आखिरी बार ऐसा कब हुआ था जब आप किसी ऐतिहासिक इमारत को देखने गए हों और उसकी सुंदरता को देख कर इस तरह खो गए हों कि आप अपने स्मार्टफोन से फ़ोटो खींचना भूल गए हों?
आखिरी बार ऐसा कब हुआ था जब आप डूबते सूरज को देखने में इतना डूब गए कि आपने उस दृश्य को अपने कैमरे में कैद नहीं किया और उसे देखते वक़्त बस यही सोचा कि काश ये वक़्त यहीं ठहर जाए?
आखिरी बार ऐसा कब हुआ था जब आप अपने पसंदीदा व्यंजन को खाने गए और खाने के स्वाद के आगे इंस्टाग्राम पर फ़ोटो डालना भूल गए?
आखिरी बार ऐसा कब हुआ था जब आप खूब सज कर किसी संबंधी के विवाह या किसी अन्य समारोह में गए हों और खुद की सेल्फी लेने के बजाए उस स्थान को, वहां मौजूद लोगों को या वहां से निकलने वाली ऊर्जा को महसूस किया हो?
अगर ध्यान से सोचेंगे तो पाएंगे कि ये सब किये काफी वक़्त हो चुका है। असल में हम महसूस करना भूल गए हैं, फिर चाहे वो कोई भावना हो, कोई बात हो, कोई जगह हो या कोई इंसान। हम अब जो भी करते हैं वो दूसरों को दिखाने के लिए करते हैं। औरों को ये बताने के लिए की हमने फलां काम आपसे पहले कर लिया या बेहतर ढंग से कर लिया और इसी चक्कर में हमने महसूस करना बंद कर दिया। किसी बचपन के दोस्त से काफी सालों बाद मुलाक़ात होने पर उसकी खैरियत पूछने से पहले, उसकी हालिया स्थिति को महसूस करने से पहले, उसको प्यार का एहसास दिलाने से पहले हम ये फिक्र करने लगे हैं कि दोस्त के साथ खींची हुई तस्वीर में हैश-टैग क्या डालेंगे।
अब परिवार के साथ छुट्टियां मना कर लौटने पर तस्वीरें तो ढेर सारी रहती हैं मगर यादें ले आना हम भूल जाते हैं। आप कहेंगे कि वो तस्वीरें ही तो यादें हैं। हां कुछ लोगों के लिए तस्वीरें यादों की जगह ले सकती हैं मगर असल यादें होती हैं वो हंसी, वो एहसास, वो जज़्बात जो आपस में एक दूसरे से बांटे गए जिसे तस्वीरें क़ैद नहीं कर पाती।
इस दौर में रहने के कारण टेक्नोलॉजी हर किसी की आवश्यकता बन गयी है। सिर्फ स्मार्टफोन की ही बात करें तो एक दिन इसके बिना बिताना नामुमकिन सा लगता है। ऐसा लगता है जैसे किसी ने हमारे हाथ-पैर काट दिए हों। दिल्ली जैसे बड़े शहर में बिना स्मार्टफोन के रहना असंभव है। क्या हो अगर मैप की सुविधा ना हो, एक जगह से दूसरी जगह आसानी से जाने के लिए ट्रैवेल एप ना हों, ऑनलाइन खाना मंगाने की सुविधा ना हो, पेमेंट करने के लिए ऑनलाइन वॉलेट ना हो, किसी से बात करने के लिए व्हाट्सएप या वीडियो कॉल जैसी सुविधा ना हो! सोच कर जीना नामुमकिन लगता है। मगर फिर सोचता हूँ की दिल्ली जैसे बड़े शहर में आज से 20 साल पहले भी लोग रहते ही होंगे। एक जगह से दूसरी जगह की दूरी भी उतनी ही होगी। लोगों के पास कैश खत्म भी हो जाता होगा। लोग एक दूसरे से दूर पहले भी रहते ही होंगे।
ये सब सोचने पर लगता है कि बाज़ार ने कैसे हमें पहले खुद पर आश्रित किया और हमारे जीवन में बिल्कुल भीतर तक घुस कर हमें असहाय बना दिया।
इस बाज़ार ने ही हमारे अंदर से महसूस करने की काबिलियत को भी खत्म कर दिया, नहीं तो वो खुशी कैसी होती होगी जब अपने किसी दूर के सम्बंधी से बात करने के लिए ट्रंक कॉल करना पड़ता होगा। आधी रात में भूख लग जाने पर माँ को बिना तंग किये चोरी छुपे किचन में घुस कर खुद के लिए कुछ बनाना कैसा होता होगा। देर रात साधन ना मिलने के डर से घर वक़्त पे आने का सुख कैसा होता होगा। रास्ता भटक जाने पर चाय की दुकान वाले से रास्ता पूछने के बहाने एक प्याली चाय की चुस्की लेने का आनंद कितना अनोखा होता होगा।
