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Friday, 17 August 2018

मेरे लिए क्या लायीं?

घर पर अकेला था। बड़ा भाई नौकरी पर गया था और भाभी अपनी माता जी के साथ बाज़ार से कुछ सामान खरीदने। तबियत नासाज़ थी। घर में आराम कर रहा था। लेटे लेटे कब नींद आ गयी पता नहीं चला। कुछ देर बाद डोर बेल बजी। हड़बड़ाहट में नींद खुली तो जल्दी दरवाज़ा खोलने गया। भाभी और उनकी माता जी बाज़ार से लौट आईं थीं। हाथ में सामान से भरा झोला था। दरवाज़ा खोल कर मैं अपने कमरे में आकर दुबारा सोने के लिए लेट गया। पर तुरंत नींद ना आई। तबियत खराब होने के बावजूद भी उस दौरान ऊर्जा का प्रवाह महसूस हुआ। एक पुरानी याद लौट कर ज़हन में आ गयी। एक ऐसी याद जो इतने दिनों में कभी नहीं आयी।
उन दिनों शामें कुछ अधिक लंबी हुआ करती थीं। दिन का खाना बनाने और खिलाने के बाद मम्मी और चाची जब फुरसत पाती थीं तो बाज़ार से सामान लाने की लिस्ट तैयार करने में जुट जाती थीं। साबुन, तेल, मंजन, खाने में उपयोग होने वाले मसाले, और ज़रूरत के अन्य सामानों को हिंदी की एक धारी वाली कॉपी के बीच के पन्नों पर लिखा जाता था। घर चलाने का ऐसा हुनर और ज्ञान जो कहीं और देखने को ना मिले। 12-13 लोगों के घर में महीने में कितना साबुन लगेगा, किसको किस चीज़ की आवश्यकता है, इन सब चीज़ों का उन्हें ज्ञात था। जितना किलो समान आता, उससे एक ग्राम भी महीने में कम ना पड़ता। ज़रूरत का सारा सामान चौक में उपलब्ध होता था। जिस दिन पता चल जाये कि आज मम्मी और चाची को चौक जाना है, उस दिन सुबह से ही भाई बहनों की ख्वाहिशों की गठरी खुलने लगती थी। हमारे लिए नई बनियान ला देना, मेरा स्कूल बैग फट गया है, चौक से फुल्की लेती आना, खन्ना वाले के यहां से एक टॉप ला देना, आज दोस्त नई वाली मैग्गी लाया था, वही वाली मेरे लिए भी लेती आना... सिर्फ उस दिन ज़रूरतें अपने आप पैदा होती थीं। शाम के 4 बजते बजते मम्मी और चाची के निकलने का वक़्त हो जाता था।
उनके घर से निकलते ही इंतज़ार करना भी शुरू हो जाता था। किसी की नई बनियान आने वाली होती थी, किसी का नया टॉप आने वाला होता था, कोई चौक की फुल्की के स्वाद को चखना चाहता था। उस दौरान इंटरव्यू के लिए कॉल आने का इंतज़ार करने से ज़्यादा भारी मम्मी-चाची का घर लौटने का इंतज़ार करना होता था। शाम के 6-7 बजते बजते उत्सुक्ता अपनी चरम सीमा पर होती थी। बस किसी भी वक़्त दोनी आते होंगे। रात के 8 बजते बजते गुस्सा आने लगता था कि इतनी देर भला कोई करता है! गली के बाहर किसी भी रिक्शे की घंटी सुनाई पड़ती थी तो भाग कर गेट के पास खड़े हो जाते थे। फिर वहीं से चिल्ला कर अंदर इतिल्ला किया जाता था कि अभी नहीं आयी हैं। बेसब्री ऐसी होने लगती थी कि हम में से कोई एक गेट के पास ही खड़ा हो जाता था। फिर किसी रिक्शे की घंटी, फिर घर से निकल कर देखना।
आखिरकार मम्मी और चाची का रिक्शा भी गली में प्रवेश कर ही जाता था। भाग कर हम लोग रिक्शे तक जाते थे और सामान से भरे तमान झोलों को उठा कर अंदर लाते थे। मसाले से भरे झोलों को उठाने में किसी की रुचि नहीं होती थी जिसे मम्मी-चाची या तो रिक्शे वाले से अनुरोध कर के घर के अंदर रखवाती थीं या चाची खुद ढो कर अंदर लेकर आती थी।
जितनी देर में वो दोनों रिक्शे वाले को रुपये देकर अंदर आती थीं, उतनी देर में सारा सामान झोलों से निकल कर ज़मीन पर पड़ा रहता था। उनके अंदर आते ही 'मेरे लिए क्या लाई?' के सवाल के गोले उनपर दागने शुरू हो जाते थे।
आधे से ज़्यादा सामान ऐसा होता था जिससे हमारा कोई सीधा वास्ता नहीं था, पर सामान देख कर ऐसी उत्सुक्ता होती थी, जिसकी कोई तुलना ही नहीं।
कोई नई चाय की पत्ती, या कोई नया साबुन, किसी पाउडर के साथ मुफ्त मिली छोटी तेल की डिब्बी, चाय के लिए नया कप सेट, सब अद्भुत एहसास देता था। सारा सामान करीने से अपने पास सजा कर दुकानदार वाला एहसास होता था। सारे सामानों को देखने के बाद ध्यान आता था कि जिसने जो मंगवाया है वो आया या नहीं। कभी-कभी सबके लिए कुछ ना कुछ आता और मेरे लिए नहीं तो मन रोआंसा हो जाता था, पर तभी मम्मी रुमाल का एक पैकेट निकाल कर खुशी से कहती थी, ये देखो तुम्हारे लिए ये लाये हैं! बस उस एक पल में सारी खुशी अपने हिस्से में आ जाती थी। उसके बाद अन्य सामानों की चकाचौंध में ऐसा खो जाते थे कि ये ध्यान ही नहीं आता था कि वो लेडीज़ रुमाल का पैकेट मेरे लिए नहीं, ज़रूरत पड़ने पर घर की महिलाओं के लिए काम आएगा। रात का खाना खाने के बाद सारा सामान हरे रंग की लकड़ी की छोटी सी अलमारी में रख दिया जाता था।
आज लंबे समय बाद जब भाभी और उनकी मम्मी को समान के साथ बाज़ार से आते देखा तो कुछ पल के लिए वैसी ही उत्सुक्ता मन में उठ आयी...लगा शायद उन झोलों में मेरे लिए भी कुछ हो, मन हुआ कि पूछा जाए, मेरे लिए क्या लायीं?

