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Wednesday, 29 April 2020

एक अभिनेता जो था, जो है और जो रहेगा!

साल 2020 में बेशक ये साबित हो गया है कि सबसे बड़ा 'मदारी' वो ऊपर वाला है....रह-रह कर ऊपर वाले की बात इरफान खान की आवाज़ में कानों में गूंज रही है,
"तुम मेरी दुनिया छीनोगे, मैं तुम्‍हारी दुनिया में घुस जाऊंगा!"
हमने उसकी दुनिया के साथ जो सुलूक किया, उसने उसका बदला एक महान अभिनेता को अपने पास बुलाकर ले लिया। 
"जो कहूंगा नहीं समझोगे...5, 10, 15 साल बाद शायद कहे का असर होगा...गहरा!"
असर तो होने लगा है। अभी से ही। अब वो जज़्बात से भरी आंखें, वो चीखती खामोशी और असलियत को छूता अभिनय दोबारा देखने को नहीं मिलेगा।
इरफान अभिनेता नहीं जज़्बात हैं, वो जज़्बात जो उन करोड़ों लोगों के मन में कैद है जिनकी शक्ल-सूरत फिल्मों के लायक नहीं है मगर कहीं न कहीं उन्हें खुद को बड़े पर्दे पर जीना है। इरफान ने उन लोगों की परछाई प्रस्तुत की...आम आदमी को बड़े पर्दे पर दर्शाया और शायद आज वही आम आदमी इरफान के जाने से सबसे ज़्यादा दुखी है।
"ये शहर हमें जितना देता है, बदले में कहीं ज्‍यादा हम से ले लेता है"
शहर का तो पता नहीं मगर भगवान ऐसा ही...जो थोड़ा भी हमसे लेता है वो हमारे लिए बहुत होता है।
पान सिंह तोमर, हासिल, डी-डे, मदारी, हैदर, हिंदी मीडियम, लाइफ इन मेट्रो, पीकू...आप फिल्मों का नाम लीजिये और हर बार एक ऐसे इरफान की शक्ल ज़हन में आती है जो पिछली फिल्म से अलग होती है। 
लॉकडाउन के पहले मैंने जो आखिरी फ़िल्म देखी थी वो इरफान की ही अंग्रेज़ी मीडियम थी...और उस फिल्म को देखकर इरफान खान से फिर प्यार हो गया था। 
"टोटल तीन बार इश्क़ किया, और तीनों बार ऐसा इश्क़, मतलब जानलेवा इश्क़, मतलब घनघोर, हद पार!"
मेरे साथ भी कुछ ऐसा ही था...इरफान की तो सभी फिल्में बेहतरीन थीं, मगर मदारी, पान सिंह तोमर और अंग्रेज़ी मीडियम मेरे दिमाग में चिपक गयी हैं। 
इरफान से जुड़ी पहली याद 'हासिल' फ़िल्म की है। फ़िल्म इलाहाबाद विश्वविद्यालय की छात्र राजनीति पर बनी थी इसलिए भी बेहद करीब थी और उसमें इरफान का अंदाज़... 
"...और जान से मार देना बेटा, हम रह गये ना, मारने में देर नहीं लगायेंगे, भगवान कसम!"
काश की इरफान रह जाते। अभी उनको और देखना था। उस बड़े कलाकार को बूढ़ा होते देखना था। उनके अंदाज़ पर तालियां पीटनी थीं मगर ये बात भी सच है कि "डेथ और शिट, किसी को, कहीं भी, कभी भी, आ सकती है!"

होनी को कोई नहीं टाल सकता...इरफान हमारे बीच नहीं हैं...अब सिर्फ हैं तो उनकी फिल्में...जिसके सहारे आने वाली पीढ़ी ये जानेगी कि इरफान खान होने के क्या मायने थे। 
रूहदार ने सच ही कहा था, "दरिया भी मैं दरख्त भी मैं, झेलम भी मैं, चेनाब भी मैं...दैर हूँ, हरम भी हूँ...शिया भी हूँ, सुन्नी भी हूँ...मैं हूँ पण्डित!...मैं था, मैं हूँ, और मैं ही रहूँगा..."
#Ashutosh