मुझे खुशी है कि मैंने चिट्ठियां देखी हैं और ट्रंक कॉल भी। मैंने रास्ता भटकना भी देखा है और चार लोगों से पूछते-पूछते मंज़िल तक पहुंचना भी। मैंने एक ही घर में रह रहे परिवार के सदस्यों को आमने-सामने बैठ कर एक दूसरे से बात करते देखा है। अंधेरे में मोबाइल का फ़्लैश बटन ढूंढना तो देखा ही है पर मैंने बिजली कट जाने के बाद अंधेरे में इधर-उधर, ठोकर खा कर किसी दराज़ में रखे टोर्च की तलाश भी देखी है। परिवार के साथ खरीददारी के दौरान कैश खत्म हो जाने पर, मैंने अपने आप को दुकानदार के पास गिरवी रखवाते हुए भी देखा है। मैंने वो समय देखा और जिया है जब मोबाइल फ़ोन का मुख्य काम दूरदराज़ पर बैठे किसी व्यक्ति से बात कराना होता था।
बेशक समय बदलता है, चीज़ें आधुनिक होती हैं, बदलाव भी उसी प्रकार आना स्वाभाविक है मगर इस बदलाव के कारण इंसानी तौर पर हमारा जो सबसे बड़ा नुकसान हुआ है, वो है महसूस करने की शक्ति का मिट जाना जो आगे की जनरेशन में कम ही देखने को मिलेगी। सही है या गलत, पता नहीं, मगर ये हानि बहुत बड़ी है!
#आशुतोष
This is my personal blog about my personal thoughts. Every person has a world deep inside him, the feelings and emotions which a person never share, even with himself or herself. The world which knows everything about that person, the world which no one else can see, the world which is buried deep inside our soul, its 'The World Within'
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Sunday, 18 November 2018
स्मार्टफोन और हम
Friday, 7 September 2018
आरक्षण और जाति
आज जब दलितों को आरक्षण मिल रहा है, उनके भले के लिए सोचा जा रहा है तो तुम छाती पीट रहे हो, हंगामा मचा रहे हो, मगर तुम भूल रहे हो कि इस स्थिति के लिए तुम खुद ज़िम्मेदार हो. इतने सालों से चली आ रही जाती व्यवस्था से पैदा होने वाली समस्याओं पर तुमने कभी इंसान के रूप में सोचने की ज़हमत ही नहीं उठायी. तुम्हारा काम बनता गया तो तुमने ये सोचना भी नहीं ज़रूरी समझा की आगे चल कर जाती के आधार पर समाज का बंटवारा तुम्हारे लिए ही नासूर बन जाएगा. तुमने अपने पंडित होने पर, कायस्थ होने पर, ठाकुर होने पर अत्यधिक गर्व महसूस किया और वही भावना अपने बच्चों के अंदर भी डाली. तुमने इंसानी जज़्बातों का और प्रेम का पाठ पढ़ाने की बजाये बच्चों को ये बताया की जमादारों को मत छूना, वो गंदे होते हैं, डोम से दूर रहना, वो अपवित्र हैं. हम पंडित वाले शर्मा हैं, तुम्हारा दोस्त लोहार वाला शर्मा है इसलिए उसके साथ ज़्यादा मत घूमा करो. जो लोग Srivastav लिखते हैं वो असली कायस्थ नहीं होते, असली कायस्थ Srivastava लिखते हैं. वो गुजरात वाला पटेल नहीं नीच जात वाला पटेल है. कायस्थ वाले वर्मा Varma लिखते हैं, दूसरी जात के लोग Verma लिखते हैं.
दिमाग पर हल्का सा ज़ोर डालो और सोचो की तुमने अक्षरों के आधार पर इंसान का बंटवारा कर दिया. तुमने शिक्षक की, बैंक के अधिकारी की, डॉक्टर की जात तक का पोस्टमोर्टेम कर दिया.