Tuesday, 22 May 2018

आओ, हिन्दू और मुसलमान की बात करें

यार समझने की कोशिश करो, क्योंकि अब अगर तुम नहीं समझे तो बहुत देर हो जाएगी। ये मसला कभी हिन्दू मुसलमान का था ही नहीं, ना ही किसी दूसरे धर्म, जाती,समुदाय से जुड़ा है। उन्हें सिर्फ सत्ता पर काबिज़ होना है, उन्हें देश में अपनी पैठ जमानी है और वो बखूबी कर रहे हैं, जानते हो कैसे? तुम्हारी और मेरी छाती पर चढ़ कर, हम सब को कीड़े समझ कर, जिसकी जान की कोई कीमत नहीं होती, जिसे कभी भी मसला जा सकता है। तुम मच्छर बन कर ज़रा सा भिनभिनाओगे और वो तुम्हें कुचल देंगे, वो ये नहीं देखेंगे कि तुम हिन्दू हो या मुसलमान। वो सिर्फ तुम्हारा खून बहाएंगे, और यकीन मानो दोस्त, दोनों का खून लाल ही होगा।
तुम जानना चाहते हो कि हक़ीक़त क्या है? ज़रा अपने आप को देखो और खुद से पूछो, क्या वाकई तुम अपने आप में समाए हो या किसी और के बनाये हुए इंसानी पुतले में महज़ घुसे हो जिसके ऊपर चमड़ी तो तुम्हारी है पर अंदर की रूह किसी और के द्वारा घुसेड़ दी गयी है।
याद करो जब तुम स्कूल-कॉलेज में थे, याद करो जब तुम किन्हीं कारणों से टिफ़िन नहीं ला पाते थे, तब तुम्हारा दोस्त तुम्हारे साथ अपना टिफ़िन बांटता था, क्या तब तुमने कभी ये जानने की ज़हमत उठायी की वो रोटी का टुकड़ा हिन्दू के घर का है या मुसलमान के घर का? तुम्हारे पैसे के खरीदे हुए समोसे को झपटने के लिए जब दस हाथ एक साथ समोसे की थैली में अंदर घुसते थे तो कभी ये सोचा कि हिन्दू का हाथ है या मुसलमान का?
जब परीक्षा में जवाब समझ नहीं आता था तब इधर उधर जवाब ढूंढने की उम्मीद से नज़र दौड़ाते थे तो ये सोचा था कि सिर्फ हिन्दू या मुसलमान के जवाब को सुनोगे, अन्य को अनसुना कर दोगे?
आज जब तुमने सोचने-समझने की शक्ति अपने अंदर पैदा कर ली है, तो तुम एक दूसरे को धर्म और जात से पहचानने लगे हो। घंटों फेसबुक पर किसी पुराने दोस्त से राजनीतिक मुद्दे पर बहस कर रहे हो, और उस बहस में दोस्ती की मर्यादाओं को लांघ कर एक दूसरे पर व्यक्तिगत हमला कर रहे हो और फिर उन्हीं दोस्तों को धर्म और जाति के नाम पर बांट कर अलग थलग हो जा रहे हो।
तुम असली खेल समझ ही नहीं पा रहे क्योंकि तुम किसी भीड़ में चल रही भेड़ की तरह बन गए हो जो बिना सर ऊपर उठाए, आगे वाली भेड़ के पीछे पीछे चली जाती है। कौवा कान काट कर ले गया, तुम कौए के पीछे भागने लगे, कान छू कर देखा ही नहीं।
वो लोग जो चाहते थे, तुम वो बन चुके हो, 'भक्त'।
तुम बीजेपी के भक्त हो, तुम कांग्रेस के भक्त हो, तुम सपा, बसपा, कम्युनिस्टों के भक्त हो। किसी ने तुम्हें एक परिवार का फैन बनाया, किसी ने व्यक्ति का फैन बनने पर मजबूर कर दिया, फिर उस व्यक्ति और परिवार ने तुम्हें उनकी पार्टी का पैरोकार बना दिया, फिर उस पार्टी ने खुद को हिंदुत्व, इस्लाम, दलित, अगड़े, पिछड़े से जोड़ कर तुम्हारे सामने आधुनिकता और विकास के सभी रास्ते बंद कर, धर्म, और कट्टरता के ऐसे रास्ते खोल दिये जो आगे जा कर बंद हो जाते हैं। अनभिज्ञता का अंधेरा मिटाने के लिए जिस धर्म को बनाया गया था, उन्होंने उसी धर्म से तुम्हें डराना शुरू कर दिया। तुमको उकसा कर तुमसे मंदिर तुड़वाये, मस्जिद तुड़वायीं, और इस बीच जो सबसे बड़ी चीज़ टूटी वो थी एक दूसरे का भरोसा। सच कहूं तो ये सब तुमने जानबूझ कर नहीं किया, क्योंकि तुम तो अंधे बने रहे। उन्होंने तुम्हें यारों दोस्तों से भिड़ा दिया, आंगन का बंटवारा करवा दिया, और तुम अंधे बने रहे। तुम्हें पता ही नहीं चला, किसी राजनीतिक पार्टी या किसी नेता से मोहब्बत कब जुनून बन गयी, जुनून से भक्ति और कब राजनीतिक पार्टी या विचारधारा के लिए यही भक्ति, कट्टरता के कगार पर पहुँच गयी।