Saturday, 18 April 2020

मेरा पहला सफेद बाल

सुबह शीशे के सामने खड़े हो कर ब्रश करना इसलिए भी ज़रूरी होता है जिससे चेहरे को अलग-अलग एंगल से देर तक देखा जा सके। आज की सुबह भी अलग नहीं थी। ब्रश करते-करते चेहरे के तमाम हिस्सों पर नज़र दौड़ रही थी कि तभी सर पर नज़र पड़ी और मैं हैरान रह गया! माथे के ठीक ऊपर वाले बालों पर एक पतला, कमज़ोर सा बाल सफेद दिखाई दे रहा था। पहली नज़र में तो लगा कि लाइट शायद इस अंदाज़ से पड़ रही होगी कि बाल चमक रहा होगा। मगर मामला गंभीर था तो अंदाज़े पर रफा-दफा करना ठीक नहीं था। उसी वक़्त ब्रश करने जैसे निरर्थक कार्य को बीच में ही समाप्त कर के मैंने बड़े ही एहतियाद से बाल को परखना शुरू किया। उस पतले, कमज़ोर और महीन बाल का रंग वाकई सफेद हो चला था। 
क्या मैं बूढ़ा हो रहा हूँ? क्या अभी से सारे बाल पक जाएंगे? सवाल तो मन में कई उठ रहे थे मगर उन सवालों के बारे में सोच कर चिंता नहीं हो रही थी। खयाल आया कि जॉर्ज क्लूनी की तरह सारे बाल सफेद कर लेंगे। या डॉक्टर स्ट्रेंज की तरह दोनों तरफ की कलम के आसपास के बालों को सफेद छोड़ कर बाकी के बालों को काला रंग लिया जाएगा। 
कुछ वक्त बाद लगा कि अभी उम्र ही क्या है, इतनी जल्दी तो बाल नहीं सफेद होना चाहिए था, फिर ध्यान आया कि स्कूल के दौरान ही कुछ दोस्तों के बाल सफेद हो गए थे। 
वैसे देखा जाए तो बाल हमेशा के लिए सफेद हो जाना कितना अजीब है ना! आधी ज़िंदगी बाल के जिस रंग की आदत हो गयी थी अब बाल वैसे न रह कर उस रंग के हो जाएंगे जिससे लोग आपको बुज़ुर्ग समझने लगेंगे। एक बार गुरुजी ने कहा था कि बाल पक जाने का अलग आनंद होता है, मगर अब महसूस हो रहा है कि उन्होंने ये तो बताया ही नहीं कि जब सर पर पहला सफेद बाल दिखाई दे तो उसे अपनाया कैसे जाए। ज़ुल्फ़ों पर हाथ फेरने में डर बना रहेगा कि कहीं वो एक बाल टूट गया और उससे सारे बाल सफेद हो गए तो! 
कुछ देर के लिए अजीब सा एहसास होता रहा। न जाने किस बात का...फिर बालों को झाड़ने के बाद वो सफेद बाल आसानी से नज़र नहीं आया इसलिए उस पर से ध्यान हट गया। वैसे अब मैं भी आधिकारिक रूप से कह सकता हूँ कि मैंने धूप में बाल नहीं सफेद किये हैं!
#आशुतोष

सही-गलत के बीच फंसा धर्म

हो ये रहा है कि पूरी शिद्दत से गलत को गलत कहा जा रहा है और साथ ही ढिंढोरा पीट-पीट कर सही को सही भी कहा जा रहा है...मगर समस्या ये है कि खुद की गलत मान्यताओं या कृत को कोई गलत नहीं कह रहा और दूसरे की मान्यताओं या कृत को गलत ठहराने की होड़ लगी है। 
अपनी गलती को ढकने के लिए सामने वाले की गलती को उजागर किया जा रहा है। खुद की गलती को छोटा बताने के लिए दूसरे की गलती को बड़ा बनाया जा रहा है। कहा ये जा रहा है कि अकेले मैं ही गलत नहीं हूं तुम भी गलत हो...और इस उधेड़बुन में कोई ये ध्यान नहीं दे रहा कि दो गलत चीज़ों को जोड़ कर सही चीज़ की उतपत्ति नहीं होगी। 
तुम अगर हिन्दू हो और मुसलमान की गलती ढूंढ रहे हो या फिर तुम मुसलमान हो और हिन्दू की गलती ढूंढ रहे हो तो तुम वाकई अंदर से खोखले हो क्योंकि दूसरे पर सवाल उठाने से पहले अगर तुम खुद ही अपनी कमियां और खामियां नहीं देख पा रहे तो तुम कट्टरपंथी विचारधाराओं के द्वारा मूर्ख बनाये जा चुके हो। 

ये सच है कि हर किसी के लिए उसका धर्म सम्मानजनक है, इसलिए किसी और के द्वारा बार बार उसपर सवाल उठाया जाना गलत है, लेकिन तुम खुद भी अपने धर्म और उसके गलत कृत पर अगर सवाल नहीं उठा रहे तो समझ जाओ कि तुम धर्म के चंगुल में फंस चुके हो।
खुद को अपने धर्म का रक्षक समझना बंद करो! और बंद करो अपने ज़हरीले दिमाग के साथ सोशल मीडिया के अखाड़े में कूदना! 5-6 इंच के मोबाइल फोन से तुम अपने 'धर्म' को बचाने के लिए जिस धर्म युद्ध को इस सोशल मीडिया पर छेड़ रहे हो उसकी ज़रूरत नहीं है! बंद करो ये सोचना कि धर्म खतरे में है क्योंकि जिस धर्म की गलत तस्वीर तुम्हारे प्रिय नेताओं ने तुम्हें दिखाई है वो असल धर्म नहीं है! तुम्हें अगर धर्म के लिए कुछ करना है तो घर में बैठकर एक दूसरे के धर्म पर कटाक्ष करना बंद करो! उस धर्म के लोगों के उत्थान के लिए कुछ करो! तुम्हें अपने धर्म की अच्छाई बताती एक फेक न्यूज़ मिलती है और तुम उसे झटपट सोशल मीडिया पर शेयर कर देते हो ताकि तुम दूसरे धर्म वाले पर हमला कर सको और ये बात सको कि तुम्हारा धर्म उसके धर्म से कितना महान है! 
ये धर्मों की तुलना करने से, और एक को दूसरे से बेहतर बना लेने से तुम क्या हासिल कर लोगे? राजनीतिक दलों ने हमें बिना बताए अपने अपने धर्मों का 'रक्षक' बना दिया है...विश्वास मानो धर्म को ऊंचा या नीचा दिखाने का ये खेल इतना बुरा है कि इसका कोई अंत नहीं है क्योंकि कोई भी दूसरे पर लांछन लगाने का मौका नहीं छोड़ना चाहता। 