तुमने 5 साल के बच्चे को ये सिखा दिया की जमादारों को चुल्लू से पानी पिलाया करो, बोतल उसके हाथ में मत दिया करो. तुमने 10 साल के बच्चे को पासी और खटिक का फर्क सिखा दिया. तुम्हारी सोच इतनी गिर गयी कि तुमने चतुर्वेदी को असली पंडित माना और द्विवेदी को कम जानकार मानने लगे. जात कम पड़ने लगी तो तुमने सामुदायिक बंटवारा भी शुरू कर दिया. बंगाली कायस्थ, यूपी के कायस्थ, मराठी कायस्थ सब अलग हो गए, वो सिर्फ बंगाली, गुजरती या मराठी बन गए.
तुमने अपनी सहूलियत के लिए किसी भी जाती को पिछड़ा, या नीच बना दिया और उस जाती को अपना मल उठाने पर मजबूर कर दिया और फिर तुम्ही ने उसे छूने से भी इनकार कर दिया. लोहे के बर्तन बनाना जिसका हुनर था, तुमने उसकी जात उसके काम से ही तय कर दी और फिर उसे भी खुद से हीन मानने लगे.
तुम्हारी खोखली शान ने जिंदगियां बर्बाद कर दीं. तुम्हारी जात के किसी युवा ने जहां अंतर जातीय विवाह करने का निर्णय लिया, वहां तुमने 'ऑनर किलिंग' का सहारा लेकर प्रेम की बलि चढ़ा दी. तब तुमने नहीं देखा कि ऐसा करने में तुमने किसी इंसान को गंवा दिया.
समाज, परंपरा, संस्कृति, जो तुमने ही बनाई, तुम खुद उसमें उलझ गए और जहां तुम खुद को समाज के लिए कृष्ण बना सकते थे, वहां तुमने ध्रितराष्ट्र बनना उचित समझा. जाती के आधार पर प्रेम का गला घुटता रहा, हत्याएं होती रहीं, स्थिति बिगड़ती रही पर तुम अंधे बने रहे.
तुम कहोगे कि क्या अब शूद्रों को सर पे चढ़ा कर बैठा लें? सर पर तो तुमने अपने परिवार को भी नहीं बैठाया है तो किसी और को बैठने की भी ज़रुरत नहीं है, ज़रुरत तो उनको बराबरी का दर्जा देने की है.
तुम अब कहोगे की ये तो सदियों से चला आ रहा है. हमने थोड़ी शुरू किया है. हम तो इसी के साथ जियेंगे, इसी के साथ मरेंगे, हमारे बाद जिसको जो करना हो वो करे.
अगर ध्यान हो तो सदियों से सती प्रथा भी चली आ रही है, क्या उसे भी मानते हो? मानते हो तो बैठा दो अपनी बेटी, बहु या माँ को किसी चिता पर जिंदा जलने के लिए! करा दो अपनी 5 साल की बेटी का विवाह किसी 30 साल के अधेड़ से!
ज़रूरी नहीं जो सदियों से चला आ रहा है वो सही है. वक़्त के साथ हर चीज़ बदलती है, यही प्रकृति का नियम है. 100 साल पहले जो समाज था, आज वैसा नहीं रह सकता और क्यूंकि तुम और मैं मिल कर समाज बनाते हैं इसलिए तुम और मैं भी वैसे नहीं रह सकते जैसे हमारे पूर्वज 100 साल पहले थे. समाज हर एक इकाई के योगदान से बदलेगा. हर किसी को राजा राम मोहन रॉय बनना पड़ेगा.
तुम्हें आरक्षण ख़त्म करना है ना? तो कराओ अपने बच्चों का अंतरजातीय विवाह, तब जाकर समाज की सारी दीवारें टूटेंगी क्यूंकि तब बनेगी सिर्फ एक जाती, मानवता की! और अगर ऐसा नहीं कर सकते तो आरक्षण के खिलाफ आवाज़ उठाने का भी तुम्हें कोई हक नहीं है.
हाँ मैं मानता हूँ कि कई सालों पहले निचली जातियों की जैसी स्थिति थी, वैसी अब नहीं है. निचली जाती के कई लोग आर्थिक रूप से सशक्त हो चुके हैं, पढ़े लिखे हैं और उन्हें आरक्षण की ज़रुरत नहीं है. अगर आर्थिक आधार पर आरक्षण दिया जाये तो स्थिति बेहतर हो सकती है मगर आज भी निचली जाती की बड़ी संख्या अपनी स्थिति में सुधार के लिए रास्ता देख रही है.