तुम्हें एहसास भी नहीं हुआ और मोदी या बीजेपी को सपोर्ट करना, हिन्दू होने की या देश भक्त होने की निशानी हो गयी और कांग्रेस या किसी अन्य पार्टी को सपोर्ट करना मुसलमान और देशविरोधी पहलू बन गया। जैसा राजनीतिक पार्टियों ने तुम्हें बनाया, तुम वैसे बन गए। समाजवाद या वामपंथ जो इंसानी जज़्बातों पर बुनी हुई विचारधारायें थीं, तुमने उसमें भी राजनीति को घुसा दिया। विचारधारा तो छोड़ो, तुमने रंगों, जानवरों और शमशान-कब्रिस्तान को भी धर्म और राजनीति से पाट दिया।
तुम्हें चारों ओर असहनशीलता दिख रही है ना? हाँ दोस्त, असहनशीलता वाकई है, पर इसे पैदा करने में तुम भी ज़िम्मेदार हो। ज़रा अगल बगल गौर कर के देखो। तुम्हारी कट्टरता से किसी को डर लग रहा है, कोई बात कहने में डर रहा है कि जहां उसने कुछ बोला तहां उसपर भाजपाई या कांग्रेसी का ठप्पा लगा। जहां उसने किसी नेता या पार्टी की आलोचना की तहां उसे हिन्दू और मुसलमान बना दिया गया।
तुम्हें इन सबके बीच ये भी ध्यान नहीं रहता कि सोशल मीडिया या किसी सभा में, अपने दोस्तों और जानने वालों से बहस के दौरान तुमने जो अपने इंसान होने की गरिमा गिराई, उसमें तुम्हारी पीठ थपथपाने कोई भी नेता नहीं आने वाला, ना ही वो तुम्हारे लिए सरकारी व्यवस्थाओं को दुरुस्त करने वाला है, शायद उसे पता ही नहीं कि तुम मौजूद हो, जो उसकी पूजा करते हो, वो तो तुम्हें बेवकूफ भीड़ ही समझता है जिसे उल्लू बना कर वोट लेना उसका काम है और यकीन मानो, ये काम वो बखूबी कर रहा है।
किसी के दादा ने इसी देश में हल जोता है, किसी के पिता ने इसी देश में सब्ज़ियों की दुकान लगाई है और उसी को तुम बात बात सिर्फ इसलिए पाकिस्तान भेज देते हो क्योंकि वो मुसलमान है। अरे मई की किसी रात में तुमने भी लाइट कटने पर पसीने से तर बतर होते हुए व्यवस्था को कोसा है, तुमने भी तेल के बढ़ते दामों को देख कर सरकार को दुहाई दी है, तुमने भी सड़कों पर पानी से भरे गड्ढे में गिरने के बाद किसी नेता को गाली दी है..... और उसने भी शहर के सबसे प्रसिद्ध स्वादिष्ट व्यंजन को खाने के बाद अकसर कहा है कि ये तो मेरे शहर से बेहतर कहीं नहीं मिलता। तो फिर किस अधिकार से तुम उसे पाकिस्तान भेज देते हो?
ये ज़ुबान तुम्हारी नहीं, उन नेताओं की होती है जो तुम्हारे मुंह में अपनी ज़ुबान ठूंसते हैं।
तुम अपने दोस्तों को भी अब सावरकर की औलाद, मोदी के ग़ुलाम कह देते हो, मगर भूल जाते हो कि कभी किसी दौर में तुम दोनों साथ मिलकर एक ही युवती को पसंद करते थे, और अपनी पसंद पर खुश होते थे। तुम्हारे अंदर किसी नेता, या कमल के फूल के लिए जो नफरत है ना, वो तुम्हारी खुद की पैदा की हुई नहीं, दूसरे के दिमाग की उपज है जिसे फर्क नहीं पड़ता कि इसका तुम्हारे जीवन पर क्या असर पड़ेगा।
चुनाव पास आ रहे हैं दोस्त, सोशल मीडिया या अन्य मीडिया की करतूत को पहचानो। मीडिया का कुछ हिस्सा इस कैकई रूपी राजनीति की मंथरा है और ये दोनों एक दूसरे के पिछलग्गू! सोचने समझने की शक्ति पैदा करो, खुद के लिए सही गलत का निर्णय लेना तुम्हारा काम होना चाहिए, मीडिया या किसी सत्ता पर बैठे या सत्ता पाने के भूखे लोगों का नहीं। अगर पार्टियां गठबंधन कर सरकार बना सकती हैं तो हम गठबंधन कर सरकार के समीकरणों को बदल सकते हैं। किसी नेता या पार्टी के लिए अपने रिश्तों को ताक पर मत रखो क्योंकि किसी भी नेता को चाहने वाले हज़ार मिल जाएंगे पर तुम्हारा कोई खास तुमसे दूर गया तो नहीं मिल पायेगा। विश्वास करो, बार बार ये कहने से की 'थोड़ा रिसर्च कर के आओ फिर बात करो' वाले बयान से तुम खुद की नज़रों में ज्ञानी दिखते होगे पर असल बात तो ये है कि तुम भी नहीं जानते तुम किस दुराचार को न्योता दे रहे हो। किस पार्टी को वोट देना है वो तुम तय करो, पर अपने नाम के आधार पर नहीं, उनके काम के आधार पर क्योंकि तुम चाहे मोहन हो या मोहम्मद, देश तुम्हें ही बचाना है।
#आशुतोष

