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Friday, 23 May 2014

लारा (भाग-2)

                लेखक: आशुतोष अस्थाना   


                (मेरे पहले दोस्त की स्मृति में....)



“हैप्पी बर्थडे मोना बेटा!”, मोना की माँ ने उसके सर पे हाथ फेर कर बोला. मोना जाकर माँ से लिपट गई और उन्हें प्यार करने लगी. मोना एक बहुत प्यारी सी बच्ची थी जो उसी इलाके में रहा करती थी. उसे उसके मोहल्ले के जानवरों से काफी लगाव था, विशेष कर कुत्तों से! उसे जब मौका मिलता तो बहार जाकर भीकू को गोद में लेकर खिलाने लगती या दूसरे कुत्तों को खाना डालने लगती. भीकू भी मोना के साथ खेलता था और प्यार करता था.

मोना आज दस साल की होगई थी और उसके पिता ने उसे एक तोहफा देने का वादा किया था. वो किसी काम से दिल्ली गए थे और वहीं से उसके लिए कोई तोहफा लाने वाले थे. मोना रात से बहुत उत्सुक थी ये जानने के लिए की उसके पिता उसके लिए क्या तोहफा लेकर आयेंगे. पिता जी को आज सुबह ही आना था लेकिन वो अभी तक नहीं आये थे. उनकी देरी मोना को खल रही थी. “पापा कब आयेंगे ?” मोना ने व्याकुल होकर अपनी माँ से पूछा. “परेशान मत हो बेटी, वो आरहे होंगे.” मोना से रहा नहीं गया तो वो बाहर भीकू के साथ खेलने चली गई. अभी वो भीकू के साथ खेल ही रही थी की तभी उसके पिता ने उसे बुलाया. मोना से रहा नहीं गया और भीकू को रख कर वो अन्दर भागी. “पापा! पापा! आप क्या गिफ्ट लाए मेरे लिए?” पापा ने मोना को गोद में उठा लिया और बोले, “मुझे माफ़ करना बेटा मैं कोई तोहफा नहीं लेकर आपाय, मुझे समय नहीं मिला.” पापा की बात सुन कर मोना दुखी होगई और उनकी गोद से उतर कर दूसरे कमरे में चली गई. उसकी आँखों में आंसू आगये. तभी उसके पिता पीछे से आये और धीरे से उसके कान में बोले, “तुम्हारा गिफ्ट, मेरे कमरे में रखा है”. 

मोना वो सुनते ही झूम उठी और भाग कर अपना तोहफा देखने गई. वहा एक जूते का बड़ा सा डिब्बा रखा था जिसमें चारों तरफ से ढेर सारे छेद थे. मोना को समझ में नहीं आया की आखिर उस डिब्बे में क्या है. उसने झट से डिब्बा खोला और देख कर चौंक गई! उसमें एक छोटा सा सफ़ेद और भूरे रंग का कुत्ते का बच्चा था जो सो रहा था. मोना उसे देखते ही ख़ुशी से पागल होगई और उस डिब्बे को उठा कर अपनी माँ को दिखाने ले गई. “मम्मी ये देखो पापा मेरे लिए ये कुत्ते का बच्चा लेकर आए हैं! देखो ये मेरा गिफ्ट है! ये मेरा है!” तभी उसने अपने पिता से पूछा, “पापा इसका नाम क्या है, ये कितने साल का है?”, “ये अभी चार महीने का है बेटा, और तुम इसे कोई भी नाम देदो, तुम्हे जो अच्छा लगे.” मोना ने वो डब्बा नीचे रख दिया और उस छोटे से बच्चे का नाम सोचने लगी. उसके माता-पिता ने उसे काफी नाम सुझाये लेकिन उसे कोई नाम नहीं पसंद आया. काफी देर बाद जब उसके माता-पिता बैठ कर बाते कर रहे थे तो वो उनके पास गई और बोली, “मैंने इसका नाम सोच लिया है!” “अच्छा, हमे भी तो बताओ.” उसकी माँ ने पूछा. तब उसने बड़े ही गर्व और ख़ुशी के साथ बोला, “इसका नाम है, लारा!”

