लेखक : आशुतोष अस्थाना
पता नहीं क्यों उस वक़्त
मेरा बहुत मन हुआ की मैं उनसे जाके मिलूं लेकिन फिर मैंने सोचा की वो उनका निजी
मामला है मैं क्यों जाके पूछूं, उन्हें जब क्लिनिक खोलनी होगी तब खोलेंगें और इनही
विचारों के साथ मैं घर लौट गया. लगता है उस दिन मेरा उनसे मिलना निश्चित था
क्युंकि जैसे ही मैं घर गया मेरी माता जी ने मुझे दावा लाने के लिए भेज दिया. आज
मन में उत्सुक्ता थी डॉक्टर साहब से मिलने की. मैंने घडी में समय देखा, 8 बज रहे
थे तो मैं तुरंत निकल गया घर से ये सोच के की कही वो दुकान बंद ना कर दें. वहा कोई
मरीज़ नहीं था जब मैं गया तो मैंने बहार से ही बोल, “अंकल”,
कोई उत्तर नहीं......
“अंकल!” फिर कोई उत्तर नहीं........... मैंने सोचा शायद उनकी आँख लग गई होगी तो मैं अन्दर चला गया. मैंने देखा डॉक्टर साहब कुछ सोच रहे थे और कुर्सी पे टेक लगाये छत की ओर एक टक देख रहे थे. मैंने फिर बोला, “अंकल!”, तो वो चौंक गए और मेरी ओर देख कर बोले, “अरे तुम!”, “जी अंकल, वो मैं दावा लेने आया था” मैंने बड़े ही शांत स्वर में बोला. मेरा ध्यान उनकी आँखों पर गया जो थोड़ी भीगी थीं लेकिन मैंने अनदेखा कर दिया.
“अंकल!” फिर कोई उत्तर नहीं........... मैंने सोचा शायद उनकी आँख लग गई होगी तो मैं अन्दर चला गया. मैंने देखा डॉक्टर साहब कुछ सोच रहे थे और कुर्सी पे टेक लगाये छत की ओर एक टक देख रहे थे. मैंने फिर बोला, “अंकल!”, तो वो चौंक गए और मेरी ओर देख कर बोले, “अरे तुम!”, “जी अंकल, वो मैं दावा लेने आया था” मैंने बड़े ही शांत स्वर में बोला. मेरा ध्यान उनकी आँखों पर गया जो थोड़ी भीगी थीं लेकिन मैंने अनदेखा कर दिया.
उन्होंने मुझसे बीमारी
पूछी और मैंने सब बता दिया. पर्चे पे लिखने के बाद वो दावा बनाने चले गये. कुछ
बहुत ही अजीब होरहा था! उन्होंने ना मेरा हाल पूछा और नाही अपनी कोई बात
कही........कहा गया वो कभी न छुप होने वाला डॉक्टर! मैं भी उनके पीछे बाहर वाले
कमरे में गया और मरीजों वाली कुर्सी पे बैठ गया. वो मरे सामने बैठ के दावा बना रहे
थे लेकिन न मेरी ज़बान चली और नाही उन्होंने कुछ बोला. वो बहुत अजीब सी शांति थी जो
चुभ रही थी. गाड़ियों का बजता हॉर्न भी उस शांति को नहीं भेद पारहा था. आखिर मैंने
हिम्मत करके उनसे पूछा- “आप कैसे हैं अंकल?”, तबतक मेरी दावा बन चुकी थी. उसको
पन्नी में रखते हुए उन्होंने बड़े ही नीरस से स्वर में बोला, “मैं ठीक हूँ बेटा”.
उस ‘ठीक हूँ’ को सुन के कोई बच्चा भी बता सकता था की वो ठीक नहीं हैं! उन्होंने
मुझे दावा दी और बोले-“घर में सब कैसे हैं?”, मैंने सबकी बात बताई और कथा के
निमंत्रण के बारे में बताये लेकिन वो कुछ नहीं बोले. फिर मैंने उनसे थोड़ी और
हिम्मत जुटा के पूछा, “आप क्लिनिक नहीं खोल रहे थे काफी दिनों से, तबियत तो ठीक है
ना आपकी?”, अचानक से उनकी आँखों में आंसु आगये और उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी का
निधन होगया है, बस इसीलिए मैंने क्लिनिक नहीं खोली थी.” मैं सुन कर दुखी होगया
लेकिन अपने आप को संभाला. मुझे नहीं समझ आरहा था की अब मैं क्या बोलूं और कुछ पल
के लिए हम दोनों शांत होगये थे. मुझे उनके लिए बहुत अफ़सोस होरहा था, वो बिचारे
बिलकुल अकेले थे. पहले माँ फिर पत्नी, अब वो किसके सहारे इस बुढ़ापे में रहेंगे.
मैं अपने चेहरे पे आए दया के भावों को उन्हें नहीं दिखाना चाहता था इसलिए मैं अपनी
दावा की ओर देखने लगा. तभी उन्होनें उन भरी हुई आँखों से मेरी ओर देखा, मेरे अन्दर
अब और हिम्मत नहीं थी की मैं उनको देखूं, शायद मेरी स्थिति वो समझ गए थे तो
उन्होंने मुझसे नज़र उठा के घडी की ओर देखा. साढ़े 9 बज गये थे. घडी देख के वो अचानक
बोल उठे, “अरे काफी दिर होगई है, राधा इंतज़ार कर....”, इतना बोल कर वो छुप होगये.
मैंने तभी उनकी ओर देखा, आंसू की एक बड़ी सी बूंद उनके गाल से होते हुए नीचे गिरी.
फिर कुछ देर शांत रहने के बाद उन्होंने बोला, “अच्छा बेटा अब मुझे घर जाना है” और
ये बोल के उन्होंने एक बहुत गहरी सांस ली.
हम दोनों क्लिनिक से बहार
निकले, उन्होंने ताला लगाया और मुझसे बोले, “खूब मन लगा के पढो बेटा”. इतना कह के
वो दूसरी ओर देखने लगे शायद इस बार वो अपने आंसू मुझे नहीं दिखाना चाहते थे. मैं
बिना हिले, बिना पलके झपकाए वोही खड़ा था.
फिर उन्होंने अपनी पुराणी
स्कूटर स्टार्ट की और धुंए का बड़ा सा झोंका मेरे चेहरे पे आया लेकिन पता नहीं मुझे
क्या होगया था उस वक़्त, तबभी मेरी आंखें नहीं झपकी! चलने से पहलें उन्होंने एक बार
अपनी क्लिनिक की ओर देखा और चले गए. उस बड़े शहर की बड़ी सड़क पर बड़ी-बड़ी गाड़ियों की
भीड़ में वो अकेला डॉक्टर कुछ ही देर में खो गया........
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