Wednesday, 16 May 2018

कोयल और बचपन

आज सुबह ऑफिस जाते वक़्त एक कोयल की आवाज़ सुनाई दी. दिल्ली आये हुए 2 साल से अधिक हो गए, कितनी ही बार सुबह ऑफिस जाने के लिए उठा हूँ पर कोयल की ऐसी मधुर आवाज़ आज से पहले यहाँ सुनने को नहीं मिली थी. यूँ तो आवाज़ मामूली सी ही थी, जैसे हर कोयल की होती है पर उस आवाज़ ने आज एक ऐसी याद को आँखों के सामने ला कर खड़ा कर दिया जो अपने में ही बहुत ख़ास है. उस याद का इस आवाज़ से कोई विशेष संबंध तो नहीं है पर अचेतन मन में कोयल की कूक उस याद से जुड़ी हुई है.

जीवन में मुश्किलों का सामना या तो डट कर किया जाता है या डर कर, मगर कुछ मुश्किलें ऐसी होती हैं जिसका सामना डट कर पर डरते-डरते करना पड़ता है. उन दिनों स्कूल जाना भी उसी मुश्किल की तरह था. ये उस समय की बात है जब स्कूल जाने से नफरत हुआ करती थी (बारहवीं तक आते-आते स्कूल से मोहब्बत हो जाती है <3). सुबह साढ़े पांच बजे मम्मी स्कूल जाने के लिए उठा देती थी. चेहरे पर मातम, आँखों में आँसू और मन में इतना गुस्सा मानो अपनी ही माँ ने धोखा दे दिया हो. पर उनसे सीधे ये कहा भी नहीं जा सकता था क्यूंकि तब गाल इतने कोमल हुआ करते थे कि थप्पड़ का एक स्पर्श उगते सूरज की लालिमा की भांति चेहरे पर उभर आता था. रोते, बिलकते बिस्तर से उठ कर रोज़ की दिनचर्या को शुरू करने के अलावा कोई और चारा भी नहीं हुआ करता था. उन दिनों मेरा सबसे बड़ा दुश्मन ट्रौली वाला था जो एक दिन पहले ही बोल कर जाता था की "मोर बहिन इनका जल्दी तैयार कराये दिया करौ, इनही के मारे बाकी बच्चनों के देर होई जात है." दिखने में मुझसे काफी लम्बा था और कैप्टेन व्योम (मिलिंद सुमन) जैसा लगता था इसलिए उससे ज़्यादा कुछ बोलने की हिम्मत नहीं होती थी. वैसे वो नहीं, शायद स्कूल का गेट वाला दुश्मन था, जो समय पर गेट बंद कर देता था या वो टीचर मेरे दुश्मन थे जो देर से आने पर बच्चों को एक-एक छड़ी तशरीफ़ पर रसीद करते थे. उस समय शायद हर कोई दुश्मन ही लगता था. खैर, ट्रौली वाला ठीक पौने सात बजे मुझे लेने आ जाता था इसलिए सारे कर्म उसी 60 मिनट में निपटाने पड़ते थे. चबूतरे पर ब्रश करते, अपने जीवन की 'परेशानियों' पर गहन विचार करते हुए रोज़ ये मन में आता था की आज कुछ ऐसा हो जाए की स्कूल न जाना पड़े. वहीँ ब्रश करते-करते सामने लगे बूढ़े नीम के पेड़ पर बैठी कोयल की कूक सुनाई देती थी. एक तो सर जल्दी उठने से वैसे ही भन्नाता था ऊपर से वो कोयल अपने साथी के साथ चिलान्ने का कम्पटीशन किया करती थी. बस उसी समय मन