समलैंगिकता को अपराध ना मान कर सर्वोच्च न्यायलय ने भारत को बेशक आज़ादी दिलाई है परा अभी भी जाती के बंधनों में बंधे इस देश को आज़ादी चाहिए. क्या हो अगर सरकार कानून बना दे की अब हर कोई सिर्फ अंतरजातीय विवाह करेगा? तब एक ऐसे भारत का निर्माण होगा जहां प्रेम और हुनर के बलबूते हर समस्या का समाधान निकलेगा. तब तुम अपने नेता उसकी जात के आधार पर नहीं उसके काम के आधार पर चुनोगे. तब तुम किसी को चिढ़ाने के लिए चमार या तेली नहीं कहोगे. तब तुम एक बड़ी आबादी को नाकाम होने से बचा लोगे. तब वर्गों का फर्क नहीं रहेगा.
मगर ऐसा होगा नहीं. क्यूंकि कोई बदले ना बदले, तुम तो बिलकुल नहीं बदलोगे. तुम अपनी बिरादरी द्वारा बनायीं गयी काल कोठरी के अंदर ही सड़ोगे, समाज गया तेल लेने, और तुम्हारी इसी नाकामी का फायदा नेता उठाएंगे. तुम्हारी इसी कमज़ोरी को अपनी शक्ति बनायेंगे. तुम्हे जाती का हवाला देकर तुमसे वोट बटोरेंगे और तुम्हें उसी काल कोठरी में पड़े रहने के लिए छोड़ देंगे. कृष्ण यदुवंशी थे, यादव, तो पंडित होकर तुम अपने से नीच जात वाले की पूजा कैसे कर लेते हो? राम आर्य थे और आर्य पश्चिम एशिया से आये थे, तो राम भारतीय नहीं हुए, भारतीय नहीं हुए तो एंटी-नेशनल की केटेगरी में उन्हें रखा जायेगा या नहीं? मैं तो बस पूछ रहा हूँ, माफ़ करना अगर बुरा लगा हो, तुम्हारी भावनाएं आहात हो गयी होंगी, है ना? आगे की पीढ़ी भी पूछेगी. तब तुम क्या जवाब दोगे या तब भी ध्रितराष्ट्र की तरह मूक हो जाओगे जिस तरह द्रौपदी के चीरहरण के दौरान वो हो गए थे.
इस बारे में ज़रा सोचना. खैर नहीं भी सोचोगे तो क्या फर्क पड़ेगा, तुम तो सवर्ण हो, उसी में खुश होते रहना!
#आशुतोष
Tuesday, 21 August 2018
आकाश या पाताल?
मैं आसमान का शौकीन नहीं हूं. आसमान पर चलने से औकात का पता नहीं चलता। मुझे पाताल पसंद है, क्योंकि पाताल हक़ीकत से रूबरू कराता है. आप जहां रह रहे हैं, वो भी पाताल ही है. आप को क्या लगता है कि पाताल सिर्फ गर्म तेल, कांटेदार सेज और गर्म ज्वालामुखी ही है? अपने चारों ओर नज़र घुमा कर देखिए, जिस समाज में आप रह रहे हैं वो भी किसी पाताल से कम नहीं है। कभी किसी का बलात्कार होते देखा है? कभी किसी की पीट-पीट कर हत्या होते देखी है? कभी किसी को अपने पूरे परिवार को अन्धविश्वास का हवाला देकर सूली पर चढ़ाते देखा है? अगर नहीं, तो शायद आप अनभिज्ञ हैं, आपको पता नहीं पाताल क्या है। अगर आप ऐसे समाज में आकाश के सपने देखते हैं तो आप लाश हैं, चलती फिरती लाश.
जॉन एलिया ने कहा है, ' क्या तकल्लुफ करें यह कहने में, जो भी खुश हैं, हम उनसे जलते हैं!'
जलना तो लाज़मी है, क्यूंकि जिसको एहसास है कि वो पाताल में रह रहा है, वो आज के समय में ज्वलनशील है. अपनी मस्ती में जीते-जीते आप अपने होने का मकसद भूल जाते हैं। आप खुश होने का ढोंग करते हैं, शायद कुछ पल के लिए खुश हो भी जाते हों मगर वो क्षण मात्र के लिए है। आप खुश हैं क्योंकि आप जीवित हैं, या खुश हैं के अभी तक आप मरे नहीं। मगर असली ग़म तो इस जीने और मरने के बीच ही है। और जिस पाताल की बात मैं कर रहा हूँ, वो भी इस मरने और जीने के बीच समाया है।
वैसे देखें तो इस पाताल के मूल्य रूई की तरह हलके हो चले हैं पर सुई की तरह चुभने लगे हैं. आप हवाला देते हैं की क्या कीजियेगा, समाज ही ऐसा है! अजी समाज कौन है? मेरे और आप जैसे असंख्य शुक्राणु जो किसी अंडाशय से मिलाप के लिए भटक रहे हैं। इस मिलाप से उत्पत्ति होती है, द्वेष की और नफरत की। आपने सोचने की ज़हमत उठायी की ऐसा क्यों है? बात यह है कि आपकी भावनाएं आपके कद से बड़ी हो चुकी हैं. सुई की तरह चुभने लगी हैं. आप दूसरों को चोट पहुंचाने में हिचकते नहीं मगर आपकी महज़ भावनाएं ही आहत हो जाएं तो आप छटपटाने लगते हैं। वैसे छटपटाना भी बेहतर है, कम से कम इस बात का सबूत है कि आप ज़िंदा हैं। मगर ध्यान रहे कि छटपटाहट हड़बड़ाहट को जन्म देती है जिससे लड़खड़ाहट पैदा होती है जिससे समाज गिरता है, पंगु बनता है और फिर बच जाता है सपने देखना, आसमान में चलने के।
पर मैं आसमान का शौकीन नहीं हूं क्योंकि, आसमान पर चलने से औकात का पता नहीं चलता!
