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Friday, 21 February 2014

..........और मियां जावेद गिर पड़े! (भाग-3)

                                                  लेखक: आशुतोष अस्थाना


उन्होंने अपने आप को सँभालते हुए कहा, “तुम दोनों को गाड़ी धीमे चलानी चाहिए थी, मुझे अभी बहुत दर्द होरहा है, सिर्फ तुम्हारी वजह से!” उन्होंने गुस्से में लेकिन फिर भी थोड़ा धैर्य से बोला. “हाँ साले देखा कितना दर्द होरहा है भाई साहब को! चल अब निकाल पैसे इनको डॉक्टर को दिखाना होगा”, एक आदमी ने गुस्से से कहा. “अंकल मेरे पास पैसे नहीं हैं, आप प्लीज़ बुलादीजिये भैया को वो देदेंगे!”. फिर से फ़ोन की परेशानी सामने आई, तभी चाय वाले ने जावेद मियां के फट चुके नए कुरते की जेब की ओर देखा और अचानक से बोला, “भैया देखा ई भाई साहब के पास हई मोबाइल!” सब ने जावेद मियां की तरफ देखा और बिना उनसे पूछे उनके जेब में से मोबाइल निकाल लिया. “हेल्लो! भैया जल्दी यहाँ आजाइए कुछ रुपये लेके, जल्दी, जल्दी!!!” उस लड़के ने डरी हुई आवाज़ में उस चौराहे का नाम बताया और फ़ोन रख दिया. जावेद मियां के कुछ समझ में ही नहीं आरहा था की आखिर होक्या रहा है, वो बस सहमे से सब कुछ देख रहे थे. बिचारे सोचने लगे जब बेग़म को पता चलेगा की नया कुर्ता फट गया है तब तो वो उनकी जान लेलेगी, दिन भर कुछ न कुछ सुनाती रहेगी, अब तो उनका कुछ नहीं होसकता.
तभी उनकी नज़र उनकी प्यारी मोटरसाइकिल पे पड़ी, बिचारी सड़क के एक कोने में पड़ी थी, उसकी हेडलाइट टूट चुकी थी, और उसमें भारी नुकसान हुआ था. उसको देखते ही उन्हें और गुस्सा आने लगा, तुरंत उन्हें उन लड़को को थप्पड़ मारने की इच्छा हुई! जैसे ही लड़को की तरफ ध्यान से देखा तो गुस्से को दबा के शांत होगए सोचने लगे की दिखने में तो दोनों उनसे ज़्यदा बलवान हैं, कही पलट के मार दिया तो चेहरा भी ख़राब होजायेगा. अब माहौल थोड़ा ठंडा होरहा था और सब उस लड़के के भाई का इंतज़ार कर रहे थे. किसी को ख्याल ही नहीं था की जावेद मियां को अस्पताल लेजायें या उनका हाल पूछ लें. उनमें से एक सज्जन को अब पहले की तरह मज़ा नहीं आरहा था तो उन्होंने आग फिर से भड़काना शुरू कर दिया. “बताइए साहब ये कोई तरीका होता है, रास्ते पे चलना दुश्वार होगया है, अरे मैं बिलकुल बगल में खड़ा था अगर गाड़ी थोड़ा सा बगल में गिरती तो मुझे भी चोट आजाती! इन सालों को तो छोड़ना ही नहीं चाहिए”. थप्पड़ वाले भाईसाहब ने फिर बोला, “अरे छोडेंगे कैसे अब सज़ा तो मिलेगी ही इन लोफरों को साले सड़क तो अपने बाप की समझते हैं ना!”