में ये ठान लिया जाता था की आज तो कुछ भी हो जाए स्कूल नहीं जाना है. फिर मिन्नतों का दौर शुरू होता था. मम्मी के स्वाभाव पर निर्भर करता था कि स्कूल न जाने के लिए आज अनुरोध करना है या गुस्सा करना है. मम्मी आज नहीं जायेंगे, स्कूल में कुछ पढ़ाई नहीं होगी, पेट दर्द कर रहा है, ट्रौली वाले ने कहा है कि अब वो नहीं आएगा, आदि जैसे कई तीर तरकश में से निकाले जाते थे लेकिन मम्मी पर इन तीरों का कोई असर नहीं होता था. बोलते-बोलते गले में कुछ गड़ता हुआ सा महसूस होने लगता था, ज़बान सूखने लगती थी तब मम्मी एक गिलास पानी दे देती थी और फिर से अनुरोध की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती थी. मम्मी टिफ़िन धोती रहती और बगल में खड़ा हो कर मैं उनको देख कर बस यही सोचता की आखिर मान क्यूँ नहीं रही है! कोयल की आवाज़ और तीखी मालूम होने लगती थी. फिर दिन गिने जाते थे की सन्डे कितने दिन बाद आएगा. तब ध्यान आता था की कमबख्त परसों ही तो रंगीन सपने दिखा कर मुझे काले अँधेरे में ढकेल कर गया है. उस समय साम, दाम, दंड, भेद का ज्ञात नहीं था फिर भी मन इन्हीं पैंतरों को अपनाने लगता था. साढ़े 6 होते होते दिल की धड़कन तेज़ होने लगती थी और ख्याल आता था कि वो जिन्न जैसा मुह लेकर आ ही रहा होगा. यूँ तो घरवालों ने मेरा नाम आशुतोष रखा था पर ट्रौली वाले को 'संतोस' नाम काफी पसंद था. वैसे मैं 'संतोसी' था भी, उसके जैसी शकल के इंसान को प्रतिदिन देखना संतोषी व्यक्ति की निशानी थी. सारे पैंतरे अपना लेने के बाद गुस्सा दिखाने के अलावा कोई और रास्ता नहीं नज़र आता था. जूते उतार कर, आँगन में मम्मी के पास जाकर ये एलान कर देता था की आज स्कूल नहीं जायेंगे, बस कह दिए! 'कह दिए' मुह से पूरा निकल भी नहीं पाता था कि 'इसरो' के रॉकेट की गति से एक थप्पड़ आता था और गाल पर चट्ट! से पड़ता था. रोते-रोते दरवाज़े पर नज़र पड़ती थी तो ट्रौली वाला मंद मुस्कान लिए मुझे जल्लादखाने ले जाने के लिए खड़ा रहता था. अकेले रहता तो थप्पड़ आई गयी बात लगती पर वो अपने साथ ट्रौली के बाकी बच्चों को भी लेकर आ जाता था, जो बाद में सारे रास्ते पूछते हुए जाते थे की तुम्हारी मम्मी ने तुम्हें क्यूँ मारा? निकलते-निकलते मम्मी प्यार भी कर लेती थी और मैं हारे हुए सिपाही की तरह सर नीचे गिराए ट्रौली की ओर चल देता था. कोयल की कूक दूर तक सुनाई देती रहती थी...

आज जब उस कोयल की आवाज़ सुनी तो ऐसा लगा जैसे 'बचपन' उस डाल पर बैठा हो, और मुझसे पूछ रहा हो, "क्यों.......अब रोना नहीं आता?"