क्या वाकई हमें अपने धर्म को लेकर इस प्रकार संवेदनशील होने की ज़रूरत है और इस कदर कि ज़हर फैलाते फैलाते हम खुद ज़हर बन जाएं!
खतरे में धर्म नहीं इंसान है और इस देश का हर नागरिक जिसने आंखें मूंद रखी हैं। 
अक्सर फेसबुक पर हम ये तंज़ मारते हैं कि 'अब फलाने धर्म के लोग चुप रहेंगे' या 'अब फलाने धर्म के लोग इसपर कुछ नहीं बोलेंगे'...सोच कर देखिए तो आप पाएंगे कि आप वाकई चुप हैं, क्योंकि आप सही चीज़ों के खिलाफ सवाल नहीं खड़ा करते! आप बेरोज़गार हैं तो आप क्यों नहीं आवाज़ बुलंद करते कि काबिल होने के बावजूद आपको नौकरी क्यों नहीं मिल रही! आप आवाज़ क्यों नहीं उठाते कि आपके शहर की सड़कें क्यों नहीं बनती! आपके धर्म के नेता आपको ये कह कर भड़काता है कि आप खतरे में हैं तो आप उससे ये सवाल क्यों नहीं पूछते कि अगर हमने तुम्हें चुना तो तुम हमें खतरे से कैसे बाहर निकालोगे? मगर ये सवाल तो काफी उलझे हुए हो जाएंगे! आपको अगर धर्म पर ही सवाल करना है तो अपने अपने धर्मों पर नज़र क्यों नहीं डालते! क्यों नहीं पूछते कि हमारे धर्म में ये जो कृत हो रहा है वो क्यों हो रहा है....मगर नहीं! आपको सिर्फ लड़ना है, दूसरों पर सवाल खड़े करने हैं और फिर सोचना है कि देश तरक्की क्यों नहीं कर रहा! देश इसलिए तरक्की नहीं कर रहा क्योंकि आप खुद को बदलना नहीं चाह रहे। आप राजनीतिक दलों की कठपुतली बने रहना चाहते हैं। आप अगर किसी भी पार्टी के अंध समर्थक हैं या अंध विरोधी हैं तो आप भी भक्त की ही श्रेणी में आते हैं, इसलिए खुद को भी ये उपाधि दे दीजिएगा। 
अंत में सबसे महत्वपूर्ण बात, आप देश में रहते हैं, अपने नेता चुनते हैं इसलिए उन्हें आपके जीवन को बेहतर करने का ज़रिया बनने दीजिये, आप उनकी राजनीति चमकाने का ज़रिया मत बनिये...रही बात धर्म की, तो ये शाश्वत सत्य है कि व्यक्ति पैदा होते के साथ ही धर्म में बंध जाता है मगर इसके ये मायने नहीं हैं कि आप मानवता भूल जाएं!
Jai Hind!
#Ashutosh

