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Sunday, 25 May 2014

लारा (भाग-3)


                लेखक: आशुतोष अस्थाना

               (मेरे पहले दोस्त की स्मृति में....)




रात का समय था, घर में सब लोग सो चुके थे और एक निडर चौकीदार की तरह लारा घर की रखवाली कर रहा था. थोड़ी देर बाद वो बाहर जाकर गेट के सामने ही बैठ गया. दूर से दूसरे कुत्तों के चिल्लाने की आवाज़े आरही थी. वो अपने कान खड़े किये सुन रहा था. तभी उसे किसी के चलने की आहट सुनाई दी तो वो तुरंत खड़ा होकर भौंकने लगा. कुछ दूर पर उसे एक चार पैर वाली परछाई दिखाई देरही थी, उसे लग रहा था की कोई है वहा.

“कौन है उधर!” उसने गुस्से से चिल्ला कर बोला. वो परछाई पास आने लगी. और पास आकर उसने बोला, “मेरा नाम भीकू है, मैं पास में ही एक ठेले के नीचे रहता हूँ.” “चले जाओ मैं इस घर का रखवाला हूँ, तुम्हे इस घर को कुछ नहीं करने दूंगा!” लारा ने थोड़ा अधिक गुस्से से बोला और गुर्राने लगा. “देखो गुस्साओ नहीं, मैं कुछ नहीं करने आया हूँ, मुझे तो बस तुमसे बात करनी है, तुम्हारा नाम क्या है?” लारा को लगा की भीकू अच्छे स्वाभाव का कुत्ता है तो वो शांत होगया, “मेरा नाम लारा है, मैं यही रहता हूँ. तुम अकेले रहते हो?, तुम्हारा और कोई नहीं है?” लारा ने भीकू से पूछा. “मैं अपने दादा जी के साथ रहता हूँ, वो इस इलाके के सरदार है” भीकू ने कहा. “...और तुम्हारे माता-पिता?” लारा ने धीरे से पूछा. “मेरे पिता को तो बहुत पहले ही मार दिया गया था और मेरी माँ कुछ दिन पहले बीमारी से मर गई!” इतना कह कर उसकी आँखों में आंसू आगये. “रो नहीं, मुझे माफ़ करना, अच्छा ये बताओ तुम्हारे पिता को किसने मारा?” “हमारे इलाके में दूसरे इलाको के कुत्ते आजाते है और वो हमे यहाँ से भगा देना चाहते है, बस उन्ही लोगों ने उनको मार डाला.” लारा शांत होकर उसकी बात सुन रहा था. भीकू उसे पूरी बात बताने लगा, किस तरह वो बाहरी कुत्ते उनलोगों के शांत इलाके में आकर उनकी जिंदगी बर्बाद करदिये और कई इंसानों को भी काट चुके है. लारा को वो सब सुन कर गुस्सा आरहा था. “तुम लोग कुछ करते क्यों नहीं हो! उनका सामना करो और उन्हें मार भागो!” भीकू ने कुछ नहीं बोला और सर झुका लिया. “हम बहुत कमज़ोर हैं दोस्त, हमे उनसे कोई नहीं बचा सकता!” भीकू ने लम्बी सी सांस लेकर कहा.