#आशुतोष

Friday, 13 April 2018

मुर्दा मर्द

तुम सरकार के नुमाइंदे होगे, तुम किसी राजनीतिक दल के पक्षधर होगे, तुम किसी धर्म के प्रचारक होगे, तुम गरीब होगे, तुम दलित होगे....
पर मैं तुम में से किसी से भी मुखातिब नहीं हूँ! मैं सिर्फ एक इंसान से अभी बात कर रहा हूँ....तुम इंसान तो हो ना? अगर नहीं, तो इसके आगे मत पढ़ना, तुम्हें समझ नहीं आएगा और अगर हाँ....तो अब तक चुप कैसे हो?
मैं इंसान हूँ, मगर मैं मर चुका हूं...खोखला हूँ अंदर से...सड़ चुका हूँ... कीड़े लग रहे हैं मुझमें... पिस्सू जानते हो? वही वाले कीड़े... सफेद, छोटे, रेंगने वाले कीड़े! मैं गल रहा हूँ, खत्म होने वाला हूँ....मगर क्यों?
क्योंकि मैं जीवित नहीं हूँ, मैं लाश हूँ! ज़िंदा मगर खोखली, कीड़े लगी लाश।
मैं कभी गर्व करता था, हज़ारों योनियों में जन्म लेने के बाद इंसानी रूप में पैदा होने पर। मैंने, कुत्तों, सुअरों, केचुओं, पिस्सुओं, जुओं को खुद से हीन प्रजाति का जानवर माना था। पर मैं कितना गलत था। मैं कुत्तों के बदन पर चलने वाली किलनी से भी हीन हूँ। अब गर्व करने को बचा ही क्या है! मैं इंसान तो रह नहीं गया। चारों ओर यही तो है। जरजर समाज, दो कौड़ी की परंपराएं और हवस से भरी आत्मा।
8 साल...महज़ 8 साल की उम्र, जिसमें सौभाग्य प्राप्त बच्चे माँ के आंचल में और पिता के कंधों पर खेलते कूदते बड़े होते हैं, उस उम्र में एक मासूम बच्ची को, कुछ दरिंदों ने, अपनी भूख मिटाने के लिए इस्तेमाल किया और फिर उसकी निर्मम हत्या कर दी।
इंसान कहते हैं वो खुद को, और उसके ऊपर से मर्द!
अब उन्होंने छोड़ा ही क्या है हमारे लिए, 'मर्दों' के लिए...
आओ मिल कर मुंह छुपाते हैं। वो जैसे मरने के बाद ढक दिया जाता है ना, वैसे ही...
माफ करना आसिफा, अफसोस है मुझे, मर्द मुर्दा बन चुका है!
#आशुतोष

Tuesday, 10 April 2018

एक अनजान व्यक्ति

तेज़ रफ़्तार से गाड़ियां धुआं उड़ाते हुए निकल रही थीं।  हॉर्न का शोर था और उमस भरी रात थी। वक़्त तो ज़्यादा नहीं हुआ था, यही कोई 9 बजे होंगे। नोएडा की सड़कें धीरे धीरे शांत होती जा रहीं थीं। जो लोग सड़क पर दिख रहे थे वो या तो फुटपाथ पर ही अपनी ज़िंदगी गुज़ारने वाले इंसान थे या माचिस के डिब्बों में अपनी ज़िंदगी काटने वाले वो रोबोट थे जो 9-10 घंटे काम कर के अपने रिचार्ज सेंटर लौट रहे थे जिससे अगली सुबह फिर काम पर जा सकें।
मैं अपने एक जिगरी दोस्त से मिल कर अपने माचिस के डिब्बे में लौट रहा था। फुटपाथ पर मूर्तिकार बल्ब की रौशनी में अपनी मूर्तियां बनाने में लगे हुए थे। जिस फुटपाथ को आम लोगों के चलने के लिए बनाया गया था उसपर भगवन बैठे अपना आकार सुनिश्चित करवा रहे थे। थोड़ी दूर सड़क पर चलने के बाद गाड़ियों के गति से डर कर मैंने फुटपाथ पर ही चलना ठीक समझा।
उसी फुटपाथ पर कुछ दूर एक बाइक का मिस्त्री अपनी दुकान बंद कर रहा था। दुकान से थोड़ा सा आगे एक व्यक्ति फुटपाथ पर उकड़ू बैठा अपने चेहरे को अपने दोनों हाथों में छिपाये हुए था। दूर से मैंने उसे नज़रंदाज़ कर दिया और तेज़ क़दमों से आगे बढ़ता रहा। जब उसके कुछ नज़दीक से गुज़रा तो मैंने ध्यान दिया कि वो व्यक्ति रो रहा है!
ओह! वो पथराई आँखें, बिलखता चेहरा, आंसू से गीली हो चुकी हथेली, मानो उसका सारा गम उसकी किस्मत की लकीर के रास्ते होता हुआ सूखी धरती को तर कर रहा हो।
मैं उसके पीछे से हो कर गुज़रा और कुछ दूर हट कर कुछ क्षण के लिए खड़ा हो गया। दूर से आती कार की रौशनी उसके चेहरे और पड़ रही थी। उम्र कोई 40-45 की थी। कपड़ों से निम्न वर्ग का साधारण सा व्यक्ति लग रहा था पर उसका दुःख, उसके आंसू, रुंधे गले का स्वर...वो असाधारण था। वो पागल नहीं था, वो शराबी नहीं था, वो जज़्बाती था...वो आंसू नहीं थे, जज़्बात थे जो उसकी आँखों से बह रहे थे।
किस बात का गम होगा उसको, किस दुःख को झेला होगा उसने, क्या उस दुःख को झेलनी की हैसियत थी उसकी?
दुःख को झेलने की हैसियत!
हाँ हैसियत! वो हैसियत जो अमीरी गरीबी से परे है, धर्म और जाती से भी परे है। हर किसी की औकात नहीं होती जो दुःख को झेल जाए। क्योंकि जिनमें उसे झेलने का बूता होता है ना वो उस तड़प को महसूस करते हैं, उनके गर्म आंसू रूह की वो आवाज़ होते हैं जो दूसरे नहीं समझ सकते।
उस आदमी को देख कर एहसास हो गया कि पैसे के मामले में शायद उसकी हैसियत कम हो, दुःख के मामले में हमसे उसकी हैसियत बहुत ज़्यादा है। मैं उसे कुछ देर वहीं खड़ा देखता रहा।
फिर शून्य खयालों से मुड़ा और अपने माचिस के डिब्बे की ओर जाने लगा। एक और कार की रौशनी उस व्यक्ति की ओर पड़ी और फिर वो परछाई अँधेरे में गुम हो गयी।

