लेखक : आशुतोष अस्थाना
(शेष कहानी अगले भाग में.....)
उस दिन के बाद से मैंने
प्रण लिया की मैं उनसे दावा लेने नहीं जाऊंगा. अक्सर मैं जब अपने घर की गली से
निकलता तो डॉक्टर साहब मुझे अपनी क्लिनिक के बहार खड़े हुए दिख जाते और मैं किसी
तरह वहा से छुप कर निकलता. कभी वो मुझे मरीजों की कुर्सी पे बैठकर अख़बार पढ़ते दिख
जाते तब मैं दूर से ही समझ जाता की कारोबार कुछ ठंडा चल रहा है.
कारोबार तो ठंडा था ही
लेकिन वो दिन भी बहुत ठंडा था जब मुझे मेरा प्रण तोड़ना पड़ा और परिवार में से ही
किसी की दावा लेने उनके यहाँ जाना पड़ा. अन्दर घुसते ही मैंने देखा की २-३ मरीज़ बैठे हैं
तो मैं बाहर ही आके खड़ा होगया और गुज़रती हुई गाडियों को देखने लगा. तभी डॉक्टर
साहब की आवाज़ पीछे से आई तो मैंने मुड़ के देखा और देख कर थोड़ा सा चौंक गया, डॉक्टर
साहब खुद दावा बना रहे थे और तभी मैंने ध्यान दिया की कम्पाउण्डर बाबु नहीं दिख
रहे हैं. डॉक्टर साहब दावा बनाते-बनाते एक मरीज़ से बातें कर रहे थे तभी उनका ध्यान
मेरी ओर गया. “अरे बेटा तुम कब आए? कहो कैसे आना हुआ आज?” डॉक्टर साहब ने नीचे
दावा की ओर देखते हुए कहा. मैं उनकी ओर एक टक देख रहा था और यही सोच रहा था की आज
ये क्यों दावा बनारहे हैं, तभी उन्होंने मुझे फिर से देखा. मुझे देख कर वो थोड़ा
मुस्कुराए और बोले, “कहा खोगये? अच्छा ये....वो क्या है ना की कम्पाउण्डर जी ने
कोई और कम शुरू करदिया है तो उन्हें यहाँ से जाना पड़ा, अब कोई नहीं है इसीलिए मैं
ही करले रहा हूँ”. मेरे मुह से कोई शब्द नहीं निकले और मैं बस मुस्कुरा के रहगया.
दावा बनाते-बनाते ही उन्होंने ने तकलीफ पूछी और दूसरों की दावा बनाने के बाद मेरी
दावा बनाने लगे. मुझे बाज़ार से कुछ सामान भी खरीदना था तो तबतक मैं वो लेने चला
गया. थोड़ी देर बाद जब मैं वापिस आया तो मेरी दावा तैयार थी और एक मरीज़ और आचुका था
तो मैंने अपनी दावा ली उन्हें नमस्ते किया और लौट आया. आज बहुत ख़ुशी होरही थी कि
मुझे उनके किस्से नहीं सुनने पड़े लेकिन थोड़ा ख़राब लग रहा था जिसकी वजह मैं नहीं
समझ पाया.
अब डॉक्टर साहब के दिन और
लम्बे होने लगे थे. पहले कम्पाउण्डर जी रहते थे तो थोड़ा मन लगा रहता था भले ही वो
उनसे बात नहीं करते थे लेकिन अब, अब तो घड़ी की सुई ने जैसे चलना ही बंद करदिया था.
पहले डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक सुबह 11 बजे से रात के 9 बजे तक खोला करते थे लेकिन
कम्पाउण्डर जी के जाने के बाद वो कभी भी न तो समय से क्लिनिक खोलते थे और ना ही बंद
करते थे. डॉक्टर साहब अब घर से दो पत्रिकाएँ, अख़बार और अपना चहेता, छोटा सा रेडियो
लाया करते थे. लेकिन इन सभी चीजों से दोपहर तक ही उब जाते, फिर शुरू होता एक लम्बा
अकेला दिन जिसमें वो अकेला डॉक्टर कभी हँसता, कभी सोचता, कभी सोता तो कभी अपना
बचपन याद करके रो देता और अगर ये सब नहीं तो अपने आप को किसी उधेड़ बुन में डालने
की कोशिश करता ताकि समय बीते लेकिन ये समय भी उनका साथ नहीं देरहा था. कभी-कभी ऊपर
वाले की कृपा होजाती तो मरीज़ भी आजाते थे.
मुझे काफी दिन होगये थे उनके यहाँ गए, जब कभी
मैं उस ओर से निकलता था तो उनकी क्लिनिक की तरफ नज़रे चली ही जाती थी लेकिन बिना
कोई विशेष ध्यान दिए चला जाता था. घर में कोई कथा होनी थी तो मुझे डॉक्टर पाण्डेय
को निमंत्रण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई. शाम को जब मैं खाली हुआ तो उनको
निमंत्रण देने उनके क्लिनिक गया लेकिन क्लिनिक बंद थी. मुझे कुछ अजीब सा मेहसूस
हुआ कि शाम के 6 बजे ही वो घर कैसे चले गए! लेकिन मैंने एक राहत की साँस ली, और
सोचा की शायद मैं बहुत किस्मत वाला हूँ जो उनकी असीमित बातें नहीं सुन पाया. अगले
दिन कथा थी तो किसी कम से मैं बाज़ार गया था जब क्लिनिक पड़ी तो सोचा तभी कथा के लिए
कह दूँ लेकिन उस दिन भी क्लिनिक बंद थी तब मैंने बगल वाले दुकानदार से पूछा डॉक्टर
साहब के बारे में लेकिन उसे कुछ नहीं पता था तो मैं घर चला गया.
देखते-देखते कई दिन गुज़र
गए लेकिन डॉक्टर साहब ने क्लिनिक नहीं खोली और हर आम मरीज़ की तरह मैंने भी जानने
की कोशिश नहीं की लेकिन एक दिन मैं उस तरफ से गुज़र रहा था तो मैंने क्लिनिक खुली
देखी....(शेष कहानी अगले भाग में.....)
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