अभी वो लारा से बात कर ही रहा था की उसके दादा जी भी वहा अगये. “दादा जी ये लारा है.” भीकू ने कहा. लारा देखने में बहुत बड़ा और मज़बूत था तो दादा को लगा की ये भी बाहरी कुत्तों की तरह चालाक होगा. “कौन लारा! मैंने तुम्हे बोला है न इतनी रात में अकेले कही मत जाया करो!” दादा जी ने गुस्से से बोला. भीकू समझ गया की दादा जी क्यों गुस्सा होरहे हैं, तो उसने तुरंत कहा, “दादा जी ये उन कुत्तों की तरह नहीं है, ये तो...ये मेरा...”, “....मैं भीकू का दोस्त हूँ दादा जी”. लारा की बात सुन कर भीकू को बहुत अच्छा लगा और दादा जी भी खुश होगये. अब उन लोगों को एक नया साथी मिल गया था. भीकू हमेशा लारा से बात करता और वो दोनों साथ में समय बिताते थे. लारा अपने हिस्से की रोटी भीकू को देदेता और उसके साथ खूब खेलता था. उस इलाके के तमाम कुत्ते लारा के दोस्त बन गये थे और उससे बहुत स्नेह करते थे. उनके साथ खेलते कूदते उसकी जिंदगी बीत रही थी और देखते ही देखते वो पांच साल का होगया था. कुछ साल तक बाहरी कुत्तों ने हमला भी नहीं किया था और लगने लगा था जैसे वो अब कभी नहीं आयेंगे.

लारा एक समझदार कुत्ता था और घर के समस्त लोग उसे बहुत प्यार करते थे. वो किसी भी परिस्थितयों में रहना का आदी होचुका था और उसे अधिक मज़बूत और निडर बनाने के लिए मोना ने अपने पिता से अनुरोध करके उसे ट्रेनर से प्रशिक्षित करवाना शुरू कर दिया था. घर के किस्से और ट्रेनर के साथ किया हुआ परिश्रम, लारा भीकू को भी बताता था. 

एक दिन लारा भीकू के साथ घर के अंदर बैठा था, की तभी किसी कुत्ते के चिल्लाने की आवाज़ आई. “अरे! ये तो कालू भईया की आवाज़ है!” भीकू ने चौंक कर कहा. लारा तुरंत सतर्क होगया और भीकू के साथ बहार जाने लगा की तभी घर के अंदर से उसे किसी ने बुला लिया. उसको घर में ही रुकना पड़ा और भीकू दौड़ते-दौड़ते घर के बाहर चला गया. दुपहर का समय था और गलियों में शांति थी. उस शान्ति में कई कुत्तों के भौकने की आवाज़ आरही थी. धूप से बचाने के लिए मोना ने लारा को कमरे के अंदर बाँध दिया था. अपने साथियों की चीख सुन कर वो छटपटा रहा था. उसे बाहर जाना था, उसे जानना था की आखिर होक्या रहा है बाहर. उसे लगा की शायद दूसरे इलाके के कुत्तों ने फिर से हमला कर दिया है. वो बार-बार अपनी ज़ंजीर खींच रहा था, गुर्रा रहा था लेकिन सब उसे डांट कर चुप करा देरहे थे. बिचारा थक कर वही बैठ गया और अपने दोस्तों की आवाज़ सुनते-सुनते सोगया.

शाम को उसे सब ने खोल दिया तो वो भागते-भागते गेट से बाहर निकल गया और सीधे भीकू के घर की तरफ भागा. उसके घर के पास कुत्तों की भीड़ लगी थी. “यहाँ इतनी भीड़ क्यों जमा है? क्या हुआ है?” लारा ने डरते-डरते किसी कुत्ते से पूछा. “अरे क्या बताये बेटा! चाचा को मार डाला उन पापियों ने!” किसी ने कहा. वो सुनते ही लारा के होश उड़ गए. तभी उसने देखा भीकू चाचा जी की लाश के पास बैठा रो रहा है. उसे देखते ही लारा की आँखों में भी आंसू आगये और बदले की भावना ने उसके अंदर क्रोध की आग को जला दिया. वो तुरंत वह से निकला और वही खड़े एक कुत्ते से पूछा, “वो लोग कहा रहते है?” “मुझे ठीक से तो नहीं पता दोस्त लेकिन मैंने सुना है की वो कुत्ते सफ़ेद पुल के दूसरी ओर किसी इलाके से आते हैं!” लारा गुस्से से पागल होरहा था, उसने और कुछ नहीं सोचा और उन्हें ढूंडने निकल गया. 


(शेष कहानी अगले भाग में....)

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