मोना को लारा के साथ खेलने में बड़ा आनंद आने लगा था. वो उसकी खूब सेवा करती, उसे खाना खिलाती, उसे बिलकुल बच्चे की तरह सहेज के रखती थी. लारा भी मोना से बहुत प्रेम करता था और उसकी सारी बातें मानता था. समय बीतता गया और लारा एक वयस्क कुत्ते में तब्दील होने लगा था. वो लैब्राडोर प्रजाति का कुत्ता था. उसके शरीर पे काफी बाल थे और पंजे भी बहुत बड़े थे, पूंछ गोल घूमी हुई थी जिसे वो अपने मुह से पकडे ने कोशिश करता था. उसके अंदर शुरू से ही ख़ास बात थी, जब वो भौंकता था तो मौहल्ले के सारे कुत्ते खौफ में आजते, उन्हें लगता था शायद बाहरी कुत्तों ने हमला कर दिया है!



(शेष कहानी अगले भाग में...)




          

Tuesday, 20 May 2014

लारा ( भाग- 1)


                           लेखक: आशुतोष अस्थाना
             
                       (मेरे पहले दोस्त की स्मृति में....)






“इस समस्या का कुछ तो करना होगा चाचा!” कालू ने डरते हुए कहा. “....लेकिन हम कर भी क्या सकते हैं कालू बेटा, हमारे पास ना तो इतनी हिम्मत है और ना ही इतने साथी है की उनका सामना कर सके!”, चाचा ने धीरे से बोला. “चाचा क्यों न हम बाहर के किसी को.....”, सिट्टू ने बोला. “नहीं! नहीं! बाहर के किसी को हमारी मदद के लिए बुलाना सही नहीं होगा क्युंकि वो इतने खतरनाक हैं की उनके खिलाफ कोई नहीं खड़ा होगा और हो भी गया तो नुकसान हमारा ही होगा. अब इस मुसीबत से हमे खुद निकलना होगा.” तभी भीकू भी वहा आगया और सबकी बातें सुनने लगा. उसको देख चाचा ने बोला “अरे बेटा तुम यहाँ क्या कर रहे हो, अभी तक सोये क्यों नहीं?” “मुझे दल लगला है दादा जी!” भीकू ने उदास होकर बोला. “अरे तू तो मेरा बहादुर पोता है, तुझे क्यों डर लगरहा है! अच्छा चलो मैं तुम्हे तुम्हारी माँ के पास छोड़ देता हूँ.” चाचा भीकू को लेकर जाने लगे की पीछे से घीसू ने बोला, “अरे चाचा लेकिन ये बात तो रह गई!” चाचा ने उन सबकी ओर देखा और मुस्कुरा कर बोले, “ये बात खत्म नहीं होने वाली है, कल सुबह फिर से कर लेंगे, अभी तुम सब जाके सो जाओ.”

चाचा भीकू को लेकर उसकी माँ के पास जाने लगे. दोनों नाले के बगल से होते हुए अपने घर की ओर बढ़ रहे थे. चाचा ने अपनी पूरी जिंदगी इसी इलाके में बिता दी थी. जिंदगी का इतना तजुर्बा था उन्हें की सब उनके पास ही समस्या लेकर आते थे. भूरे रंग का पतला शरीर था जिसमें सिर्फ हड्डियां ही रह गई थी. बुढ़ापे ने काफी कमज़ोर कर दिया था और परिस्थितियों ने तोड़ दिया फिर भी जीवन का संघर्ष जारी था. यूँ तो पूरा जीवन सड़क पर ही बीता था लेकिन सोच हमेशा किसी बड़े घर के पालतू जैसी थी. शरीर के सारे बाल झड़ चुके थे और किसी लड़ाई में आधी पूंछ भी कट चुकी थी. शरीर पे कई पुरानी लड़ाइयों के निशान अभी भी कायम थे. चेहरे पे काले रंग के हलके धब्बे थे लेकिन आवाज़ से अभी भी किसी को डरा सकते थे. चोट के कारण एक पैर से लंगड़े होचुके थे और यही वजह थी की इंसानों की उस घनी बस्ती में उस बूढ़े कुकुर को ‘लंगड़ा कुत्ता’ की उपाधि मिली थी.

