने इलाकों में पड़ा. शहर के पुराने इलाके प्रमुख तौर पर तीन अलग-अलग दौर के हैं. एक वो दौर जब शहर में वासुकी नाग ने समुद्र मंथन के बाद शरण ली थी, भरद्वाज ऋषि का आश्रम था और सरस्वती अपने वेग से बहती थी. दूसरा वो दौर जब शेर शाह सूरी ने जीटी रोड का निर्माण करवाया था. तब शहर के कई हिस्सों को सराय का रूप दे दिया गया था. अकबर ने संगम किनारे अपने किले का निर्माण करवाया था और जहांगीर ने अपने बेटे ख़ुसरो मिर्ज़ा के लिए ख़ुसरो बाग का निर्माण करवाया था. तीसरा दौर वो था जब अंग्रेज़ों का शहर पर कब्ज़ा था जिसके चलते उन्होंने हाईकोर्ट बनवाया, कई स्कूल बनवाए, विश्वविद्यालय बनवाया, चर्च बनवाए और शहर का चेहरा पूरी तरह से बदल दिया.
ऐसी संरचना वाले शहर के पुराने इलाकों में आँख मूँद कर शहर के सौन्दरियाकरण के लिए और सड़कों को चौड़ी करने के लिए युद्ध स्तर पर बुलडोज़र चलवाए गए. इस बात को नकारा नहीं जा सकता कि शहर की आबादी तेज़ी से बढ़ रही है जिसके चलते शहर में खुली और अतिक्रमण रहित सड़कों की आवश्यकता है मगर शहर के मूलतत्व से जिस प्रकार छेड़खानी की गयी वो एक इलाहाबादी होने के नाते मुझे दुःख पहुंचाता है. शहर के एक पुराने इलाके में स्थित ख़ुसरो बाग शहर की पहचान है. उसका हर एक अंश शहर की धरोहर है मगर इस बात का ख़याल न रखते हुए प्रशासन ने ख़ुसरो बाग के बाहर स्थित उसके एक मुख्या द्वार को गिरा दिया. उसी द्वार से कुछ दूर एक व्यस्त तिराहा है जहाँ से कई मोहल्ले के लोग गुज़रते हैं. उस तिराहे को चौड़ा करने की आवश्यकता लंबे समय से थी मगर उसे चौड़ा करने के चक्कर में ये ध्यान ही नहीं दिया गया की तिराहे के कोने में सन 1800 के दौर की अंग्रेजों द्वारा बनाई गयी एक चरही थी (चरही पर बनाए जाने का सन और ब्रिटिश सरकार द्वारा एक संदेश उकेरा हुआ था) जिससे जवानों के घोड़े पानी पिया करते थे, उसे भी वहां से नष्ट कर दिया गया. यही नहीं, शहर का एक प्रमुख इलाका चौक जो प्रदेश भर में काफी प्रसिद्ध है, वहां बने 100 साल से भी पुराने घरों को प्रशासन ने अवैध घोषित कर तोड़ दिया. इलाहाबाद रेलवे स्टेशन के निकट एक चौराहा था जिसके कोने पर भगवन हनुमान का एक मंदिर था. मंदिर काफी पुराना था इसलिए उस वक़्त बिना उनकी ‘जात’ जाने ही निर्माण कराया गया था. मंदिर के ही कारण उस चौराहे को जोगीबीर चौराहा कहा जाता था. प्रशासन ने उस मंदिर को भी तोड़ दिया. अब आगे आने वाली पीढ़ी को नहीं पता चलेगा की उस चौराहे को जोगीबीर चौराहा क्यों कहते हैं. ऐसी बहुत सी छोटी-छोटी चीज़ें पूरे शहर में मौजूद थीं जो इलाहाबादियों के लिए खास थीं, उनके शहर का प्रमुख हिस्सा थीं मगर वो अब इलाहाबाद की सड़कों पर मलबों में मिली पड़ी हैं. शहर के कई पुराने इलाके तोड़-फोड़ से सीरया के किसी शहर की शकल ले चुके हैं जिनके अर्धकुम्भ तक पूर्ण निर्माण की कोई उम्मीद नहीं है.