थोड़ी देर में उस लड़के का भाई भी आगया, अपने भाई की गलती को ढकने के लिए और मामला खत्म करने के लिए उसने अपनी गाड़ी से उतारते ही माफ़ी मांगना शुरू कर दिया था. जावेद मियां को उठने में तकलीफ होरही थी तो वो चाय के ठेले के पास ही पड़ी एक टूटी बेंच पे लेट गए और आँखें बंद करके अपनी किस्मत को कोसने लगे. “शिराज़ ने गोश्त बनवाया होगा, शीरमाल भी होगी, पेप्सी भी मंगवाया होगा, सब खराब होगया” जावेद मियां ने बुदबुदाते हुए अपने आप से कहा. उन लड़कों में और उन चार महापुरुषों में सॉरी और गाली का दौर चालू था. बात-बात में उन लड़कों की माताओं और बहनों को याद कर लिया जारहा था. समझ में नहीं आरहा था की दुर्घटना जावेद मियां के साथ हुई थी या उन चार सज्जनों के साथ. खैर, ऐसा प्रतीत होरहा था मानो वो जावेद मियां के सबसे बड़े शुभचिनतंक हों. “वो बिचारे भाईसाहब इतने आराम से जारहे थे और ये तुम्हारे भाई ने उनको गिरा दिया!”. एक आदमी ने लड़के के भाई से बोला. “सर देखिये मैं माफी मांगता हूँ इन लोगों की तरफ से लेकिन सच में हमारे पिता जी की तबियत खराब है, तो आप लोग कुछ रुपये लेलीजिये और उन भाईसाहब को डॉक्टर को दिखा दीजिये और हम लोगों को जाने दीजिये” लड़के के भाई ने स्थिति को संभालते हुए कहा. सब ने इस बात पे सहमति जताई और पांच हज़ार रुपये मांगे. “पांच हज़ार! इतने रुपये क्यों?” लड़के के भाई ने चौंक कर बोला. “उनकी हालत देखो बिचारे उठ नहीं पारहे हैं, गाड़ी देखो पूरी चूर-चूर होचुकी है, इतना तो लगेगा ही”. काफी राय-बात होने पे चार हज़ार रुपये तय हुए. लड़के के भाई ने वो रुपये थप्पड़ वाले आदमी के हाथ में दिए. शायद अब उनके हाथ की खुजली खत्म होगई थी. उन लड़को ने अपनी मोटरसाइकिल उठाई और चले गए. लड़के का भाई भी चला गया. सबके जाने के बाद और समस्या सुलझने के बाद वो चरों शुभचिंतक जावेद मियां के पास गए. जावेद मियां की न जाने कब आँख लग गई थी. उन्होंने जावेद जी को उठाने की ज़हमत नहीं की. एक दूसरे को चालाकी भरी नज़रों से देखा और वहा से रफूचक्कर होगए. कुछ देर बाद जब जावेद साहब की आंख खुली तो देखा वहा कोई नहीं था. चाय वाला अपने ठेले के बगल में एक ईटे पे बैठा गाड़ियों को आता-जाता देख रहा था. “भैया वो सब लोग कहा गए?” जावेद मियां ने धीरे से पूछा. “अरे ऊ लोगन तो गए! और जो पैसा मिला था वोहू खागए!”

जावेद मियां चाय वाले को देखते रहगये. अब उन्हें समझ नहीं आरहा था की पहले बेग़म जी से डांट खाने घर जाये या ठंडा गोश्त खाने दोस्त के यहाँ जाए. जावेद मियां ने सोचा की ऐसी हालत में फटे कपड़ो के साथ वो दावत में तो नहीं जासकते इसी लिया उन्होंने बेग़म की डांट से पेट भरने का फैसला किया. अब वो पैर हिला पारहे थे, तो बिचारे धीरे से उठे और खाली होचुकी चाय की दुकान को निहारा. हिम्मत करके गाड़ी तक गए और उसे उठा के लुढ़काते हुए चल दिए.
 

