लेखक: आशुतोष अस्थाना
फिल्में सिर्फ तीन वजहों से चलती है- एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और हर दर्शक को चाहिए भी यही. 1913 से शुरू हुए फिल्मों के इस सफ़र को 2014 तक 100 साल हो चुके हैं और अभी तक इस बॉलीवुड ने हजारों भारतियों को मनोरंजित और प्रेरित किया और हर साल भारतीय फिल्मों की संख्या के साथ इसके दर्शक भी बढ़ते जारहे हैं.
इन्ही दर्शकों में से एक मैं भी हूँ. 90 की शुरुआत में पैदा होने के कारण मैं एक ऐसे समय में पैदा हुआ जब फिल्मों का एक नया युग शुरू होरहा था. लीक से हट कर फिल्में बनाने का दौर शुरू होगया था. 'इश्क फिल्म से मैंने अपने फिल्में समझने योग्य दर्शक जीवन की शुरुआत की.
आमिर खान और अजय देवगन की दोस्ती से दर्शकों को भी इश्क होगया था. 90 के दशक ने बॉलीवुड के तीन बड़े 'खान', सलमान, आमिर और शाहरुख़ को सफलता की ऊंचाई दी. 'कुछ कुछ होता है', 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'सरफ़रोश जैसी फिल्मों से इन कलाकारों ने फिल्म जगत में अपना लोहा मनवाया.
गोविंदा, अनिल कपूर, अक्षय कुमार जैसे अभिनेताओं को भी काफी प्रशंसा मिली. माधुरी, काजोल और जूही जैसी अभिनेत्रियाँ बुलंदी पर रहीं.
90 के दशककी फिल्मों ने आशिकों की एक नई फ़ौज खड़ी कर दी थी. "कुछ-कुछ होता है अंजली, तुम नहीं समझोगी!" और "ये ढाई किलो का हाथ किसी पे पड़ता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता!" जैसे डायलॉग अब डायलॉग से ज़्यादा होगये थे.
इसी दशक में सलमान खान ने युवाओं को फिटनेस का नया मंत्र देदिया और 'सिक्स पैक एब्स' का प्रचलन शुरू कर दिया.
नई सदी की शुरुआत हुई और ऋतिक रोशन ने बड़े परदे पर अपने डबल रोल के साथ 'कहो न प्यार है' फिल्म से अपना नाम रोशन कर दिया. अपने लाजवाब अभिनय के साथ ऋतिक ने अपनी डांस की कला से सबको आवक करदिया.
अमिताभ बच्चन भी नए अवतार के साथ दिखाई दिए और दाढ़ी उगने के बाद मनो उनकी सफलता की दूसरी पारी शुरू होगई और सदी के महानायक बन सबके दिलों में बसने लगे.
2000 से 2014 तक की फिल्मों का सफ़र भी अनोखा रहा. मेरे जैसे फिल्म प्रेमियों को कई सुन्दर प्रस्तुतियां देखने को मिलीं. सामान्य सिनेमा से हट कर असामान्य सिनेमा को देखने का मौका मिला. इन 14 सालों में प्यार-मोहब्बत से हट कर सामाजिक व्यवस्थाओं को तथा यथार्थ को दर्शाने वाली फिल्में बनीं. इसी बीच फिल्मों के 'सीक्वल' तथा अन्य फिल्मों के 'रीमेक' बनाने का भी दौर चला.
भगत सिंह, अकबर, मिल्खा सिंह आदि जैसे एतिहासिक लोगों पर फिल्म बनी. वहीं बॉम्बे, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई, ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्मों में आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड का कला सच दिखाया गया.'ब्लैक' और 'लगान' जैसी अद्वितीय फिल्मों के साथ भारतीय सिनेमा ने विश्व स्तर पर अपना परचम लहराया.
इसी बीच फिल्मों ने 100 करोड़रूपए का कारोबार करना शुरू किया, जहाँ '3 इडियट्स' और 'दबंग' जैसी फिल्मों ने 100 करोड़ की कमाई की, वही 'चेन्नई एक्सप्रेस' जैसी फिल्मों ने 250-300 करोड़ रूपए का कारोबार कर नया इतिहास रच दिया.
नारी सशक्तिकारण के लिये कई स्त्री प्रधान फिल्में भी बनीं तो सिक्स पैक एब्स को पीछे छोड़कर आठ पैक एब्स का ज़माना आगया.
अभिनेता और अभिनेत्रियों की फीस लगातार बढ़ती रही वहीं उनके वस्त्र लगातार छोटे होते रहे. इसी के साथ संगीत ने भी अपना रंग बिखेरा और दिल को छूने से दिल को तोड़ने तक सभी प्रकार के गाने बने. 'दर्द-ए-डिस्को' से 'तमंचे पे डिस्को' भी दर्शकों को सुनने का अवसर मिला.
अंत में यह कहना गलत नहीं होगा की मुझ जैसे तमाम दर्शकों का पैसा वसूल होगया.भारतीय फिल्म जगत अपनी ही धुन में आगे बढ़ता जारहा है, और वो समय दूर नहीं जब फिल्म के छेत्र में भारत हॉलीवुड को भी पीछे छोड़ देगा. इसलिए हम यही कह सकते हैं कि, "पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!"
