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Tuesday, 27 May 2014

लारा (भाग- 4)


                  लेखक: आशुतोष अस्थाना


                   (मेरे पहले दोस्त की स्मृति में....)






आँखों में गुस्सा था, पैरों में बिजली सी रफ़्तार थी, और इरादा था दुश्मन को मार गिराने का. लारा सफ़ेद पुल को पार कर चूका था लेकिन उसे वहा कोई कुत्ता नहीं मिला. वो बेख़ौफ़ आगे बढ़ता जारहा था. उसने सोच लिया था की उसके दोस्त के दादा को जिसने भी मारा है वो उसे नहीं छोड़ेगा. एक चौराहे पर पंहुचा तो देख कर चौंक गया. वहा गाडियों का इतना बड़ा जाम था जो उसने कभी अपनी जिंदगी में नहीं देखा था. 

तभी वहा एक कुत्ता अचानक से आगया और उसको देख कर गुर्राने लगा. “कौन है बे तू? और यहाँ हमारे इलाके में क्या कर रहा है?” “मैं कुछ कुत्तों को ढूंड रहा हूँ जिन्होंने मेरे इलाके में आकर मेरे दोस्त के दादा को मार डाला!” वो कुत्ता कुछ सोचने लगा फिर सोचने के बाद बोला, “अच्छा! ऐसा है का! चलो हम तुम्हारी मदद करते है, हमारा सरदार जनता होगा, आओ मेरे साथ.” और वो कुत्ता लारा को अपने साथ एक अँधेरी गली में लेगाया. उस गली में काफी दुर्गन्ध थी और वहा की माहौल भी बहुत अजीब था. 

गली में अंदर जाते ही वो कुत्ता ज़ोर-ज़ोर से चिल्ला कर अपने साथियों को बुलाने लगा. देखते ही देखते वहा 10-12 कुत्ते आगये. लारा उन सबको देख रहा था और वो सब भी अपने कान खड़े किये लारा को देख रहे थे. तभी एक बड़े से कूड़ेदान के पीछे से एक काले रंग का चमकीली आँख वाला कुत्ता बाहर आया. “ये कौन है?” उसने गुस्से से पूछा. उस कुत्ते ने पूरी बात बताई. “क्या तुम जानते हो उनलोगों को?” लारा ने सरदार से पूछा. सरदार हँसने लगा और लारा के पास आकर बोला, “मैं उन्हें तो नहीं जनता लेकिन एक बात ज़रूर जनता हूँ की मेरे इलाके में आने के बाद तेरी क्या हालत होने वाली है! तू परेशान है की उस बुड्ढे को किसी ने मार डाला, लेकिन तेरी परेशानी तो अब बढ़ेगी बच्चे क्यूंकि अब तू खुद उस बुड्ढे के पास पहुचने वाला है!” बस इतना कहते ही सारे कुत्ते लारा की ओर बढ़ने लगे. लारा को कुछ डर भी लग रहा था लेकिन उसने अपनी हिम्मत को दबने नहीं दिया. 

एक कुत्ता पीछे से उसके ऊपर झपटा! तभी खुद को बचाते हुए वो उछल कर दूसरी ओर कूद गया, लेकिन तभी सरदार भी लारा की तरफ काटने दौड़ा, लेकिन लारा ने सर नीचे कर के उसका पैर पकड़ लिया और अपने दांतों से उसके पैर को काट खाया! उस गली में कुत्तों के गुर्राने की आवज़ सुनाई देरही थी, और आस-पास से निकलने वाले लोग डर कर रास्ता बदल लेरहे थे. लारा ने सरदार को ज़मीन पे गिरा दिया था और उसके गले को अपने दांतों से पकड़ा हुआ था, लेकिन उसने ध्यान नहीं दिया और पीछे से दो कुत्तों ने उसके ऊपर हमला कर दिया! एक ने उसके पैर को पकड़ लिया और दूसरा उसके गले को काटने लगा! अबतक लारा खून से लथ-पथ होचुका था! तभी वो पीछे मुड़ा और उचल कर उन दोनों कुत्तों के ऊपर झपटा, लेकिन तीसरे कुत्ते ने उसकी आँख पे वार किया! उस वार से कुछ देर के लिए उसकी आँख के सामने अँधेरा सा छागया लेकिन उसने फिर भी बहादुरी से लड़ना जारी रखा! 