Tuesday, 31 March 2020

जवान होती धरती, बंदिशों में इंसान

जिस आसमान को अब तक आग बरसाना शुरू कर देना चाहिए था वो पानी बरसाए जा रहा है। बादलों में जैसे बरस जाने की होड़ लगी है। जिस हवा से अब तक होंठों पर पपड़ियां पड़ जानी चाहिए थीं उसकी सोहबत बदली सी लग रही है। सड़क पर पड़ी नीम की पत्तियां ही एक मात्र सबूत हैं कि पतझड़ बीत रहा है। सड़कें किसी विधवा की मांग की तरह सूनी हो चुकी हैं। घरों के अंदर सुगबुगाहट तो है मगर इंसानी शोर शून्य हो चुका है। लग रहा है मानो मुर्दों की बस्ती है। शोर है, कुत्तों का, जो अब रोड पर अपना मालिकाना हक समझने लगे हैं। किसी घर के अंदर से बर्तन गिरने की आवाज़ आती है तो लगता है कोई अपशकुन होने वाला है। ये दौर अपशकुन का है।
ये अंत है...अंत ही तो है! लग रहा है प्रकृति करवट ले रही है। सालों तक मानवता ने उसका बलात्कार किया है। शायद अब उसने हिसाब चुकता करने का प्रण लिया है। 
हर दिन मौत की खबर आ रही है,...इंसान की, यहां से, वहां से...उन जगहों से भी जहां लोगों ने मौत पर विजय पा लेने का दावा किया था। इंसान के बीच दायरे बन चुके हैं। अब कोई किसी से नहीं मिलता। हाथ मिलाने से भी कतराते हैं। हर कोई फिक्रमंद है। ये दौर फिक्र करने का है, अपनों की फिक्र। हर सुबह उठ कर लगता है कि बस आज का दिन गुज़र जाए। गुज़र रहे हैं, दिन और उसके साथ वो लोग भी जो किसी न किसी के अपने थे।
घरों में कैद, कमरे में बंद, बाहर कोई दुर्गा का पाठ कर रहा है। मगर दुर्गा सब देख रही है। हंस रही है। उसकी बूढ़ी धरती फिर जवान हो रही है। 
कूड़ा ले जाने वाली गाड़ी अब भारत को स्वच्छ रखने के गीत नहीं गाती। मौत से बचने के उपाय दे जाती है। चौकीदार गेट के कोने पर दुबका बैठा रहता है। अब वो रात को सीटियां बजाता, घर की खिड़कियों से अंदर नहीं झांकता है। अंदर झांकती है अब लाचारी, असहाय होने की लाचारी। लोग अपने अंदर मौत लिए घूम रहे हैं। वो मौत जो एक एक कर के सबको निगलती जा रही है। किसी के मुंह से होकर किसी के हाथ के सहारे भीतर घुसती जा रही है।
मंदिर की घंटी, अज़ानें शांत हैं, चर्च की लॉ बुझ चुकी, गुरुद्वारे की अरदासें शांत हैं। शांत वो हंगामा भी है जो धर्म और समुदाय में बंधे लोग करते थे। सियासत घुटनों पर आ चुकी है। ट्रेनें न जाने किस स्टेशन पर गुमसुम सी खड़ी हैं। बसें भी सवारी का रस्ता देख रही हैं। मज़दूर सर पर मुफलिसी की गठरी उठाये निकल पड़े हैं...अपने घरों की ओर,जो मीलों दूर से, बहुत दूर से उन्हें बुला रहे हैं। उनके चेहरे पर खौफ है...खौफ है मर जाने का...खौफ है इस बात का कि वो मर गए तो उनके परिवार का पेट कौन भरेगा। 
ये दौर खौफ का है...और ये खौफ उन लोगों में भी है, जिनकी रगों में अमीरी खून बनकर बहती थी, जो हर मर्ज़ पर दौलत से मरहम लगा सकते थे। हर चेहरा खौफ को नकाब से ढके, चरमराई हिम्मत से सड़कों पर निकलने की कोशिश कर रहा है, पर हार जा रहा है। 
चिड़ियों का कलरव, नीला आसमां और लहराते हरे पेड़ देखकर लग रहा है, जैसे प्रकृति झूम रही है, जैसे अरसे बाद अपने प्रियतम से मिल रही है। 
मगर इंसान, इंसान बेचैन है। मौत सर पर खड़ी नाच रही है और इंसानों को अपनी उंगलियों को पर नचा रही है। रातें उदास मालूम हो रही हैं और दिन चहकते हुए से लग रहे हैं। लग रहा है जैसे अस्तित्व मिटने वाला है, मानव का, मानवता का और उस अहंकार का जिसने मानव को अन्य जीवों से बेहतर प्राणी घोषित कर दिया था। 
हर कोई एक दूसरे को हौसला दिलाये जा रहा है, मगर वो खुद अंदर से खोखला हो चुका है और हौसला, पंख लगाकर बादलों के पार उड़ गया है। 
तभी एक रोज़ बारिश थम जाती है। सूरज निकलने लगता है। किरणे चेहरे को छूती हैं, फिर मन को। बेचैनी थम जाती है। दिल स्थिर हो जाता है। हौसला रखो। कानों में एक आवाज़ गूंजती है...हौसला रखो!

Sunday, 1 March 2020

दिल्ली हिंसा पर

पढ़े लिखे हिन्दू मुसलमानों द्वारा उपद्रव मचाने की तस्वीरें, वीडियो, और खबरें सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे हैं। पढ़े लिखे मुसलमान हिंदुओं द्वारा उपद्रव मचाने की तस्वीरें, वीडियो, और खबरें सोशल मीडिया पर फैलाये जा रहे हैं।

जाहिल हिन्दू और मुसलमान इन तस्वीरों, वीडियो और खबरों को देख कर सड़क पर कूद जा रहे हैं।
मीडिया दिन-रात दंगाइयों को ही दिखाए जा रहा है। वो कह रहा है कि जो हो रहा है हम तो वही दिखा रहे हैं।

 सरकारें सोई हैं, बस एक एडवाइज़री जारी कर देती हैं कि मीडिया कोई भी भड़काऊ चीज़ें न दिखाए। 
मीडिया मान जाता है मगर अपने चैनल की छोटी खिड़कियों के दरमियाँ ऐसी कमरों में बैठे प्रवक्ताओं को चुप नहीं कराता।

पढ़े लिखे सरकार को दोष दे रहे, सरकार पढ़े लिखों को दोष दे रही है, मीडिया दोनों को दोष देते दिखा रहा है और सड़क पर पागल भीड़ एक दूसरे की जान लेने पर तुले हैं। 
उन 22 लोगों की मौत के और उस एक पुलिसवाले की मौत के हम सब ज़िम्मेदार हैं।

ब्रो, it's about ब्रा!

सोशल मीडिया पर M TV द्वारा एक मुहिम चलाई जा रही है #MTVBaarBraDekho 
बार ब्रा देखो! रियली!
ब्रा होना आसान नहीं है जनाब! खूबसूरत होने के बावजूद अगर गलती से दिख जाए तो समाज की भावनाएं आहत हो सकती हैं। ब्रा के साथ तो दलितों से भी बदतर व्यवहार किया जाता है। अगर कोई पढ़ा लिखा दलित किसी बड़े ओहदे पर पहुँच जाए तो कम से कम उसकी इज़्ज़त तो होती है, मगर एक ब्रा की किस्मत में दुत्कारा जाना ही लिखा है फिर चाहे वो एक करोड़ रुपए कमाने वाली महिला के बदन से चिपकी हुई हो या एक हज़ार रुपये कमाने वाली स्त्री से!