फिल्में सिर्फ तीन वजहों से चलती है- एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट, एंटरटेनमेंट और हर दर्शक को चाहिए भी यही. 1913 से शुरू हुए फिल्मों के इस सफ़र को 2014 तक 100 साल हो चुके हैं और अभी तक इस बॉलीवुड ने हजारों भारतियों को मनोरंजित और प्रेरित किया और हर साल भारतीय फिल्मों की संख्या के साथ इसके दर्शक भी बढ़ते जारहे हैं.
इन्ही दर्शकों में से एक मैं भी हूँ. 90 की शुरुआत में पैदा होने के कारण मैं एक ऐसे समय में पैदा हुआ जब फिल्मों का एक नया युग शुरू होरहा था. लीक से हट कर फिल्में बनाने का दौर शुरू होगया था. 'इश्क फिल्म से मैंने अपने फिल्में समझने योग्य दर्शक जीवन की शुरुआत की.
आमिर खान और अजय देवगन की दोस्ती से दर्शकों को भी इश्क होगया था. 90 के दशक ने बॉलीवुड के तीन बड़े 'खान', सलमान, आमिर और शाहरुख़ को सफलता की ऊंचाई दी. 'कुछ कुछ होता है', 'प्यार किया तो डरना क्या' और 'सरफ़रोश जैसी फिल्मों से इन कलाकारों ने फिल्म जगत में अपना लोहा मनवाया.
गोविंदा, अनिल कपूर, अक्षय कुमार जैसे अभिनेताओं को भी काफी प्रशंसा मिली. माधुरी, काजोल और जूही जैसी अभिनेत्रियाँ बुलंदी पर रहीं.
90 के दशककी फिल्मों ने आशिकों की एक नई फ़ौज खड़ी कर दी थी. "कुछ-कुछ होता है अंजली, तुम नहीं समझोगी!" और "ये ढाई किलो का हाथ किसी पे पड़ता है तो आदमी उठता नहीं, उठ जाता!" जैसे डायलॉग अब डायलॉग से ज़्यादा होगये थे.
इसी दशक में सलमान खान ने युवाओं को फिटनेस का नया मंत्र देदिया और 'सिक्स पैक एब्स' का प्रचलन शुरू कर दिया.
नई सदी की शुरुआत हुई और ऋतिक रोशन ने बड़े परदे पर अपने डबल रोल के साथ 'कहो न प्यार है' फिल्म से अपना नाम रोशन कर दिया. अपने लाजवाब अभिनय के साथ ऋतिक ने अपनी डांस की कला से सबको आवक करदिया.
2000 से 2014 तक की फिल्मों का सफ़र भी अनोखा रहा. मेरे जैसे फिल्म प्रेमियों को कई सुन्दर प्रस्तुतियां देखने को मिलीं. सामान्य सिनेमा से हट कर असामान्य सिनेमा को देखने का मौका मिला. इन 14 सालों में प्यार-मोहब्बत से हट कर सामाजिक व्यवस्थाओं को तथा यथार्थ को दर्शाने वाली फिल्में बनीं. इसी बीच फिल्मों के 'सीक्वल' तथा अन्य फिल्मों के 'रीमेक' बनाने का भी दौर चला.
भगत सिंह, अकबर, मिल्खा सिंह आदि जैसे एतिहासिक लोगों पर फिल्म बनी. वहीं बॉम्बे, वन्स अपॉन अ टाइम इन मुंबई, ब्लैक फ्राइडे जैसी फिल्मों में आतंकवाद और अंडरवर्ल्ड का कला सच दिखाया गया.'ब्लैक' और 'लगान' जैसी अद्वितीय फिल्मों के साथ भारतीय सिनेमा ने विश्व स्तर पर अपना परचम लहराया.
इसी बीच फिल्मों ने 100 करोड़रूपए का कारोबार करना शुरू किया, जहाँ '3 इडियट्स' और 'दबंग' जैसी फिल्मों ने 100 करोड़ की कमाई की, वही 'चेन्नई एक्सप्रेस' जैसी फिल्मों ने 250-300 करोड़ रूपए का कारोबार कर नया इतिहास रच दिया.
नारी सशक्तिकारण के लिये कई स्त्री प्रधान फिल्में भी बनीं तो सिक्स पैक एब्स को पीछे छोड़कर आठ पैक एब्स का ज़माना आगया.
अभिनेता और अभिनेत्रियों की फीस लगातार बढ़ती रही वहीं उनके वस्त्र लगातार छोटे होते रहे. इसी के साथ संगीत ने भी अपना रंग बिखेरा और दिल को छूने से दिल को तोड़ने तक सभी प्रकार के गाने बने. 'दर्द-ए-डिस्को' से 'तमंचे पे डिस्को' भी दर्शकों को सुनने का अवसर मिला.
अंत में यह कहना गलत नहीं होगा की मुझ जैसे तमाम दर्शकों का पैसा वसूल होगया.भारतीय फिल्म जगत अपनी ही धुन में आगे बढ़ता जारहा है, और वो समय दूर नहीं जब फिल्म के छेत्र में भारत हॉलीवुड को भी पीछे छोड़ देगा. इसलिए हम यही कह सकते हैं कि, "पिक्चर अभी बाकी है मेरे दोस्त!"



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