Wednesday, 19 February 2014

..........और मियां जावेद गिर पड़े! (भाग-2)


                                                       लेखक: आशुतोष अस्थाना 

हमेशा की तरह जावेद मियां घर से निकलते ही पान की दुकान पे गए, एक पान वहीं पे खालिया और एक बाद के लिए रख लिया. अपनी गाड़ी से भी वो बहुत प्रेम करते थे जब उसपे बैठ के वो कही निकलते तो अपने आप को किसी राजा से कम नहीं समझते थे. शिराज़ का घर कुछ दूर था इसीलिए वो गाड़ी थोड़ा तेज़ चला रहे थे. पवन का आनंद लेते, कुछ पुराने गीत गुनगुनाते वो सफ़र का मज़ा लिए चले जारहे थे.

रविवार का दिन होने के कारण सड़कों पे भीड़ कुछ कम थी इसीलिए वो इस बात से खुश थे की उन्हें जाम में नहीं फसना पड़ा. वो अपनी मंजिल के पास पहुँच गए थे. आगे रास्ते में एक चौराहा पड़ा, लेकिन भीड़ कम होने की वजह से वहा कोई पुलिसवाला नहीं था. चौराहे के थोड़ी दूर से ही जावेद जी ने देख लिया था की दूसरी ओर से कोई गाड़ी नहीं आरही है फिर भी उन्होंने अपनी रफ़्तार बिलकुल धीमे करली. वो चौराहे को पर करने ही वाले थे की अचानक बाईं सड़क से एक मोटरसाइकिल पे तीन छात्र उसी तरफ आए उनकी रफ्ता बहुत तेज़ थी, जावेद मियां उनको अपनी ओर आता देख चीखे, “अरे!”, लेकिन बहुत देर होचुकी थी.....धड़ाम!!! दोनों गाड़ियाँ एक दूसरे से टकरागाई.

आसपास के सब लोग भागे और जावेद मियां और उन तीन छात्रों को उठाने लगे. सभी ने जावेद मियां को उठा के पास की चाय की दुकान पर बैठाया. वो दर्द से कराह रहे थे, लग रहा था मानो पैर की हड्डी टूट गई हो! घुटने से खून निकल रहा था और कोहनी से हाथ तक छिल गया था. तभी वहा मौजूद उन भले मानसों ने उन तीन लड़को को दबोच लिया. “साले तीन सवारी चला रहा है!” एक आदमी ने चिल्ला कर गाड़ी चलने वाले लड़के से बोला. तड़ाक!!....तेज़ी से एक चांटा उनमें से एक लड़के के गाल पे पड़ा. भीड़ में होने का यही फायदा होता है, बहती गंगा में कौन हाथ धोले पता ही नही चलता है. “लोफर हैं साले तीन के तीनों!” एक और सज्जन ने बोला. तड़ाक!!!....दूसरा थप्पड़ पड़ा. “अंकल प्लीज़ छोड़ दीजिये, गलती होगई, वो अंकल आते हुए दिखे नहीं”, एक लड़के ने डरते हुए बोला. तभी उनमें से एक लड़का डर के भाग निकला. अब तो वहा जितने लोग थे उन दोनों लड़कों को किसी आतंकवादी की तरह पकड़ लिया. कोई कालर पकड़ा था, कोई हाथ पकड़ा था, कोई बाल पकड़ा था और वो दोनों लड़के बस यही बोल रहे थे की गलती होगई. “अंकल मैं पढ़ने में बहुत अच्छा लड़का हूँ, मैं घूमने-फिरने वाला नहीं हूँ, प्लीज़ छोड़ दीजिये!” उनमें से एक लड़का रोने लगा.