“भोली!..... भोली!, देखो तुम्हारा बेटा डर रहा है संभालो इसे!” चाचा जी ने हाँफते-हाँफते बोला. भोली हलके सुनहरे रंग की कुतिया थी जिसे अपने पती के मर जाने के बाद जिंदगी से कोई लगाव नहीं था, उसका बेटा ही अब उसका सहारा था लेकिन जिंदगी के दुःख से वो उसका भी ठीक तरह से ध्यान नहीं रख पाती थी. कोई अगर रोटी फेक देता तो खालेती थी नहीं तो दिन भर भूकी रहती थी. यही कारण था की भीकू अपने दादा के साथ ही रहता था. भीकू के दादा उसे हमेशा कहानी सुनाया करते थे अपने समय की और उसे निडर बनने की सीख देते थे.

भीकू को सुलाने के बाद उसकी माँ भी सो गई. एक बड़े से पुराने ठेले के नीचे उनका घर था. चाचा जी को नींद नहीं आरही थी इसलिए वो सड़क पर जाकर बैठ गए. उनको अभी भी वही परेशानी सता रही थी. पिछले कुछ महीनो से किसी दूसरे इलाके के कुत्ते उनके इलाके में आने-जाने लगे थे जो अब उनके इलाके के सारे कुत्तों को परेशान कर रहे थे. सुनने में आया था की वो सब उस इलाके से इसलिए भाग-भाग के यहाँ आजाते थे क्युंकि वहा कुत्ते पकड़ने की सरकारी गाड़ी का खतरा लगातार बना रहता था. वो इतने खतरनाक थे की आस-पास के इलाकों के कुत्ते उनसे बहुत डरते थे. चाचा को यह चिंता सता रही थी की उनके शांत इलाके में आकर वो शैतान उन सभी को बेघर कर के पूरी तरह से वहा कब्ज़ा ना कर लें और मार न डालें जिस तरह उनलोगों ने भीकू के पिता को मार डाला था! भीकू का पिता उस इलाके का सरदार था, लेकिन सरदार की ही हत्या होजाने के बाद अब सभी को अपनी-अपनी चिंता होरही थी. अपने बेटे को याद करके चाचा की आँखों में आंसु आगये. उनको इस बात का सबसे ज़्यादा डर था की वो बाहरी कुत्ते उनके पोते भीकू को न मार डालें. “हमारी मदद करो भगवान!! मेरा भीकू तो अभी सिर्फ चार महीने का है और मैं उसे भी नहीं खोना चाहता! हमारी मदद करो!” इतना बोल के चाचा रोने लगे. उनके रोने की आवाज़ पूरे मोहल्ले में चैन से सोते मानवों के कानों में शोर बन के चुभने लगी.

(शेष कहानी अगले भाग में.....)

Sunday, 18 May 2014

आशिक़ी के संगम में डूबता है ये शहर....

                                            लेखक: आशुतोष अस्थाना



हर दिल में यहाँ इश्क बस्ता है, आशिकों से सजा हर एक रस्ता है,
दिन सुहाने हैं, तो शाम है यहाँ की रुहानी, दीवानगी में बीतती है यहाँ के परवानों की जवानी,
मुहब्बत ही इबादत है, यही है इसकी निशानी, इश्क की दास्तानों से ही तो बनती है इलाहाबाद की कहानी.

इलाहाबाद का मिजाज़ अपने में ही अनोखा है, गली-गली में यहाँ हीर तो हर चौराहे पर राँझा मिल जाते हैं. अपने में खोये समस्त दुनिया से बेखबर इस शहर के हर कोने में आपको असंख्य प्रेम के प्रतीक देखने को मिल जायेंगे. इस गंगा-यमुना की सभ्यता वाले शहर में आशिकी का अंदाज़ ही कुछ अलग है.