ब्रा के अस्तित्व पर वैसी ही जंग छिड़ी है जैसे आस्तिक और नास्तिक के बीच भगवान के अस्तित्व को लेकर छिड़ी रहती है। एक पक्ष उसके होने को ही नकार देता है और दूसरा उसकी मौजूदगी साबित करते-करते थक जाता है।

लड़कियों के लिए ब्रा को पहनना और उसका ना दिखना एक दूसरे से इन्वर्स्ली प्रोपोर्शनल है। वैसे लड़कियों की ज़िंदगी भी बेहद कठिन है। सारी ज़िंदगी कुछ न कुछ बदन से चिपकाए ही रहना पड़ता है। पैदा होते ही डायपर चिपका दिया जाता है, थोड़े बड़े होने पर पैड और फिर कुछ वक्त बाद ब्रा, और फिर ब्रा और पैड का बोझ उठाये-उठाये ज़िंदगी आधी से ज़्यादा बीत जाती है। बुढ़ापे की दहलीज़ पर कदम रखते ही पैड से पीछा छूट जाता है और कुछ वक्त बाद ब्रा से भी रिश्ता खत्म होने लगता है मगर एक उम्र आते-आते डायपर फिर से शरीर की ज़रूरत बन जाता है जो अंत तक शरीर से जुड़ा रहता है।
शायद मैं किसी कट्टर फेमिनिस्ट की तरह साउंड कर रहा होऊंगा मगर फिलहाल मैं ब्रा की आपबीती शेयर करने में इंटरेस्टेड हूँ...महिलाओं की फिर किसी रोज़ बताऊंगा।

तो, मैं ये बता रहा था कि ब्रा होना कितना कठिन है!
कई बार सोचता हूँ कि अंडरगारमेंट्स की दुनिया की बनियान डोमिनटेड सोसाइटी में ब्रा होना श्राप है! उसे सूरज की किरणें भी ठीक से नसीब नहीं हो सकतीं। साड़ी, टीशर्ट या किसी अन्य कपड़े के नीचे रह कर ही उसने मौसमों का आनंद लिया है। ब्रा अपने जीवनकाल में या तो चांद से रूबरू होती है या फिल्टर के साथ सूरज देख पाती है। वो तो अपनी मालकिन का चेहरा भी कभी ठीक से नहीं देख पाती। हां कभी-कभी कुछ परवर्ट नज़रों से आंखें मिल जाती हैं मगर फिर उसे संकोच के साथ कपड़े के अंदर छुपा लिया जाता है। उसे अपने रंग पर भी गुरूर करने का मौका नहीं मिलता। कपड़ों की दुनिया में जहां काली टीशर्ट कूल बन जाती है वहां बिचारी काली ब्रा स्लट का ही खिताब हासिल कर पाती है।
इन सबके बावजूद वो सहारा प्रदान करती हैं मगर इसी बीच न जाने कहाँ से कल्चर और सोसाइटी का झंडा हाथ में थामे एक आंटी प्रकट होती हैं और आकाशवाणी की तरह अनाउंस करते हुए निकलती हैं - तुम्हारी ब्रा दिख रही है...बस फिर क्या, खुली हवा में सांस ले रही ब्रा को फिर कपड़े के अंदर ढकेल दिया जाता है।
वो यही सोचती है कि मेरा किरदार भी तो बनियान जैसा ही है मगर उस मासूम को ये नहीं पता होता कि जब समाज में औरतों को पुरुषों के बराबर दर्जा नहीं मिलता तो उसको बनियान के बराबर होने का मौका कैसे मिल जाएगा।
खैर, ब्रा को बराबरी का दर्जा दिलाना आसान है। करना ये है कि उसकी बराबरी के लिए उसे दूसरों पर थोपना नहीं है। उसे बस स्वाभाविक और आम बनाना है। वो तभी हो सकता है जब उसे कपड़ों के नीचे नहीं, अन्य कपड़ों के साथ उसके बगल में सुखाने को छोड़ दिया जाए। जब उसे गुरमेठ कर अलमारी में सबसे अंदर नहीं, बाकी के कपड़ों के साथ रखा जाए। जब उसे बदन को कसाव देने वाला महज़ एक कपड़ा माना जाए.... और जब उसे पहनने वाले उसे सिर्फ इसलिए ढकने की सलाह न दें क्योंकि उसे देख कर समाज को आपत्ति होती है! तभी कोई ब्रा ये कह पाएगी कि 'ब्रो, अगले जन्म मोहे ब्रा ही कीजो!'

Monday, 16 December 2019

जाने वाले दशक को अलविदा!