चाय की दुकान पे चाय उबलती जारही थी और वहा सबका गुस्सा उबलता जारहा था. “अरे साले बड़े हरामी लौंडे हैं, छोड़ेंगे नहीं इनको, साले हवा की तरह गाड़ी चला रहे हैं अभी वो आदमी मर जाता तो!!” उन सज्जन की बातों से सबको ध्यान आया की जावेद मियां तो अभी वोही बैठे दर्द से बेचैन हैं. “आप ठीक तो हैं भाई साहब?”, चाय वाले ने पूछा. जावेद मियां के पैर में दर्द होरहा था, बस सर हिला के बता दिया की नहीं ठीक हैं. फिर से सबका गुस्सा भड़क गया, तड़ाक!!!....एक और थप्पड़! इनही सज्जन ने पहले भी दो बार हाथ साफ़ किया था, इस बार उस लड़के ने देख लिया की कौन मार रहा है तो उन्होंने अपने थप्पड़ को जायज़ दिखाने के लिए बोला, “बताइए साहब, ये साले आज कल के लड़के, पढ़ना-लिखना है नहीं बस गाड़ी उठा के दौड़ते रहते हैं, इन दोनों को तो जेल में डलवादेना चाहिए!”, “नहीं-नहीं अंकल, आप कहिये तो मैं आप के पैर छु लूँ, प्लीज़ हम दोनों को जाने दीजिये, देखिये हम दोनों को भी कितनी चोट आई है”, उस लड़के ने अपनी कोहनी से निकलते खून को दिखा कर कहा. तभी दूसरे लड़के ने भी अपना दुखड़ा सुनाना शुरू किया, “अंकल मेरे पापा की तबियत बहुत ख़राब है उन्हें हॉस्पिटल देखने ही हम तीनो जारहे थे बस इसीलिए इतनी तेज़ चलाना पड़ा, आप चाहे तो मेरे भाई को फ़ोन करके पूछ लीजिये”. “हरामखोर अभी इस चौराहे पे बाप को मार रहे हो अगले पे माँ को मारदोगे, इससे अच्छा तुम्ही मर जाते सूअर!!”

गालियों की बारिश होती रही और वो लड़के सफाई देते रहे. ऐसे ही एक घंटा गुज़र गया. अब भीड़ काफी कम होगई थी, जावेद मियां के लिए लड़ने वाले सिर्फ चार ही लोग बचे थे, जिनमे वो थप्पड़ वाले महाशय अभी तक थे, शायद हाथ की खुजली अभी कम नहीं हुई थी. चाय की चुस्की और कुश्ती एक साथ दर्शको को मनोरंजित कर रही थी. “चल साले तैं पुलिस के पास चल, अब बस बहुत बकवास कर लिए!”, एक आदमी ने बोला. “अंकल मैं आप से सॉरी बोल रहा हूँ माफ़ कर दीजिये, आप मेरे भाई से बात कर लीजिये सच में मेरे पापा की तबियत खराब है!”, “चल अच्छा लगा फ़ोन, देखे क्यूँ मर रहा है तेरा बाप, लगा फ़ोन जल्दी!” तभी उस लड़के ने दूसरे से मोबाइल माँगा, लेकिन उन दोनों के मोबाइल में फ़ोन करने के लिए पैसे नहीं थे. तब उनलोगों ने वहा खड़े आदमियों से फ़ोन माँगा लेकिन उन्होंने भी यही बहाना बना कर मना करदिया. “अंकल अच्छा मैं उन अंकल के पैर छु के माफ़ी मांग लेता हूँ”. उनमें से गाड़ी चलाने वाले लड़के ने जावेद जी की तरफ इशारा करके कहा. जावेद मियां सर झुकाए बैठे थे. “अंकल प्लीज़ माफ़ कर दीजिये हम दोनों से बहुत बड़ी गलती होगई, देखिये मुझे भी चोट लगी है, आप कहें तो मैं आपको डॉक्टर के पास ले चलता हूँ लेकिन प्लीज़ अंकल हमे पुलिस के हवाले मत करिए.” उन दोनों ने रोते-रोते कहा. अब सबकी नज़रे जावेद मियां की तरफ टिक गई.

(शेष कहानी अगले भाग में...)