यहाँ के प्रेम का अंदाज़ महंगे तोहफों से नहीं पता चलता, यहाँ तो 50 रुपये की कान की बालियों से ही प्यार होजाता है. फाइव स्टार होटलों से ज़्यादा फुल्की के चटपटे स्वाद से नजदीकियां बढ़ती है. मर्सडीस में घुमाकर यहाँ के आशिक अपनी प्रियतम का दिल नहीं जीतते, बल्कि साइकिल के डंडे पे आगे बिठा कर प्रेम की बातें करते हैं. ये इलाहाबाद है, जहाँ हर सोमवार प्रेमी मनकामेश्वर मंदिर दर्शन करने जाते है और एक दूसरे का हाथ थामे सरस्वती घाट पर गंगा की चंचल चाल का आनंद लेते है. सरस्वती घाट तो प्रेमियों का मंदिर माना जाता है. आपको हर उम्र के प्रेमी जोड़े यहाँ मिल जायेंगे. कुछ छुप कर तो कुछ दिखाने के लिए गंगा की आड़ लेते है. यहाँ दुपट्टा सिर्फ प्रेमिकाओं का एक वस्त्र नहीं होता है, बल्कि समाज से छुपने का एक साधन होता है. इलाहाबाद विश्वविद्यालय की भी सड़के आशिकों की फ़ौज से भरी रहती है, प्रेम की लहर कैंपस में दिन के हर वक़्त देखने को मिलती है चाहे चाय के ठेले पर या किसी फ़ास्ट फ़ूड की दूकान पर, मैदान में बैठ कर एक दूसरे का नोट्स लिखते हुए या पानी के नल के पास एक दूसरे पर छींटा मारते हुए. 

दिन में इन प्रेमियों को कंपनी बाग या भारद्वाज पार्क जैसी जगहों पर पन्हा मिलती है. दिन की थकान का अंत कंपनी बाग के शांत वातावरण में होता है. इन दीवानों की शामें भी बहुत रंगीन होती हैं जब सिविल लाइन्स के एल्चिको या तंदूर में अपने प्रेमी के साथ बातें करते-करते जीवन का सुख बटोरते है तो विनायक मॉल में फेसबुक में डालने के लिए फोटो खिचवाते हैं. कभी बारिश की हलकी फुहार में सोंराव तक की लम्बी मोटरसाइकिल यात्रा करते हैं.

आज भी इलाहाबादियों के इश्क में सादगी झलकती है. साथ रहने की ख़ुशी भी रहती है तो घर वालों का भय भी होता है. साथ जीने-मरने की कसमें भी होती हैं तो अगले ही चौराहे पर वैलेंटाइन डे के दिन पुलिस के द्वारा पकड़े जाने का खतरा. 

इलाहाबादियों का अंदाज़ और उनका आशिकाना मिजाज़ ही उन्हें औरों से अलग करता है. लोग कुछ भी कहें, लेकिन यहाँ के लोग प्रेम की गंगा में नहाते हैं और रिश्तों के संगम में गोते लगाते हैं.

Sunday, 11 May 2014

.......माँ

                                               लेखक: आशुतोष अस्थाना




मन में एक ख़याल आया, लिखूं अपनी माँ के लिए एक कविता,
जो हो सुन्दर, भावना से युक्त और दर्शाए मेरी माँ की ममता ||

जब बैठा मैं लिखने, आया न मन में कोई ख़याल,
भावनाएं विचार रही थी पुरे ब्रह्माण्ड में और दिमाग होरहा था बेहाल ||

फिर सोचा न हूँ मैं निराला, प्रसाद या पंत,
तो होगा यही बेहतर कि कर दूँ इस कविता का अंत ||

लेकिन आया एक और ख़याल मन में, कविता लिख कर खुश करूँगा माँ को,
तो किया निश्चय, पूरी करूँगा अब इस कविता को ||

फिर किया मैंने मनन और लगाया अटूट ध्यान,
लेकिन कुछ भी न सूझा दिमाग में, क्या था मैं शब्दों से अनजान?