2019 खत्म होने को है। इस साल के खत्म होने के साथ ही एक दशक का अंत हो रहा है। पिछले दशक ने व्यक्तिगत तौर पर मेरे अंदर कई बदलाव किए साथ ही इस देश में भी परिवर्तन को जन्म दिया।

2010, दशक की शुरुआत स्कूल में ही हुई। ज़िंदगी के सबसे खूबसूरत पलों को जी रहा था। 10वीं की बोर्ड परीक्षा दे कर 11वीं क्लास में आया था। वो क्लास जिसने हलका-हलका ये अनुभव देना शुरू कर दिया था कि स्कूल से निकलने के बाद जीवन और कठिन होने वाला है, फिर भी फिक्र को स्कूल कैंटीन के समोसे की भाप में उड़ाता चला जा रहा था। लगभग सारे पुराने सब्जेक्ट से याराना खत्म हो चुका था और कॉमर्स, एकाउंट्स और इकोनॉमिक्स जैसे नए साथी मिल गए थे। उसके साथ ही एक बड़ी जिम्मेदारी भी। हिंदी साहित्य समिति का उपाध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। खुद के अंदर दायित्वों को पूरा करने की शक्ति महसूस होने लगी, कुछ खुद से, कुछ गुरुओं के मार्गदर्शन से। कई नए दोस्त बने,कई पुरानी दोस्ती की नींव डगमगाने लगी मगर ज़िंदगी बेहद खूबसूरत ढंग से बीत रही थी।

10वीं के बाद 11वीं में भी ट्यूशन करना पड़ा मगर दूसरी जगह। वहां नए शिक्षक मिले और नए दोस्त बने। सब मुसलमान थे...मगर उन दिनों हम हिंदू मुसलमान से ज़्यादा महज़ इंसान हुआ करते थे। शिक्षक भी मुसलमान थे मगर इस बात का कभी फर्क नहीं पड़ा, ना उन्होंने कभी एहसास दिलाया, ना मैंने कुछ अलग महसूस किया। वो सिर्फ गुरु थे और मैं उनका शिष्य। उनकी डांट सुन कर बुरा भी लगा तो अपने लिए सबके सामने पढ़े गए तारीफ के कसीदों से खुशी भी हुई। उनका दिया एक गुरु मंत्र आज भी याद है, 'कायदे में रहोगे तो फायदे में रहोगे!'

2011 में 12वीं क्लास के रंग भी देखे। विद्यालय का सबसे सीनियर विद्यार्थी होने का सुख भी अपने में अनोखा होता है। 12वीं में हिंदी एसोसिएशन का अध्यक्ष बनने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। उसी वक़्त धोनी की कप्तानी में भारत ने क्रिकेट का विश्वकप अपने नाम कर लिया। यूँ तो मैं स्पोर्ट्स प्रेमी नहीं हूं मगर वो पल आज भी मेरे ज़हन में कैद है।
वो पहली बार था जब न्यूज़ में बेहद रुचि होने लगी, सिर्फ खेल या मनोरंजन की खबरों के कारण नहीं, बल्कि इसलिए क्योंकि दिल्ली के रामलीला मैदान में एक मराठी भाषी टूटी फूटी हिंदी में पूरे देश को एक सूत्र में बांध रहा था। राजनीति के प्रति पैदा हुई रुचि के साथ बदलाव की एक किरण मुझे भी दिखने लगी। पता नहीं कौन से बदलाव की, पता नहीं क्या बदलने वाला था, मगर अन्ना को देख कर हौसला बढ़ रहा था।

2012 की शुरुआत में बोर्ड परीक्षा का डर सताने लगा...वैसे डर एक और चीज़ का सता रहा था, वो था दुनिया खत्म होने का। उसी साल दिसंबर के महीने में दुनिया खत्म होने की घोषणा हो चुकी थी। रह रह कर वो ख्याल दिमाग में तैर जाता था। 2012 की शुरुआत में ही बड़ी बहन की शादी के कारण प्री-बोर्ड की परीक्षा नहीं दे पाया था। आज भी उस बारे में सोचता हूँ तो निश्चित नहीं कर पाता कि परीक्षा न देने का निर्णय सही था या गलत!

खैर, मार्च में बोर्ड की परीक्षा खत्म हो गयी और कॉलेज के एंट्रेंस की ओर पूरा ध्यान केंद्रित हो गया। स्कूल से निकलना खुद पर पहाड़ टूटने जैसा था। स्कूल से निकलने का मतलब था कि 13 साल के बने बनाए शेड्यूल को एक झटके में तोड़ना, स्कूल के दोस्तों से रोज़ न मिलना, बेफिक्र ज़िंदगी को अलविदा कहना। स्कूल से निकलते ही ज़िंदगी बदल गयी थी।

बोर्ड के नतीजे आने के बाद एक ओर जिधर एंट्रेंस की हलचल थी वहीं दूसरी ओर विधानसभा चुनावों का शोर शहर में चारों ओर सुनाई दे रहा था। राजनीति में रुचि रखने वाले दोस्तों और बड़ों से पता चला कि समाजवादी पार्टी का सत्ता में आना लगभग तय है। राजनीति में बहुत ज़्यादा रुचि तो नहीं थी मगर फिर भी चुनावी तैयारियां और उनके बारे में सुनना अच्छा लगने लगा।

नतीजे आये...एंट्रेंस परीक्षा के भी और चुनाव के भी। नतीजे आने के बाद सिर्फ मैं ही नहीं दुखी था जिसका इलाहाबाद विश्वविद्यालय और बीएचयू के मेन ब्रांच में बीकॉम में चयन नहीं हुआ था, 'बहन जी' भी दुखी थीं जिन्हें अपनी सत्ता त्यागनी पड़ रही थी.

