लेखक : आशुतोष अस्थाना
इनही ग्राहकों में से मैं
और मेरे परिवार वाले भी एक थे. हमारा घर उसी इलाके में था और डॉक्टर साहब के यहाँ
जाना मेरे लिए घर सी बात होगई थी क्यूंकि हमलोग उन्हें ‘फैमिली डॉक्टर’ मानते थे.
घर की शादियों में तथा किसी विशेष अवसर पर उनको भी न्योता अवश्य दिया जाता था और
उनका आना स्वाभाविक होता था. इनही कारणों से डॉक्टर साहब हम लोगों से न्यूनतम
शुल्क लेते थे. क्यूंकि मैं घर में सबसे छोटा था इसी वजह से मुझे ही उस खतरे के
मुह में ढकेला जाता था! जब भी मैं उनके यहाँ जाता तो वो पूरी एकाग्रता से मुझे
सुनते और परचा बना कर कम्पाउण्डर बाबू को देदेते और उसके बाद जबतक दावा बन कर तयार
नहीं होजाती थी तबतक वो मुझे कही नहीं जाने देते थे. कभी-कभी तो उनकी चर्चा इतनी
लम्बी होती थी की दावा बन के तयार रहती थी लेकिन बातों का अंत नहीं होता था. मुझे
भी उनकी बातें ध्यान से सुनना पड़ता था क्युंकि वो इतनी रफ़्तार से बोलते थे की आधी
बात मेरे सर के ऊपर से चली जाती थी. मुझे ऐसा लगता है की मेरे वहां से निकलने के
बाद जितनी मुझे ख़ुशी होती थी उससे ज़्यदा उन्हें दुःख होता होगा.
एक बार मुझे तेज़ जुकाम हुआ
जिसकी दावा लेने मैं उनके पास गया. उनकी दुकान(थोडा और इज्ज़त दूँ तो ‘क्लिनिक’)
बिलकुल खाली थी, एक भी मरीज़ नहीं था. कम्पाउण्डर बाबु बाहर ही बैठे थे तो मैंने
उनसे पूछा, “डॉक्टर अंकल हैं अन्दर?”, कम्पाउण्डर जी घोर चिंता में डूबे थे शायद
सुन नहीं पाए तो मैंने इसबार थोड़ा ऊँची आवाज़ में उनके कान के निकट जाके पूछा, “डॉक्टर
साहब हैं की नहीं?”, इतने में अन्दर से आवाज़ आई, “हाँ जी कौन है? अन्दर चले आइये”.
मेरी आवाज़ से कम्पाउण्डर जी का भी ध्यान टुटा और थोड़े गुस्से में मुझसे बोले, “हैं
तो अन्दर! जाओ ना, कहा जायेंगे और कोई ठिकाना है क्या उनका!”, मैं समझ गया अगला
उनसे कितना प्यार करता है! मैं भारी कदमो से अन्दर जारहा था. उस वक़्त मेरी चाल और
मेरे हाव-भाव देख कर कोई नासमझ भी कह सकता था कि मुझे अन्दर जाने का मन नहीं है.
अभी ठीक से मैंने उस कमरे में प्रवेश भी नहीं किया था कि डॉक्टर साहब मुझे लाचारी
और आशा से भरी नजरो से देखने लगे. वो मुझे इस तरह देख रहे थे जैसे कोई भूखा गरीब,
रोटी के टुकड़े को देखता है. मुझे देखते ही उनके चेहरे पे ख़ुशी की एक लहर दौड़ गई मानो
उनकी करोड़ो की लाटरी लग गई हो. “नमस्ते अंकल...”, मैंने बड़ी ही सरलता से घुसते हुए
कहा. “ अरे आओ-आओ बेटा,
कैसे हो? घर में सब कैसे हैं? बड़े दिन बाद आए तुम, सब ठीक तोह है ना?”, डॉक्टर
साहब ने बिना रुके कहा. उनके इतने सवाल एक बार में सुन कर मैं उन्हें
चौंक के देखने लगा, अरे! पांच दिन पहले ही तो मैं आया था अपने बड़े भाई की दावा
उनसे लेने, अब या तो वो भूल गए थे या तो उन्हें मेरी बहुत याद आरही होगी!...खैर,
मैंने उनसे ऐसा कुछ नहीं कहा और अपने आप को शांत करके मैंने बोला, “सब अच्छे हैं
अंकल”. “चलो अच्छा है, सब अच्छे रहे औरक्या चाहिए इन्सान को, है ना, मैं ठीक बोल
रहा हूँ ना?” उन्होंने कुछ गंभीर स्वर में बोला.