पर हार नहीं मानी मैंने और खूब किया उधेड़-बुन,
फिर भी अपनी भावनाओं की आवाज़ को मैं नहीं पारहा था सुन ||

अब थक गया था मैं, कुछ और नहीं सोच सकता था,
रखा था मैंने किताब पे कलम और लेटने चला था, कि तभी एक नए ख़याल ने मुझे दस्तक दिया था||

हम कर नहीं सकते माँ को शब्दों में बयान,
क्योंकि उसी ने तो सिखाया हमे इन शब्दों का ज्ञान ||

शब्द निर्माण से सृष्टि निर्माण, वही तो रही है रचयता,
जिसके बिना है हर कोई अधूरा, फिर चाहे मनुष्य या देवता ||

पेट काट कर उसी ने हमें दिया था जन्म पर मुख पे ना था पीड़ा का एक भी निशान,
उसी ने बताया हमें उस विधाता की पहचान ||

उसी ने सिखाया हमें इस भू पर चलना,
उसी ने बताया हमें एक अच्छा इंसान बनना ||

गोद मेंलेटाकर सुलाती है हमको,
अपनी भूक मार कर खिलाती है हमको ||

कहते हैं लोग की सबसे बड़ा है भगवान,
पर मैं कहता हूँ माँ है सबसे महान ||

मैं धन्य हूँ कि मुझे मिली है ऐसी माता,
जिसकी ममता और स्नेह से टल जाती हर बाधा ||

मैं करूँगा ये विनती परमात्मा से,
डाल देना मुझपर अपनी यह "आभा" हर जन्म में ||


(मेरी जननी का नाम "आभा" है)


Monday, 5 May 2014

ये सफ़र कुछ फ़िल्मी है.....

                                                 लेखक: आशुतोष अस्थाना



फिल्में सिर्फ तीन वजहों से चलती है- एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और हर दर्शक को चाहिए भी यही. 1913 से शुरू हुए फिल्मों के इस सफ़र को 2014 तक 100 साल हो चुके हैं और अभी तक इस बॉलीवुड ने हजारों भारतियों को मनोरंजित और प्रेरित किया और हर साल भारतीय फिल्मों की संख्या के साथ इसके दर्शक भी बढ़ते जारहे हैं.





इन्ही दर्शकों में से एक मैं भी हूँ. 90 की शुरुआत में पैदा होने के कारण मैं एक ऐसे समय में पैदा हुआ जब फिल्मों का एक नया युग शुरू होरहा था. लीक से हट कर फिल्में बनाने का दौर शुरू होगया था. 'इश्क फिल्म से मैंने अपने फिल्में समझने योग्य दर्शक जीवन की शुरुआत की.
आमिर खान और अजय देवगन की दोस्ती से दर्शकों को भी इश्क होगया था. 90 के दशक ने बॉलीवुड के तीन बड़े 'खान', सलमान, आमिर और शाहरुख़ को सफलता की ऊंचाई दी. 'कुछ कुछ होता है', 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'सरफ़रोश जैसी फिल्मों से इन कलाकारों ने फिल्म जगत में अपना लोहा मनवाया.


गोविंदा, अनिल कपूर, अक्षय कुमार जैसे अभिनेताओं को भी काफी प्रशंसा मिली. माधुरी, काजोल और जूही जैसी अभिनेत्रियाँ बुलंदी पर रहीं.

90 के दशककी फिल्मों ने आशिकों की एक नई फ़ौज खड़ी कर दी थी. "कुछ-कुछ होता है अंजली, तुम नहीं समझोगी!" और "ये ढाई किलो का हाथ किसी पे पड़ता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता!" जैसे डायलॉग अब डायलॉग से ज़्यादा होगये थे.




इसी दशक में सलमान खान ने युवाओं को फिटनेस का नया मंत्र देदिया और 'सिक्स पैक एब्स' का प्रचलन शुरू कर दिया.

नई सदी की शुरुआत हुई और ऋतिक रोशन ने बड़े परदे पर अपने डबल रोल के साथ 'कहो न प्यार है' फिल्म से अपना नाम रोशन कर दिया. अपने लाजवाब अभिनय के साथ ऋतिक ने अपनी डांस की कला से सबको आवक करदिया.