मुझे पता लग चुका था कि इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पत्रकारिता की भी पढ़ाई होती है...मैंने बिना वक़्त गंवाए उसका फॉर्म भरा और परीक्षा में बेहतर प्रदर्शन कर एंट्रेंस में चौथा स्थान हासिल किया। लग रहा था जैसे चारों ओर शंखनाद हो रहा हो। वैसे शंखनाद तो हो रहा था क्योंकि उत्तर प्रदेश में समाजवादियों के युवराज सत्ता पर आसीन हो चुके थे। सत्ता में आते ही अखिलेश यादव ने विद्यार्थियों को मुफ्त के लैपटॉप बांटने वाली स्कीम की घोषणा कर दी थी और इसी के साथ मुझे 2013 में मेरा पहला लैपटॉप मिला था।
इधर मैंने पहली बार कॉलेज की दहलीज़ पर कदम रख दिया था। 2012 से 2015 तक इलाहाबाद विश्वविद्यालय के सेंटर ऑफ मीडिया स्टडीज ने मुझे एक अलग पहचान दी, साथ ही ऐसे लोगों का साथ दिया जो ज़िंदगी का अहम हिस्सा बन गए।

वैसे इन तीन सालों को इतनी जल्दी फ़ास्ट फारवर्ड नहीं किया जा सकता।
2012 के निर्भया मामले ने देश को जिस तरह से एक जुट किया वो देखने लायक दृश्य था। उस वक़्त दिन भर टीवी से लग कर यही देखता था कि दोषियों को कब और कैसे सज़ा होगी। वैसे उसी साल मुझे पहली बाइक मिली थी। वैसे मुझे रफ्तार का शौक नहीं था मगर उस साधारण सी बाइक पर बैठ कर भी धूम के जॉन अब्राहम वाली फीलिंग आती थी।

साल 2013 में जहां मेरा पसंदीदा खिलाड़ी क्रिकेट की दुनिया को अलविदा कह रहा था वहीं दूसरी ओर राज्य की राजनीति का एक मंझा हुआ खिलाड़ी केंद्रीय राजनीति में ओपनिंग करने को तैयार था।
सचिन के रिटायरमेंट के बाद क्रिकेट से अचानक मेरी रुचि खत्म हो गयी मगर मोदी जैसे कुशल वक्ता को सुनकर राजनीति में भी फिल्मों जैसी रुचि पैदा होने लगी थी।
2G, CWG और 'जीजाजी' से देश इतना त्रस्त हो चुका था कि लोगों को यकीन होने लगा था कि अच्छे दिन ज़रूर आएंगे। वैसे अच्छे दिन आये भी, काफी हद तक देश के, उससे थोड़ा अधिक हद तक बीजेपी के! लंबे वक्त के बाद बीजेपी को लोकसभा चुनाव में प्रचंड जीत हासिल हुई और 2014 में नरेंद्र दामोदरदास मोदी भारत के प्रधानमंत्री बन गए।

एक ओर जहां पीएम मोदी के विदेश दौरे शुरू हो चुके थे, दूसरी ओर 2015 में भारत की सर्वश्रेष्ठ पीरियड फ़िल्म बाहुबली बड़े पर्दे पर दस्तक दे चुकी थी। 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा?', फ़िल्म के रिलीज़ होने के बाद देश में दूसरा सर्वाधिक पूछे जाने वाला सवाल बन गया था। पहले नंबर पर, '15 लाख रुपये खाते में कब आएंगे?', सवाल बरकरार था।

2015 में कॉलेज खत्म होने के बाद नौकरी के लिए दौड़ भाग शुरू हो गयी। इसी बीच बड़े भाई की शादी के बाद इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से निकल कर दिल्ली और नोएडा में ज़िंदगी गुज़रने लगी। दूरदर्शन और इंडिया न्यूज़ में ट्रेनिंग करने के बाद इंडिया टुडे में पहली नौकरी हाथ लगी।

इस बीच सोशल मीडिया पर ट्रोल्स की फौज खड़ी होना शुरू हो गयी थी। सत्ताधारी पार्टी देशभक्ति का पर्याय बन गयी थी और उसके खिलाफ खड़ी होने वाली हर शक्ति देशद्रोही बन गयी थी। देशभक्ति के सर्टिफिकेट बांटे जाने शुरू हो गए थे। एक पार्टी और एक व्यक्ति के लिए समर्थन, प्रेम में बदलता जा रहा था। ऐसा प्रेम जिसके साय में उस पार्टी और व्यक्ति का हर गुनाह नज़रअंदाज़ किया जाना शुरू हो चुका था। आलम ये था कि लोग अपने प्रधानमंत्री से सिर्फ इसलिए प्यार करने लगे थे क्योंकि वो 4 घंटे सोते थे और नवरात्रि पर व्रत भी रहते थे।
चीज़ें फिर भी काफी हद तक सामान्य थीं मगर 2016 में बंधी कलाइयां खुलने लगीं। मुकेश अंबानी प्रसन्न देवता की तरह प्रकट हुए और वरदान स्वरूप देशवासियों को मुफ्त का इंटरनेट बांटने लगे। इंडिया टुडे में रहते हुए मुझे भी फ्री में जियो का सिम प्राप्त हो गया था।

जियो का सिम आते ही देश में इतना बड़ा बदलाव आया कि सब हैरान रह गए। अब भारत का युग BC और AD में नहीं BJ ( Before Jio) और AJ (After Jio) से आंका जाने लगा। देश का युवा जो अखबार, पुस्तकों के नज़दीक था, देश से जुड़ी समस्याओं पर सोच विचार करता था, वो अब इस बात पर विचार करने लगा कि 1 GB डेटा पूरे दिन में कैसे खत्म किया जाए।