2018 का अंत होते-होते शहर की सूरत और मिजाज़ को पूरी तरह बदल दिया गया है. नाम तो बदला ही बदला मगर पिछले कुछ समय से शहर की तहज़ीब भी बदलती दिख रही है. अचानक से ऐसा लग रहा है जैसे शहर की आँखों पर कोई धर्म और राजनीति का चश्मा चढ़ा रहा है. शहर को 'पेंट माय सिटी' अभियान के तहत रंगों और खूबसूरत चित्रों के माध्यम से नया कलेवर दिया जा रहा है, साधुओं के चित्र, हिन्दू मान्यताओं से जुड़े चित्र, आधुनिक भारत के निर्माताओं के चित्र इमारतों पर बने देखे जा सकते हैं जो तारीफ़ के काबिल है लेकिन उन चित्रों में मुझे धर्म की राजनीति की बू आ रही है. संगम क्षेत्र के पास हिन्दू मान्यताओं से जुड़े चित्र को अपनाया जा सकता है लेकिन शहर की हर दीवार को सिर्फ ‘भगवा’ रंग में रंगे जाने पर मुझे आपत्ति है. उन चित्रों में मुझे इलाहाबाद की गंगा-जमुनी तहज़ीब कहीं नहीं दिख रही. मुझे सर पे टोपी लगाकर, पैर मोड़े, इबादत में बैठे किसी बच्चे की तस्वीर नहीं दिख रही ना ही मुझे सूली पर चढ़े उस परमात्मा की तस्वीर दिख रही है जिसने सच्चाई के मार्ग पर चलने की सदा सीख दी है.

अर्धकुम्भ या 2019 की प्रयोगशाला
इन तमान चीज़ों के बीच जो सबसे बड़ी हैरत की बात है वो ये है कि राज्य सरकार ने 2019 के अर्धकुम्भ की ब्रांडिंग महाकुम्भ के तर्ज़ पर की है. मैं आज देख रहा हूँ की अर्धकुम्भ के विज्ञापन सोशल मीडिया पर ही नहीं, टीवी और रेडियो पर भी छाये हुए हैं. 'कुम्भ चलो' का नारा जन संचार के सभी माध्यमों पर गूँज रहा है. अर्धकुम्भ में हज़ारों करोड़ रुपये इन्वेस्ट किया जा चुका है. 60 से अधिक देशों के प्रतिनिधि शहर का भ्रमण करने आ चुके हैं. प्रधानमंत्री शहर आ कर पूजा-आरती कर चुके हैं और इलाहाबाद को इतनी जल्द देश के तमाम शहरों से हवाई मार्ग के ज़रिये जोड़ दिया गया है, केंद्र वह राज्य सरकार के तमाम बड़े मंत्री तैयारियों का जायज़ा लेने शहर आ रहे हैं और ये सब कुछ महज़ अर्धकुम्भ के लिए किया जा रहा है. इस बार ऐसा लग रहा है कि अर्धकुम्भ को महाकुम्भ की तरह पेश करने के पीछे कोई खास मकसद है. इससे पहले भी इलाहाबाद में कुम्भ हुए हैं, 2013 के कुम्भ का योग खगोल विद्या के हिसाब से 100 साल बाद बना था यहाँ तक कि 2013 कुम्भ में हार्वर्ड विश्वविद्यालय के छात्र कुम्भ के आयोजन पर शोध कार्य करने आये थे जिसे उन्होंने अपने यहाँ के गज़ट में प्रकाशित किया था मगर राजनीति और धर्म का ऐसा संगम इस बार पहली दफा देखने को मिल रहा है.
ये बात तो साफ़ है की सनातन धर्म के अनुयायिओं का इतना बड़ा जनसैलाब और किसी पर्व पर, भारत में नहीं लगता. इसके अलावा हम ये भी जानते हैं कि साल 2019 अर्धकुम्भ के कारण सामाजिक और धार्मिक तौर पर तो महत्वपूर्ण है ही, राजनीतिक तौर पर भी अत्यंत महत्वपूर्ण है क्यूंकि इसी साल लोकसभा के चुनाव होने तय हैं. ऐसे में ये किसी के लिए भी समझना मुश्किल नहीं होगा कि अपने हिंदुत्व के एजेंडे को सिद्ध करने के लिए भारतीय जनता पार्टी के पास ये सबसे बड़ा मौका है.