Tuesday, 3 April 2018

तुम और तुम्हारा फेमिनिज़्म

सिर्फ औरत हो इसलिए इज़्ज़त करें?
हां, सिर्फ इसलिए
पर क्यों, फिर कहाँ गयी बराबरी के हक़ वाली दलीलें? कहाँ गया तुम्हारा फेमिनिज़्म?
तुम्हारा मतलब है कि अब मुझे इज़्ज़त पाने के लिए भी फेमिनिस्ट बनना पड़ेगा? मतलब जिसके पास तुम्हारे बराबर का हक़ होगा उसे तुम इज़्ज़त नहीं दोगे?
तुम दलीलों की बात करते हो! उन दलीलों को तुम कान से सुन कर, मल निकालने वाले रास्ते से बाहर निकाल देते हो, इसलिए उन दलीलों का कोई अर्थ नहीं है।
तुम्हें वो महज़ दलीलें लगती हैं? एक बार औरत की कमीज़ के अंदर हवसज़दा नज़रों से नहीं, इज़्ज़त की नज़र से झांको।
क्या हो अगर तुम्हें दिन रात, आते जाते, हर रास्ते, हर चौराहे, हर गली में दो आंखें घूरती रहें। तुम खुद को ऊपर से नीचे तक परखो, कपड़ों से बाहर निकलते हर अंग को ढक लो, फिर भी तुम्हें सामने से आते, और पीछे निकल जाते लोग देखें। तुम खुद को कोसो, हैरान रहो, की आखिर मुझमें ऐसा क्या है जो इतना घूरा जा रहा है। सुबह सो कर उठने से रात को सोने जाने तक तुम एक अभिनय करते रहो, जिसमें हर कोई निर्देशक बन कर ये बताता रहे कि ऐसे मत बैठो, वैसे मत उठो, अपना शरीर छुपाओ नहीं तो किसी और को तुम्हें देख कर समस्या होने लगेगी।
क्या हो अगर चंद रुपये ज़्यादा कमाने से तुम्हारा कोई अपना ही तुमसे ईर्ष्या करने लगे?
उस डर से कैसे निपटोगे की कहीं तुमसे किसी मर्द का ईगो ना हर्ट हो जाये?
उस शर्म को कहां छुपाओगे जब निक्कर पहने एक छोटे बच्चे को, जो अभी ठीक से गिनती भी नहीं सीख पाया है, मर्दानगी का अनुभव कराते हुए सिर्फ इसलिए तुम्हारे साथ भेजा जाए कि वो तुम्हारी रक्षा करेगा?
इस कटाक्ष से कैसे बचोगे की हर लड़की एक जैसी है, तुम्हारा चूतिया काट कर किसी और से शादी कर लेगी? कैसे बताओगे की नहीं तुम वैसे नहीं हो?
जब समाज का हवाला दे कर तुम्हारे अपने ही तुम्हें किसी अपने से अलग कर दें, वो अपना जिसके साथ तुम हम-बिस्तर सिर्फ इसलिए नहीं हुए क्योंकि तुम्हारा रिश्ता एक बिस्तर के चार कोनों से अधिक विस्तृत है, तब तुम क्या करोगे और क्या करोगे जब किसी अनजान के बिस्तर में सिमटने के लिए तुम्हें छोड़ दिया जाए?
क्या हो अगर तुम्हें चंद रुपयों के लिए जलाया जाए, वो भी उनके हाथों जो तुम्हारा परिवार हुआ करते हैं।
मैं इज़्ज़त की भीख नहीं मांगती, वो मेरा हक़ है, क्योंकि जितना तुम इस समाज, इस दुनिया के हो, उतनी मैं भी हूँ!
तुम दलीलों की बात करते हो? तुम खुद को किसी अदालत का वकील बना कर मेरे ऊपर आरोप मढ़ते हो और फिर खुद ही जज बन कर उसकी सज़ा सुना देते हो। मेरी दलीलों को तुमने मेमने का मिमियाना समझा है, और खुद को वो कसाई, जिसे सिर्फ अपनी जेब को गर्म करने का ध्यान है, उस कराहते शोर से कोई मतलब नहीं।
मुझे इसलिए इज़्ज़त मत दो क्योंकि मैं कह रही हूं, ना इसलिए इज़्ज़त दो की मेरी व्यथा ऐसी है। मुझपर दया भी मत खाओ, ना ही हास्य की वस्तु बनाओ। मुझे इसलिए इज़्ज़त दो की मैं तुम जैसी ही हूँ.... मैं तुम ही हूँ...