 अमिताभ बच्चन भी नए अवतार के साथ दिखाई दिए और दाढ़ी उगने के बाद मनो उनकी सफलता की दूसरी पारी शुरू होगई और सदी के महानायक बन सबके दिलों में बसने लगे.

2000 से 2014 तक की फिल्मों का सफ़र भी अनोखा रहा. मेरे जैसे फिल्म प्रेमियों को कई सुन्दर प्रस्तुतियां देखने को मिलीं. सामान्य सिनेमा से हट कर असामान्य सिनेमा को देखने का मौका मिला. इन 14 सालों में प्यार-मोहब्बत से हट कर सामाजिक व्यवस्थाओं को तथा यथार्थ को दर्शाने वाली फिल्में बनीं. इसी बीच फिल्मों के 'सीक्वल' तथा अन्य फिल्मों के 'रीमेक' बनाने का भी दौर चला.

भगत सिंह, अकबर, मिल्खा सिंह आदि जैसे एतिहासिक लोगों पर फिल्म बनी. वहीं बॉम्बे, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई, ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्मों में आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड का कला सच दिखाया गया.'ब्लैक' और 'लगान' जैसी अद्वितीय फिल्मों के साथ भारतीय सिनेमा ने विश्व स्तर पर अपना परचम लहराया.



इसी बीच फिल्मों ने 100 करोड़रूपए का कारोबार करना शुरू किया, जहाँ '3 इडियट्स' और 'दबंग' जैसी फिल्मों ने 100 करोड़ की कमाई की, वही 'चेन्नई एक्सप्रेस' जैसी फिल्मों ने 250-300 करोड़ रूपए का कारोबार कर नया इतिहास रच दिया.
नारी सशक्तिकारण के लिये कई स्त्री प्रधान फिल्में भी बनीं तो सिक्स पैक एब्स को पीछे छोड़कर आठ पैक एब्स का ज़माना आगया.
अभिनेता और अभिनेत्रियों की फीस लगातार बढ़ती रही वहीं उनके वस्त्र लगातार छोटे होते रहे. इसी के साथ संगीत ने भी अपना रंग बिखेरा और दिल को छूने से दिल को तोड़ने तक सभी प्रकार के गाने बने. 'दर्द-ए-डिस्को' से 'तमंचे पे डिस्को' भी दर्शकों को सुनने का अवसर मिला.

अंत में यह कहना गलत नहीं होगा की मुझ जैसे तमाम दर्शकों का पैसा वसूल होगया.भारतीय फिल्म जगत अपनी ही धुन में आगे बढ़ता जारहा है, और वो समय दूर नहीं जब फिल्म के छेत्र में भारत हॉलीवुड को भी पीछे छोड़ देगा. इसलिए हम यही कह सकते हैं कि, "पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!"

Thursday, 27 March 2014

कंपनी बाग (भाग- 6)