धीरे-धीरे वीडियो कंटेंट में इतनी वृद्धि हुई कि हर दूसरा व्यक्ति वीडियो कंटेंट का क्रिएटर बन गया। लोगों ने पढ़ना कम कर दिया, वीडियो देखना अधिक कर दिया मगर इस बात से अनजान रहे कि वीडियो की दुनिया में फेक न्यूज़ और फ़र्ज़ी वीडियो का बाज़ार भी बढ़ रहा है। इन्हीं फ़र्ज़ी वीडियो और खबरों को देख कर लोगों में द्वेष इतना बढ़ गया कि महज़ अफवाहों पर लोगों को पीट पीट कर मार डालने की प्रथा शुरू हो गयी।

2016 के अंत में नौकरी करते एक ही साल हुए थे कि सरकार ने 500-1000 के नोटों को बंद कर सबको सकते में डाल दिया। नोटबंदी के कुछ ही दिन बाद बड़े भाई की शादी हुई जिसमें घरवालों को काफी मुश्किल हुई थी। आम जनता में नोट बंदी के फैसले को लेकर काफी गुस्सा था।
इस वक़्त तक प्रेम भक्ति में तब्दील हो चुका था। लोग धर्म के आधार पर बंट चुके थे। सबसे ज़्यादा दुख इस बात का था कि 11वीं और 12वीं में जो दोस्त साथ पढ़े थे, जो एक ही टिफिन से खाना खाया करते थे, एक साथ खेलते थे...वो अब सिर्फ नाम के दोस्त रह गए थे। वो अब अपने धर्म से पहचाने जाने लगे थे। एक दोस्त भक्त बन गया तो दूसरा पाकिस्तानी। एक दोस्त आरएसएस की संतान बन गया तो दूसरा बाबर की औलाद!
अब राजनीतिक पार्टीयों या नेताओं को अपना बचाव नहीं करना पड़ रहा था, आम लोग खुद उनके पैरोकार बन कर घंटों सोशल मीडिया पर अपनों के दुश्मन बन गए थे।
2016 के अंत तक सेना की एंट्री मेनस्ट्रीम पॉलिटिक्स में हो गयी। सेना अलग इंस्टीट्यूशन न रह कर वोट मांगने का माध्यम हो गयी थी।

2017 में जहां निजी ज़िंदगी में काफी हलचल पैदा हो रही थी, वहीं मेरे गृह राज्य में एक नया नेता मुख्यमंत्री के तौर पर चुना जाने वाला था। वो उन नेताओं का उत्तर था जो दाढ़ी रखते थे और अपने धर्म की टोपी लगाकर धर्म की राजनीति करते थे। वो नेता भगवाधारी था, गाय से प्रेम करता था, अनुशासित जीवन बिताता था, घंटों पूजा करता था और अपनी पार्टी का स्टार प्रचारक था। अखिलेश की साईकल को किनारे कर के योगी ने उत्तर प्रदेश में लंबे वक्त बाद कमल खिलाया था।
2017 में लोगों को ये भी पता चल गया कि 'कटप्पा ने बाहुबली को क्यों मारा!'
इसी साल अपनी दूसरी नौकरी में रहते हुए पहली बार हवाईजहाज़ में बैठने का मौका मिला साथ ही खुद के अंदर घुमक्कड़ी स्वभाव पैदा हो गया। 2017 और 2018 में कई नए शहरों को देखने का मौका मिला। 2018 के दौरान कई बड़े एंटरप्रेन्योर का इंटरव्यू करने का मौका मिला। इस दौर तक एक पार्टी और व्यक्ति के लिए भक्ति अंधभक्ति में बदल चुकी थी। अब निर्णय चाहे कोई भी हो, उसका समर्थन ही हो रहा था और जो समर्थन न करे वो लाखों लोगों द्वारा सोशल मीडिया पर इस कदर ट्रोल होने लगा था कि वो फिर कभी कुछ और कहने से डरता था। अब तक छात्र दुश्मन बन चुके थे और दुश्मन सिर्फ पाकिस्तन रह गया था, जिसके सहारे देशभक्ति की अलख हमारे अंदर जली हुई थी।

2018 के अंत में फिर इंडिया टुडे में काम करने का अवसर मिला। 2019 आते-आते कई रिश्ते मज़बूत हो गए, और उसी मज़बूती के साथ बीजेपी ने फिर सत्ता पर अधिकार जमा लिया था। खबरों पर विश्वास नहीं रह गया था, विपक्ष विश्वास के लायक नहीं था और सरकार विश्वास पैदा नहीं होने दे रही थी। लोग धर्म को लेकर इतने कट्टर हो गए कि वो इंसानियत भूल गए। पूरी आबादी अपने में लड़ते, भिड़ते, जलते, जलाते, बनते, बिगड़ते साल के अंत तक पहुँच आयी थी।

आज जब हम 2010-2019 के दशक को अलविदा कह रहे हैं तो मैं अभी भी ये आशा कर रहा हूँ कि आने वाला दशक मेरे लिए ही नहीं, इस देश के लिए भी नई उम्मीदें ले कर आएगा। अगर आप यहां तक पहुँच आये हैं तो आपको 2020 की ढेर सारी बधाई!

#अशुतोष
दिसंबर, 2019