Friday, 17 August 2018
मेरे लिए क्या लायीं?
घर पर अकेला था। बड़ा भाई नौकरी पर गया था और भाभी अपनी माता जी के साथ बाज़ार से कुछ सामान खरीदने। तबियत नासाज़ थी। घर में आराम कर रहा था। लेटे लेटे कब नींद आ गयी पता नहीं चला। कुछ देर बाद डोर बेल बजी। हड़बड़ाहट में नींद खुली तो जल्दी दरवाज़ा खोलने गया। भाभी और उनकी माता जी बाज़ार से लौट आईं थीं। हाथ में सामान से भरा झोला था। दरवाज़ा खोल कर मैं अपने कमरे में आकर दुबारा सोने के लिए लेट गया। पर तुरंत नींद ना आई। तबियत खराब होने के बावजूद भी उस दौरान ऊर्जा का प्रवाह महसूस हुआ। एक पुरानी याद लौट कर ज़हन में आ गयी। एक ऐसी याद जो इतने दिनों में कभी नहीं आयी।
उन दिनों शामें कुछ अधिक लंबी हुआ करती थीं। दिन का खाना बनाने और खिलाने के बाद मम्मी और चाची जब फुरसत पाती थीं तो बाज़ार से सामान लाने की लिस्ट तैयार करने में जुट जाती थीं। साबुन, तेल, मंजन, खाने में उपयोग होने वाले मसाले, और ज़रूरत के अन्य सामानों को हिंदी की एक धारी वाली कॉपी के बीच के पन्नों पर लिखा जाता था। घर चलाने का ऐसा हुनर और ज्ञान जो कहीं और देखने को ना मिले। 12-13 लोगों के घर में महीने में कितना साबुन लगेगा, किसको किस चीज़ की आवश्यकता है, इन सब चीज़ों का उन्हें ज्ञात था। जितना किलो समान आता, उससे एक ग्राम भी महीने में कम ना पड़ता। ज़रूरत का सारा सामान चौक में उपलब्ध होता था। जिस दिन पता चल जाये कि आज मम्मी और चाची को चौक जाना है, उस दिन सुबह से ही भाई बहनों की ख्वाहिशों की गठरी खुलने लगती थी। हमारे लिए नई बनियान ला देना, मेरा स्कूल बैग फट गया है, चौक से फुल्की लेती आना, खन्ना वाले के यहां से एक टॉप ला देना, आज दोस्त नई वाली मैग्गी लाया था, वही वाली मेरे लिए भी लेती आना... सिर्फ उस दिन ज़रूरतें अपने आप पैदा होती थीं। शाम के 4 बजते बजते मम्मी और चाची के निकलने का वक़्त हो जाता था।
उनके घर से निकलते ही इंतज़ार करना भी शुरू हो जाता था। किसी की नई बनियान आने वाली होती थी, किसी का नया टॉप आने वाला होता था, कोई चौक की फुल्की के स्वाद को चखना चाहता था। उस दौरान इंटरव्यू के लिए कॉल आने का इंतज़ार करने से ज़्यादा भारी मम्मी-चाची का घर लौटने का इंतज़ार करना होता था। शाम के 6-7 बजते बजते उत्सुक्ता अपनी चरम सीमा पर होती थी। बस किसी भी वक़्त दोनी आते होंगे। रात के 8 बजते बजते गुस्सा आने लगता था कि इतनी देर भला कोई करता है! गली के बाहर किसी भी रिक्शे की घंटी सुनाई पड़ती थी तो भाग कर गेट के पास खड़े हो जाते थे। फिर वहीं से चिल्ला कर अंदर इतिल्ला किया जाता था कि अभी नहीं आयी हैं। बेसब्री ऐसी होने लगती थी कि हम में से कोई एक गेट के पास ही खड़ा हो जाता था। फिर किसी रिक्शे की घंटी, फिर घर से निकल कर देखना।
आखिरकार मम्मी और चाची का रिक्शा भी गली में प्रवेश कर ही जाता था। भाग कर हम लोग रिक्शे तक जाते थे और सामान से भरे तमान झोलों को उठा कर अंदर लाते थे। मसाले से भरे झोलों को उठाने में किसी की रुचि नहीं होती थी जिसे मम्मी-चाची या तो रिक्शे वाले से अनुरोध कर के घर के अंदर रखवाती थीं या चाची खुद ढो कर अंदर लेकर आती थी।