Monday, 17 February 2014

..........और मियां जावेद गिर पड़े! (भाग-1)

                                                लेखक : आशुतोष अस्थाना

(इस कहानी के सभी पात्र और घटनाएँ काल्पनिक है जिसका किसी भी व्यक्ति से कोई संबंध नहीं है. अगर इसका संबंध किसी भी व्यक्ति से हुआ तो उसे मात्र एक संयोग कहेंगे)

“बेग़म!”..... “अलीना!”..... “अरे कहा हो रिज़वान की अम्मी?” जावेद मियां ने ज़रा गुस्से से बुलाया. “अरे आरही हूँ थोड़ा सबर करिए!” अलीना ने रसोईं से चिल्ला के कहा. आते ही अलीना उनके ऊपर मनो तलवार लेके चढ़ गई, “क्या हुआ क्यों खून जला रहे हो? कौन सी बाढ़ आरही है जो इतना चीख रहे हो! तुम्हारे ही निगलने के लिए खाना बना रही हूँ!” अलीना ने आँखे लाल करके बोला. बेग़म जी का ऐसा रौद्र रूप देख कर जावेद मियां कुछ सहेम से गए और शांत होकर बोले, “वो..वो...”, “वो..वो.. ही करते रहोगे या बोलो गे भी कुछ, मुझे और भी बहुत से काम करने हैं, खाली नहीं हूँ मैं तुम्हारी तरह, जल्दी बताओ क्यों गला फाड़ रहे थे?” अलीना ने और अधिक क्रोधित होकर बोला. अब तो बिचारे जावेद मियां भीगी बिल्ली की तरह दुबक के बिस्तर के एक कोने में बैठ गए थे. थोड़ा हिम्मत जुटा के और गले को साफ़ करते हुए बोले, “वो मेरा नया सफेद कुर्ता नहीं मिल रहा है, क्या तुमने कहीं देखा है, मतलब अगर ना देखा हो तो कोई बात नहीं तुम वैसे भी आज कल इतना व्यस्त रहती हो ,नहीं देखा होगा, तो...तो...मैं सोच रहा था अगर तुम ढूंड दो तो मैं वही पहन लूँगा, नहीं तो कोई बात नहीं”. बेग़म जी ने आँखें तरेरते हुए जावेद मियां को ऊपर से नीचे देखा और दूसरे कमरे में गईं और जावेद मियां का चमचमाता नया सफेद कुर्ता लेती आई. पती जी ने झुकी हुई नज़रों से कुर्ता लेलिया और तयार होने लगे और अलीना कुछ बडबडाते हुए रसोईं में चली गई.

जावेद जी ने आईने में देखा और उस पल को याद करने लगे जब उन्होंने बोला था, “क़बूल है!”, काश उस वक़्त वो गूंगे होजाते तो एक मासूम जिंदगी शहीद होने से बच जाती. खैर, निकाह के तीस साल बाद और एक बेटा और दो बेटियों के होजाने के बाद ये सब बातें सोचना उन्हें शोभा नहीं देता लेकिन वो बिचारे भी आदत से मजबूर थे, अब तीस साल से पड़ी आदत इतनी आसानी से तो जाती नहीं! जावेद मियां को रिटायर हुए एक साल होगये थे, अपनी आधी जिंदगी नोट गिनते-गिनते बितायी थी, सरकारी बैंक में क्लर्क जो थे. बड़े ही सरल और सच्चे इन्सान थे और यही कारण था कि अबतक एक पुरानी मोटरसाइकिल से चलते थे. तीनों बच्चों की शादी कर चुके थे जो अब दूसरे शहर में रहा करते थे. कद छोटा होने के बावजूद इरादों में ऊंचाई थी. रंग काला होते हुए भी चरित्र साफ़ था और मन की तरह आवाज़ भी कोमल थी. छोटी सी मूंछ थी लेकिन उसी को ताव देने में बड़ा गर्व मेहसूस किया करते थे. बढ़ती उम्र का असर उनके चेहरे पे तो अधिक नहीं दिखता था लेकिन उम्र के साथ तोंद भी बढ़ती जारही थी. पान खाने के शौक़ीन थे लेकिन इधर-उधर पीक थूकने पे बेग़म से अक्सर डांट खाजाया करते थे.