“जीअंकल”
फिर कुछ देर की शांति, मैंने सोचा यही मौका है मैं जल्दी से मेरे आने की
वजह बता देता हूँ लेकिन शयद उन्होनें भांप लिया था! मेरे कुछ बोलने से पहले ही वो
बोल पड़े, “ये सामने वाली सड़क की हालत तो बुरी होगई है, कल ही शाम को जाम लग गया
था, अब तुम्ही बताओ बेटा नगर निगम वालों को कुछ करना चाहिए की नहीं, पता नहीं क्या
होगा इस शहर का!” वो साँस लेने के लिए कुछ पल रुके, तभी उसी पल को मैंने उनकी कही
हुई बातों को समझने में लगाया. ठीक-ठीक तो नहीं कह सकते लेकिन उनके बोलने की
रफ़्तार शताब्दी को चुनौती देसकती है. अभी मेरी सोचने की प्रक्रिया समाप्त नहीं हुई
थी कि उनकी बोलने की प्रक्रिया फिर शुरू होगई.
“बेटा कभी किसी से डरना नहीं चाहिए क्युंकि
हम तो उस भगवन के बच्चे है और उसके अलावा हमे और कोई नहीं हानि पहुचासकता. अब तुम
मुझे ही देखो मैं किसी से नहीं डरता, ना किसी इन्सान से और ना ही मौत से, अब सवाल
है, क्यों? इसका भी सीधा सा जवाब है वो ये कि ऐसी चीज़ से क्या डरना जिसका हमे पता
ही नहीं की वो कब आयेगी, बस अपने कर्म किये जाओ और सबसे ज़रूरी फल की चिंता तो मत
ही करो तभी अच्छा. है ना बेटा? मैं गलत तो नहीं बोल रहा हूँ?”
“जी अंकल, आप सही कह रहे हैं.”, मैंने थोड़ा धीरे से बोला. उनकी बातें मुझ
जैसे आम मानव के लिए समझना मुश्किल था क्युंकि मुझे उनकी बातों के बीच कोई संबंध
नहीं समझ आरहा था, फिर भी उनकी बातों में मैं सर हिला के बराबर समर्थन देरहा था. “वोही
तो मैं भी कह रहा हूँ, अब तुम यही देखो कितने दंगे होरहे हैं, कभी किसी शहर में,
तो कभी विश्वविद्यालय के विद्यार्थी, अब क्या बोला जाये, पता नहीं क्या होगा इस
राज्य का!”, डॉक्टर साहब अपना ज्ञान बाँट ही रहे थे की उनके मोबाइल की घंटी बजी.
उनका मोबाइल चाइना मॉडल था इसीलिए उसकी आवाज़ इतनी तेज़ थी मानो लाउडस्पीकर जेब में
लेकर चल रहे हों. फिर भी उस मोबाइल की घंटी ने मेरी कुछ मदद की और डॉक्टर साहब को
अपनी बात बीच में ही रोकनी पड़ी. “हेल्लो!”, उन्होंने
थोड़ा गुस्से में कहा, और कुछ देर बाद खुद ही कट दिया .
“ये
साले कंपनी वाले जीना हराम करदेते हैं! नाजाने क्या होगा इस देश का! अब तुम्ही
बताओ बेटा ऐसा करना चाहिए क्या? मैं सही हूँ की नहीं?”, उन्होंने एक बार फिर अपना
चहेता प्रश्न मुझपर फेंका, “हाँ अंकल, आप सही कह रहे हैं!” इस बार मैंने भी उनका
साथ देने क लिए थोड़ा गुस्से में बोला.
तभी मैंने अपनी घड़ी में
समय देखा, मुझे उनकी दुकान पे आए हुए एक घंटा होचुका था और जिस अपनेपन से वो बातें
कर रहे थे, मुझे पूरा यकीन था कि एक घंटा और होजायेगा. बस इसीलिए मैंने इस बार की, कुछ ही क्षण की शांति को बेकार नहीं जाने दिया और
तुरंत बोला, “अंकल मुझे जुकाम की दावा चाहिए, पिछले तीन दिनों से है बहुत तेज़
ज़ुकाम”. शायद तब उन्हें ध्यान आया कि मैं वहा दावा लेने आया हूँ, तो उन्होंने
अख़बार के नीचे से अपना पेन निकाला और मेरा परचा बनाने लगे. परचा बनाने के तुरंत
बाद उन्होंने कम्पाउण्डर जी को अन्दर बुलाया जो शायद अभी भी ख्यालों में खोये हुए
थे. दो बार बुलाने के बाद वो अन्दर आए और बिना कुछ बोले मेरा परचा लेके दावा बनाने
अपनी मेज़ पे चले गए और फिर शुरू हुआ हमारे डॉक्टर साहब के बातों का सिलसिला जो
दावा बनने तक चला और मैं, मैं बिचारा अतत्याचार सहता रहा और मन ही मन कम्पाउण्डर
जी को कोसता रहा की दावा बनाने में इतनी देर क्यों कर रहे है! अंत में मेरी दावा
बन गई और मैं वहां से भागते हुए निकला.
(शेष कहानी अगले भाग में....)
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