जितनी देर में वो दोनों रिक्शे वाले को रुपये देकर अंदर आती थीं, उतनी देर में सारा सामान झोलों से निकल कर ज़मीन पर पड़ा रहता था। उनके अंदर आते ही 'मेरे लिए क्या लाई?' के सवाल के गोले उनपर दागने शुरू हो जाते थे।
आधे से ज़्यादा सामान ऐसा होता था जिससे हमारा कोई सीधा वास्ता नहीं था, पर सामान देख कर ऐसी उत्सुक्ता होती थी, जिसकी कोई तुलना ही नहीं।
कोई नई चाय की पत्ती, या कोई नया साबुन, किसी पाउडर के साथ मुफ्त मिली छोटी तेल की डिब्बी, चाय के लिए नया कप सेट, सब अद्भुत एहसास देता था। सारा सामान करीने से अपने पास सजा कर दुकानदार वाला एहसास होता था। सारे सामानों को देखने के बाद ध्यान आता था कि जिसने जो मंगवाया है वो आया या नहीं। कभी-कभी सबके लिए कुछ ना कुछ आता और मेरे लिए नहीं तो मन रोआंसा हो जाता था, पर तभी मम्मी रुमाल का एक पैकेट निकाल कर खुशी से कहती थी, ये देखो तुम्हारे लिए ये लाये हैं! बस उस एक पल में सारी खुशी अपने हिस्से में आ जाती थी। उसके बाद अन्य सामानों की चकाचौंध में ऐसा खो जाते थे कि ये ध्यान ही नहीं आता था कि वो लेडीज़ रुमाल का पैकेट मेरे लिए नहीं, ज़रूरत पड़ने पर घर की महिलाओं के लिए काम आएगा। रात का खाना खाने के बाद सारा सामान हरे रंग की लकड़ी की छोटी सी अलमारी में रख दिया जाता था।
आज लंबे समय बाद जब भाभी और उनकी मम्मी को समान के साथ बाज़ार से आते देखा तो कुछ पल के लिए वैसी ही उत्सुक्ता मन में उठ आयी...लगा शायद उन झोलों में मेरे लिए भी कुछ हो, मन हुआ कि पूछा जाए, मेरे लिए क्या लायीं?
Tuesday, 22 May 2018
आओ, हिन्दू और मुसलमान की बात करें
यार समझने की कोशिश करो, क्योंकि अब अगर तुम नहीं समझे तो बहुत देर हो जाएगी। ये मसला कभी हिन्दू मुसलमान का था ही नहीं, ना ही किसी दूसरे धर्म, जाती,समुदाय से जुड़ा है। उन्हें सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होना है, उन्हें देश में अपनी पैठ जमानी है और वो बखूबी कर रहे हैं, जानते हो कैसे? तुम्हारी और मेरी छाती पर चढ़ कर, हम सब को कीड़े समझ कर, जिसकी जान की कोई कीमत नहीं होती, जिसे कभी भी मसला जा सकता है। तुम मच्छर बन कर ज़रा सा भिनभिनाओगे और वो तुम्हें कुचल देंगे, वो ये नहीं देखेंगे कि तुम हिन्दू हो या मुसलमान। वो सिर्फ तुम्हारा खून बहाएंगे, और यकीन मानो दोस्त, दोनों का खून लाल ही होगा।
तुम जानना चाहते हो कि हक़ीक़त क्या है? ज़रा अपने आप को देखो और खुद से पूछो, क्या वाकई तुम अपने आप में समाए हो या किसी और के बनाये हुए इंसानी पुतले में महज़ घुसे हो जिसके ऊपर चमड़ी तो तुम्हारी है पर अंदर की रूह किसी और के द्वारा घुसेड़ दी गयी है।
याद करो जब तुम स्कूल-कॉलेज में थे, याद करो जब तुम किन्हीं कारणों से टिफ़िन नहीं ला पाते थे, तब तुम्हारा दोस्त तुम्हारे साथ अपना टिफ़िन बांटता था, क्या तब तुमने कभी ये जानने की ज़हमत उठायी की वो रोटी का टुकड़ा हिन्दू के घर का है या मुसलमान के घर का? तुम्हारे पैसे के खरीदे हुए समोसे को झपटने के लिए जब दस हाथ एक साथ समोसे की थैली में अंदर घुसते थे तो कभी ये सोचा कि हिन्दू का हाथ है या मुसलमान का?