तैयार होने के बाद बड़े ही शान से अपने आपको शीशे में निहारने लगे. उस सफेद कुर्ते में वो निखर रहे थे. बड़े दिनों से वो अपने पुराने साथियों से नहीं मिले थे, आज उन्ही में से एक के घर दावत पे जाना था. निहारते-निहारते जब अचानक से पीछे मुड़े तो देख कर डर गए. अलीना उनके पीछे खड़ी थी और भौएं सिकोड़ के उन्हें घूर रही थी. “माशाल्लाह! बड़े हसीन लग रहे हो. किसी से निकाह करने जारहे हो क्या!”, “ऐसी मेरी किस्मत कहाँ!” जावेद जी ने चिल्ला कर, शेर की तरह दहाड़ते हुए.....अपने मन में कहा! “अरे शिराज़ ने आज दावत पे बुलाया है” जावेद जी ने फुसफुसाते हुए कहा. “दोस्तों के यहाँ घूमने की फुर्सत है इतना नहीं होता की मुझे भी कही घुमालाओ, कही सैर पे चलो, किसी होटल में खाना खिलादो! लेकिन मेरी तरफ तो ध्यान ही नहीं जाता.” जावेद मियां को लगा कही बेग़म जी जाने के लिए मना न करदें तो तुरंत उनके कंधे पे हाथ रख कर बोले, “चिंता क्यों करती हो, बस इसी हफ्ते हम चलेंगे कहीं”. अलीना खुश होगई लेकिन ख़ुशी दिखाया नहीं और बोली, “रहने दो तुम, बस बोलते हो. अच्छा अब जाओ नहीं तो देर होजाएगी तुम्हे और जल्दी आना ये नहीं की बात करना शुरू किये तो दुनिया भूल गए”. “अब दो बजे तो घर से निकल रहा हूँ, थोड़ी देर तो रुकना ही पड़ेगा नहीं तो शिराज़ सोचेगा की बस खाने ही आया था, वैसे मैं आजाऊंगा शाम के पांच बजे तक, तबतक तुम थोड़ा आराम करलेना”. अलीना ने हंस कर उन्हें विदा किया और अन्दर चली गई, जावेद जी ने मोटरसाइकिल स्टार्ट की और सोचने लगे की उनकी बेग़म इतनी भी ख़राब नहीं है. पती-पत्नी का रिश्ता इन छोटी-छोटी लड़ाइयों से और मज़बूत होता है, चाहे वो जितना भी लडें जितना भी चिल्लाए लेकिन उनके मन में एक दूसरे के लिए अताह प्यार होता है, वो ऐसी मज़बूत डोर से बंधे होते है जिसे किसी भी तरह की तकरार तोड़ नहीं सकती. रिश्ते नीरस से लगने लगते हैं अगर उनमे लड़ियों का मसाला और रूठने-मनाने का तड़का ना लगे.
 
(शेष कहानी अगले भाग में....)
 

Tuesday, 4 February 2014

An evil called ‘cancer’................by: ASHUTOSH ASTHANA


Cancer as we know is one of the most deadly diseases which have gravely affected mankind since its origination. It is one of the most fatal diseases known to man and we are still finding solutions to eradicate it. Cancer is known medically as “malignant neoplasm”, is a broad group of diseases involving unfettered cell progression. In cancer, cells divide and grow uncontrollably, forming malicious tumors, and invading nearby parts of the body. The cancer may also spread to more aloof parts of the body through the lymphatic system or bloodstream. All tumors are not cancerous; benign tumors do not invade neighboring tissues and do not spread throughout the body. There are over 200 different known cancers that affect humans.