भारतीय जनता पार्टी के चाणक्यों को ये पता है कि देश में महागठबंधन मज़बूत होता जा रहा है, ऐसे में वोट हासिल करने के लिए हिन्दुओं को संयुनक्त करना ज़रूरी है और अर्धकुम्भ 2019 पार्टी के उसी एजेंडा को सिद्ध करने की प्रयोगशाला हो सकती है. साधू-संत, महामंडलेश्वर आदि लोग हमारे समाज के ओपिनियन लीडर होते हैं जो आम जनता की सोच पर पूर्ण रूप से हावी हो सकते हैं. इन लोगों पर पकड़ बनाने से हिन्दुओं की भावनाओं पर भी पकड़ बनाई जा सकती है. इलाहाबाद इन दिनों बीजेपी के लिए युद्ध क्षेत्र बना है जहाँ हिन्दुओं को लुभाने के लिए उनकी छटपटाहट साफ़ देखी जा सकती है. हाल की खबर इस तथ्य को साबित भी करती है जिसमें पीएम मोदी ने ये घोषणा की है कि इलाहाबाद में अकबर का किला अब आम लोगों के लिए खोला जाएगा जिसमें लोग अक्षयवट के दर्शन कर सकेंगे. हालही में मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने ये एलान किया है संगम किनारे बने उसी अकबर के किले के अंदर देवी सरस्वती और ऋषि भरद्वाज की मूर्ती सुशोभित की जाएगी. ये सारे बदलाव पहले के महाकुम्भ या अर्धकुम्भ में देखने को कभी नहीं मिले थे. यहाँ तक कि 2001 के कुम्भ के दौरान भी बीजेपी की सरकार थी और राजनाथ सिंह मुख्यमंत्री थे मगर उस दौरान भी शहर की बनावट में इतने बदलाव नहीं हुए थे ना ही इतनी रोक टोक थी जितनी इस बार हो रही है. बाधाओं को बढ़ाते हुए प्रशासन इस बार ये भी एलान कर चुका है कि अर्धकुम्भ के दौरान इलाहाबाद में शाही स्नान के एक दिन पहले और एक दिन बाद शादी-समारोह के आयोजन नहीं होंगे.

गंगा-जमुनी तहज़ीब का प्रतीक है इलाहाबाद
मुझे शहर के सौन्दरियाकरण से कोई दिक्कत नहीं है लेकिन मुझे परेशानी इस बात से है कि धर्म की राजनीति के कारण लोगों को भ्रमित किया जा रहा है और इसी राजनीति से इलाहाबाद अपनी गंगा-जमुनी तहज़ीब खो सकता है जिसके लिए वो पूरे विश्व में जाना जाता है. ये वो शहर है जहाँ कभी सूफी संत तकी, कबीर और गुरु नानक मिले थे. ये वो शहर है जहाँ दाराशिकोह ने वेद और पुराणों के अनुवाद अरबी और फारसी भाषा में किये थे. ये वो शहर है जहाँ एक प्रसिद्ध मुस्लमान शासक द्वारा बनाई गयी जी.टी. रोड पर राम की सवारी और मुहम्मद के नवासे की याद में लोग एक साथ निकलते हैं. ये वो शहर है जहाँ जय श्री राम और अल्लाह हु अकबर के नारे एक साथ गूंजते हैं.
इस शहर की खासियत यही है कि राजनीति के क्षेत्र में इसने अपना अहम योगदान दिया है मगर कभी भी उस राजनीति के चलते अपने भाईचारे के स्वभाव को नष्ट नहीं किया है. अब इस शहर पर धर्म की राजनीति का जो साया मंडराने लगा है वो इस शहर के स्वास्थ्य के लिए काफी हानिकारक सिद्ध हो सकता है....            

आशुतोष अस्थाना (Ashutosh Asthana)