जब परीक्षा में जवाब समझ नहीं आता था तब इधर उधर जवाब ढूंढने की उम्मीद से नज़र दौड़ाते थे तो ये सोचा था कि सिर्फ हिन्दू या मुसलमान के जवाब को सुनोगे, अन्य को अनसुना कर दोगे?
आज जब तुमने सोचने-समझने की शक्ति अपने अंदर पैदा कर ली है, तो तुम एक दूसरे को धर्म और जात से पहचानने लगे हो। घंटों फेसबुक पर किसी पुराने दोस्त से राजनीतिक मुद्दे पर बहस कर रहे हो, और उस बहस में दोस्ती की मर्यादाओं को लांघ कर एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमला कर रहे हो और फिर उन्हीं दोस्तों को धर्म और जाति के नाम पर बांट कर अलग थलग हो जा रहे हो।
तुम असली खेल समझ ही नहीं पा रहे क्योंकि तुम किसी भीड़ में चल रही भेड़ की तरह बन गए हो जो बिना सर ऊपर उठाए, आगे वाली भेड़ के पीछे पीछे चली जाती है। कौवा कान काट कर ले गया, तुम कौए के पीछे भागने लगे, कान छू कर देखा ही नहीं।
वो लोग जो चाहते थे, तुम वो बन चुके हो, 'भक्त'।
तुम बीजेपी के भक्त हो, तुम कांग्रेस के भक्त हो, तुम सपा, बसपा, कम्युनिस्टों के भक्त हो। किसी ने तुम्हें एक परिवार का फैन बनाया, किसी ने व्यक्ति का फैन बनने पर मजबूर कर दिया, फिर उस व्यक्ति और परिवार ने तुम्हें उनकी पार्टी का पैरोकार बना दिया, फिर उस पार्टी ने खुद को हिंदुत्व, इस्लाम, दलित, अगड़े, पिछड़े से जोड़ कर तुम्हारे सामने आधुनिकता और विकास के सभी रास्ते बंद कर, धर्म, और कट्टरता के ऐसे रास्ते खोल दिये जो आगे जा कर बंद हो जाते हैं। अनभिज्ञता का अंधेरा मिटाने के लिए जिस धर्म को बनाया गया था, उन्होंने उसी धर्म से तुम्हें डराना शुरू कर दिया। तुमको उकसा कर तुमसे मंदिर तुड़वाये, मस्जिद तुड़वायीं, और इस बीच जो सबसे बड़ी चीज़ टूटी वो थी एक दूसरे का भरोसा। सच कहूं तो ये सब तुमने जानबूझ कर नहीं किया, क्योंकि तुम तो अंधे बने रहे। उन्होंने तुम्हें यारों दोस्तों से भिड़ा दिया, आंगन का बंटवारा करवा दिया, और तुम अंधे बने रहे। तुम्हें पता ही नहीं चला, किसी राजनीतिक पार्टी या किसी नेता से मोहब्बत कब जुनून बन गयी, जुनून से भक्ति और कब राजनीतिक पार्टी या विचारधारा के लिए यही भक्ति, कट्टरता के कगार पर पहुँच गयी।
तुम्हें एहसास भी नहीं हुआ और मोदी या बीजेपी को सपोर्ट करना, हिन्दू होने की या देश भक्त होने की निशानी हो गयी और कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करना मुसलमान और देशविरोधी पहलू बन गया। जैसा राजनीतिक पार्टियों ने तुम्हें बनाया, तुम वैसे बन गए। समाजवाद या वामपंथ जो इंसानी जज़्बातों पर बुनी हुई विचारधारायें थीं, तुमने उसमें भी राजनीति को घुसा दिया। विचारधारा तो छोड़ो, तुमने रंगों, जानवरों और शमशान-कब्रिस्तान को भी धर्म और राजनीति से पाट दिया।
तुम्हें चारों ओर असहनशीलता दिख रही है ना? हाँ दोस्त, असहनशीलता वाकई है, पर इसे पैदा करने में तुम भी ज़िम्मेदार हो। ज़रा अगल बगल गौर कर के देखो। तुम्हारी कट्टरता से किसी को डर लग रहा है, कोई बात कहने में डर रहा है कि जहां उसने कुछ बोला तहां उसपर भाजपाई या कांग्रेसी का ठप्पा लगा। जहां उसने किसी नेता या पार्टी की आलोचना की तहां उसे हिन्दू और मुसलमान बना दिया गया।