Tuesday, 12 December 2017

दाढ़ी



यूं ही कभी एक दोस्त ने बात बात में कह दिया कि तुम्हारी दाढ़ी देख कर दाढ़ी रखने की इंस्पिरेशन मिलती है। यूं ही कभी परिवार वालों ने मज़ाक मज़ाक में कह दिया कि जानवर लगने लगे हो, दाढ़ी काट लो। यूं ही कभी किसी आदरणीय ने गुस्से गुस्से में कह दिया कि दाढ़ी साफ हो जानी चाहिए नहीं तो समझे रहना।

बहुतों ने आलोचना की, बहुतों ने तारीफ, मगर गौर करने वाली बात है कि मेरे अपने मन ने इसे कैसे अपनाया है।
दाढ़ी मेरे लिए आलस की निशानी नहीं है। महीने में एक या दो बार बाल कटवाने जाता ही हूँ। सिर्फ इशारा करना होता है और दाढ़ी साफ हो सकती है। 

दाढ़ी मेरे लिए स्टाइल स्टेटमेंट भी नहीं है। मैं स्टाइल बदलते रहने वाले लोगों में से हूँ। डेथ टू रेज़र, लौंग लिव बियर्ड के दौर से ब्रेक द बियर्ड दौर को अपना सकता हूँ।


र मैंने अपने लिए दाढ़ी चुनी है। अपने जीवन में इसे जगह दी है। अपने अस्तित्व में इसे भी एक छोटा सा कोना दिया है क्योंकि ये दाढ़ी मेरे वजूद का हिस्सा है। ये दाढ़ी ना मेरी पहचान है, ना ही मैं इसे अपनी पहचान बनाना चाहता हूँ, ये दाढ़ी मेरे जीने का तरीका है।

जब मन में काम की उलझन हो, दिमाग ने सोचना बंद कर दिया हो, तब महज़ दाढ़ी के स्पर्श से ही दिमाग और मन सरपट भागना शुरू कर देते हैं।
ठुड्डी से एक इंच नीचे लटक रही दाढ़ी को उंगलियों से घुमाने की खुशी, ग़ालिब की महबूबा की उलझी लटों को सुलझाने से ज़्यादा खुशनुमा एहसास दे जाती है।
किसी की गंभीर बातों को मूंछों पर ताव देते हुए सुनने से लगता है जैसे बात दिमाग से होते हुए सीधे दिल में उतर रही है।
नहाने के बाद कंघी से बाल झाड़ने के साथ दाढ़ी को झाड़ने से जो पूर्णता का अनुभव होता है, उसे शब्दों में बयां नहीं किया जा सकता।
किसी और के द्वारा आपकी दाढ़ी को घूरे जाने से जो गर्व का एहसास होता है, वो अद्वितीय है।


मैं इस बात के खिलाफ हूँ कि दाढ़ी से ही मर्द की असली पहचान होती है, या मूंछ नहीं तो कुछ नहीं। इन बातों से दाढ़ी के लिए जो इबादत का पहलू है वो छिछला दिखाई पड़ने लगता है।


दाढ़ी मेरे लिए शिव के सर पर आसीन चंद्रमा के समान है, किसी सागर में छोटे से टापू के समान है, किसी गुलाबी होंठ के नीचे मासूम से तिल के समान है, किसी ब्राह्मण के श्वेत जनेऊ के समान है। दाढ़ी अंत का प्रतीक नहीं, पूर्णता का प्रतीक है। दाढ़ी महज़ मर्द होने का प्रतीक नहीं, मर्द के पुरषार्थ का प्रतीक है।
आप पुरुष हैं और आपकी दाढ़ी नहीं उगती या आपको क्लीन शेव रहना पसंद है, तो मेरी इज़्ज़त आपके लिए कम नहीं होगी क्योंकि वो आपके जीने का तरीका है। वैसे ही दाढ़ी मेरे लिए मेरे जीने का तरीका है।


#जियो_और_जीने_दो
#आशुतोष