                           लेखक: आशुतोष अस्थाना


चार बज गए थे और रौशनी के घर जाने का समय होरहा था. “अब हमे चलना होगा, माँ इंतज़ार कर रही होगी!” रौशनी ने सूरज से बोला. “जी बिलकुल, नहीं तो आप की माता जी परेशान होजयेंगी, वैसे आप चिंता न करें मैं तो मिलता ही रहूँगा आपसे यहाँ”, सूरज ने कुछ ज़्यादा ही मुस्कुराकर कहा. रौशनी को उसकी बात सुन के हँसी आगई, उसने मुस्कुराकर उसे अलविदा कहा और अपने भाई के साथ चली गई. सूरज कुछ देर वही खड़ा रहा, और सोचता रहा की ये जो कुछ भी होरहा था वो सपना तो नहीं, लेकिन गेंद के दर्द ने याद दिला दिया की वो सच था. एक बार आंख बंद करके उसने रौशनी के हाथों के स्पर्श को अपने सर पे मेहसूस किया. वो उसका दीवाना होचुका था, उसकी हँसी का, उसकी बातों का, उसके चेहरे का और उसी की याद में और जल्द ही उससे फिर मिलने की ख़ुशी में वो भी कंपनी बाग से चला गया.
पांच बजने वाले थे और बाग के बंद होने का समय होरहा था. वो बूढ़े दम्पति घर जाने के लिए अपनी कार की ओर जाने लगे. “आज तुम्हारा साथ है इसी लिए मैं जिंदा हूँ नहीं तो....” इतना कहते ही पती की आँख से फिर आंसु गिर आए. “....और ये साथ हमेशा रहेगा!” पत्नी ने मुस्कुरा कर उत्तर दिया और चलने में उनको सहारा देने लगी. अपनी पत्नी का साथ पाके उनके अन्दर नई स्फूर्ति आगई. “माँ- बाप का प्यार बच्चों को बड़ी किस्मत से मिलता है, वो तो उनके ऊपर है की वो उसे हासिल कर लें या उस अमूल्य स्नेह को खो दें!” पत्नी ने लम्बी सांस लेकर कहा. ड्राईवर गाड़ी की पीछे वाली सीट पे लेटा सो रहा था. मालिक की आवाज़ सुनते ही उसकी नींद खुल गई, वो झट से उठा और अपनी सीट पे जाके बैठ गया. “इस जगह में कुछ तो बात है, ऐसा लगता है जैसे ये सारे दुःख हर लेती है!” पती ने बैठते-बैठते कहा. गाड़ी ने रफ़्तार पकड़ी और वो लोग बाग से चले गए.
धीरे-धेवेरे बाग की भीड़ कम होती गई. अतुल और विजय भी ज़िदगी को कोसते और कुदरत की बनाई सुनदर लडकियों की तारीफ़ करते अपने-अपने घर चले गए. “थैंक यू सुरेश! मुझसे इतना प्यार करने के लिए.” दिशा सुरेश के प्यार में खिल रही थी. “तुम मेरी जिंदगी को दिशा और मैं अपनी जिंदगी को मुझसे दूर कभी नहीं जाने दूंगा. मैं कल ही मेरे मम्मी-पापा को भेजूंगा तुम्हारे घर तुम्हारे माता-पिता से हमारी शादी की बात करने के लिए.” सुरेश ने ठंडी सांस लेते हुए कहा. “और अगर वो नहीं माने तो?” दिशा ने थोड़ा दुखी होकर पूछा. “नहीं दिशा, अब तुम्हे और परेशां होने की ज़रूरत नहीं है, मैं अपनी मंजिल को पाके रहूँगा, चाहे कुछ भी होजाये! और हाँ प्लीज़ तुम खाना बनाना सीख लो नहीं तो बाद में मुझे क्या खिलाओगी.” सुरेश ने मुस्कुराते हुए काहा. दिशा खिलखिला कर हँस पड़ी. वो पल सुरेश के लिए सबसे ख़ास होता था, जब दिशा उसकी बातों पे सब कुछ भूल के हँसती थी. उस वक़्त वो उस पल को कैद कर लेना चाहता था. दिशा ने उसे अपनी बाहों में लेलिया. उसकी बाहें दिशा के लिए दुनिया की सबसे सुरक्षित जगह थी. हर दुःख, हर पीड़ा, हर आंधी, शांत होती लगने लगी. दोनों उठे और अपनी आने वाली जिंदगी की बातें करते-करते चले गए.
सबकुछ शांत था, पेड़ो ने भी हिलना बंद करदिया था, सूरज पीपल के बड़े वृक्षों के पीछे ओझल होरहा था. मानव जीवन के सारे भावों को अपने में समेटे वो कंपनी बाग रात के आगोश में खोने को तैयार था. सारे गेट बंद करके चौकीदार अपने घर चले गए. ढलते सूरज की किरणों में आज़ाद जी अभी भी उसी जज़्बे के साथ खड़े थे, शायद इस इंतज़ार में की अगला दिन कुछ नए मीठे-नमकीन पलों से उन्हें अवगत कराएगा.