तुम्हें इन सबके बीच ये भी ध्यान नहीं रहता कि सोशल मीडिया या किसी सभा में, अपने दोस्तों और जानने वालों से बहस के दौरान तुमने जो अपने इंसान होने की गरिमा गिराई, उसमें तुम्हारी पीठ थपथपाने कोई भी नेता नहीं आने वाला, ना ही वो तुम्हारे लिए सरकारी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने वाला है, शायद उसे पता ही नहीं कि तुम मौजूद हो, जो उसकी पूजा करते हो, वो तो तुम्हें बेवकूफ भीड़ ही समझता है जिसे उल्लू बना कर वोट लेना उसका काम है और यकीन मानो, ये काम वो बखूबी कर रहा है।
किसी के दादा ने इसी देश में हल जोता है, किसी के पिता ने इसी देश में सब्ज़ियों की दुकान लगाई है और उसी को तुम बात बात सिर्फ इसलिए पाकिस्तान भेज देते हो क्योंकि वो मुसलमान है। अरे मई की किसी रात में तुमने भी लाइट कटने पर पसीने से तर बतर होते हुए व्यवस्था को कोसा है, तुमने भी तेल के बढ़ते दामों को देख कर सरकार को दुहाई दी है, तुमने भी सड़कों पर पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद किसी नेता को गाली दी है..... और उसने भी शहर के सबसे प्रसिद्ध स्वादिष्ट व्यंजन को खाने के बाद अकसर कहा है कि ये तो मेरे शहर से बेहतर कहीं नहीं मिलता। तो फिर किस अधिकार से तुम उसे पाकिस्तान भेज देते हो?
ये ज़ुबान तुम्हारी नहीं, उन नेताओं की होती है जो तुम्हारे मुंह में अपनी ज़ुबान ठूंसते हैं।
तुम अपने दोस्तों को भी अब सावरकर की औलाद, मोदी के ग़ुलाम कह देते हो, मगर भूल जाते हो कि कभी किसी दौर में तुम दोनों साथ मिलकर एक ही युवती को पसंद करते थे, और अपनी पसंद पर खुश होते थे। तुम्हारे अंदर किसी नेता, या कमल के फूल के लिए जो नफरत है ना, वो तुम्हारी खुद की पैदा की हुई नहीं, दूसरे के दिमाग की उपज है जिसे फर्क नहीं पड़ता कि इसका तुम्हारे जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
चुनाव पास आ रहे हैं दोस्त, सोशल मीडिया या अन्य मीडिया की करतूत को पहचानो। मीडिया का कुछ हिस्सा इस कैकई रूपी राजनीति की मंथरा है और ये दोनों एक दूसरे के पिछलग्गू! सोचने समझने की शक्ति पैदा करो, खुद के लिए सही गलत का निर्णय लेना तुम्हारा काम होना चाहिए, मीडिया या किसी सत्ता पर बैठे या सत्ता पाने के भूखे लोगों का नहीं। अगर पार्टियां गठबंधन कर सरकार बना सकती हैं तो हम गठबंधन कर सरकार के समीकरणों को बदल सकते हैं। किसी नेता या पार्टी के लिए अपने रिश्तों को ताक पर मत रखो क्योंकि किसी भी नेता को चाहने वाले हज़ार मिल जाएंगे पर तुम्हारा कोई खास तुमसे दूर गया तो नहीं मिल पायेगा। विश्वास करो, बार बार ये कहने से की 'थोड़ा रिसर्च कर के आओ फिर बात करो' वाले बयान से तुम खुद की नज़रों में ज्ञानी दिखते होगे पर असल बात तो ये है कि तुम भी नहीं जानते तुम किस दुराचार को न्योता दे रहे हो। किस पार्टी को वोट देना है वो तुम तय करो, पर अपने नाम के आधार पर नहीं, उनके काम के आधार पर क्योंकि तुम चाहे मोहन हो या मोहम्मद, देश तुम्हें ही बचाना है।
#आशुतोष