कई कुत्ते वहा से भाग गए. कुछ तो अध् मरे होगये थे और उनका सरदार वही मर चुका था! सबके भाग जाने के बाद लारा वही लेट गया. हलके से उसने अपनी आँख खोली और देखा की अब वहा कोई नहीं था. हिम्मत कर के वो उठा और असमान की ओर देख कर ज़ोर से चिल्लाया. उसकी चीख में उन चोटों का दर्द, और अकेले होजाने का गम साफ़ सुनाई पड़ रहा था. लंगड़ाते हुए वो आगे बढ़ा और अपनी खोज फिर शुरू कर दिया. पूरे शहर में उसने उन्हें ढूडने का निश्चय कर लिया था. हर मोहल्ले में उसे कुत्तों का नया समूह मिलता. अपने इलाके में उसे आते देख वो उसे काटने के लिए दौड़ते. लेकिन इतना लाचार होने के बावजूत वो कुछ से लड़ता और जब हिम्मत जवाब देदेती तो कुछ से बच के निकल लेता. तीन दिन होगये थे और वो अभी तक घर नहीं पंहुचा था. अब उसे बेहोशी आने लगी थी और आगे चलना दूभर होरहा था, तब उसने घर लौटने का निश्चय किया. कई दिनों का सूंघने के प्रशिक्षण ने उसे घर लौटने में मदद किया.

मोना का रो-रो कर बुरा हाल होचुका था. पिता जी भी उसे आस पास की गलियों में ढूंड आये थे लेकिन वो कही नहीं मिला था. शाम को मोना बाहर ही बैठी थी की अचानक उसे गेट के बाहर किसी कुत्ते के भौकने की आवाज़ आई, वो दौड़ कर गई और देखा, लारा गेट के बाहर खड़ा था. उसने तुरंत गेट खोला और उससे लिपट गई. उसे देखते ही उसके आँखों से आंसू बहने लगे. उसकी हालत बहुत ख़राब थी इसलिए सब उसे तुरंत डॉक्टर के पास लगाये. कुछ दिनों में लारा ठीक होने लगा था और अब उसे हर वक़्त ज़ंजीर से ही बाँध के रखा जाता था. उसे भीकू की फ़िक्र होरही थी जिसको उसने काफी समय से नहीं देखा था.



एक रात लारा को बांधना सब भूल गए थे और वो खुला घूम रहा था. सबके सो जाने के बाद वो तुरंत भीकू से मिलने गया. उसके घर पहुच कर उसने देखा वो सो रहा था. वो कुछ दुबला होगया था. उसे देख कर लारा समझ गया की उसने बहुत दिनों से कुछ खाया नहीं होगा. “भीकू! भीकू! उठो दोस्त, मैं हूँ, लारा!” लारा ने भीकू को उठाया. भीकू ने हलके से आँख खोली और देख कर चौंक गया. लारा के चेहरे पे पट्टी बंधी थी और उसकी एक आँख के चारों तरफ का बाल झड़ गया था, जिससे आँख के चारों तरफ कला होगया था. “ये क्या होगया तुम्हे? और तुम कहा थे इतने दिन? मैं तुम्हे देखने गया था तुम्हारे घर लेकिन तुम्हारे घर के लोगों ने मुझे मार के भागा दिया था...” भीकू की आँख में लारा को देख कर आंसू आगये थे. “मैं दादा जी को मारने वालो को ढूंडने गया था और वही मुझपर एक इलाके के कुत्तों ने हमला कर दिया था.” दोनों कुछ देर के लिए शांत होगये. “मुझे माफ़ कर दो दोस्त मैं उन लोगो को नहीं खोज पाया!” लारा रोने लगा. भीकू ने उसे शांत कराया, “नहीं दोस्त तुमने जितना मेरे लिए किया है उतना तो कभी किसी ने नहीं किया. अब सिर्फ तुम्ही का साथ है...” भीकू भी रोने लगा. “...लेकिन तुम परेशान मत हो भीकू, मैं वादा करता हूँ की मैं जब तक उनलोगों को सबक ना सिखा दूँ तब तक चैन से नहीं बैठूँगा!”


(शेष कहानी अगले भाग में....)
 

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