It is not so simple to understand because researchers have not been able to find everything about this deadly evil. Its dangerous effect can be understood with these survey findings:- in 2008 about 12.7 million cancers were diagnosed and in 2010 the case was worst about 7.98 million people died because was cancer. Thus cancer has become a leading cause of death in the developed world and in developing country it has become a second leading cause of death. It is estimated there will be almost 22.2 million new cases diagnosed annually worldwide by 2030. Cancer is has deep roots in our society because of this researcher Robert A. Weinberg, “if we lived long enough, sooner or later we all would get cancer.” Not only in the recent years, cancer has been affecting us since early ages and we get its record from Circa in Egypt in 1600 BC in which Edwin Smith Papyrus describes cancer of breast.

As we can see it is prevalent from a long time, it is important for the 21st century man to shoulder up his responsibility to fight against cancer. Thus few things are very important among them “cancer hospital planning” is a must. It is very important for the government as well as the hospital owners to buckle up for the future problems of cancer for an effective cancer hospital planning. It is very important for the hospitals to grow their clinical operations in maximum places, enhance research to eradicate this evil and educate the masses about the do’s and don’ts of cancer.

The second important need in the field of cancer eradication is “oncology facility planning”. For this research is must in the field of oncology. Disease-based cancer research should be promoted and trans disciplinary research across the field of cancer biology should also be promoted. The third and most important part is “cancer program development”. For this purpose there should be a development in scientific programs in Breast and Brain tumors and also center for cancer drug development should be made. There should be unconventional efforts in population intervention studies and primarily a unified cancer training program should be started at every level of the society.

 

Thus after analyzing all the aspects of cancer it is important to look in this matter seriously.  In September 2011, the United Nations General Assembly held a high-level meeting on non-communicable diseases to talk about the threats stood to low- and middle-income countries. It can be noticed from the above arguments and suggestions that it is not easy to tackle this evil but we have to do something or else the world has to kneel down before this deadly creature called “cancer”.

Wednesday, 29 January 2014

Thank God you are not alive Mr Gandhi! ............by ASHUTOSH ASTHANA


January 30th 1948 is a day which no Indian can overlook in the calendar. A day when in actual terms the earth stood still, a day when mankind took its last breath and a day when the whole country wailed because the father took an eternal depart from his children. Mohandas Karamchand Gandhi a great barrister and the saviour of our country who saved us from the ruthless Britishers took an eternal depart to the other world on this gloomy day.
He always fought for justice, truth and furtherance of mankind with his lethal weapon of non-violence and truthfulness. He was one of the bravest people the world has ever seen and he always taught the mankind to live a peaceful life by maintaining peace in this world and yes, that man gave us freedom. After 66 years of his death Mahatma Gandhi is still remembered in our country but is this remembrance of any importance?

His birth anniversary is celebrated throughout the country, national flag is unfurled on government buildings, schools and colleges are given a day off and most importantly 2nd October is observed as a ‘dry day’…. A nice initiative by the government to give respect to the Father of the Nation but wait a second! A beer shop opens furtively and at a double price supply the need of a customer. He abuses the shopkeeper for the hiked price, then abuses the government for such rule and then abuses the ‘birthday boy’ for being born on that day! In a survey conducted by The Tribune, Chandigarh in year 2006 the team found that many vendors sold liquor in Durgi, Sarbha Nagar, BRS Nagar, Kochar Market and many other parts of the city. The worst part was that the shops were illuminated more on the eve of 2nd October to increase the sales and the banner of one of the shops displayed a notice which read, “Vend would remain closed on October 2 in view of Dassehra”. No one objected on such a notice, not even the Excise Department. The shopkeepers were happy that the last minute sale was high. This maddening scene can also be seen in other parts of the country. A student wakes late in the morning and enjoy the day out with friends in an expensive restaurant, but he doesn’t know the reason for the day off. He heard the teacher saying last day that due to Gandhi Jayanti, school will be closed tomorrow but he didn’t bother to know who is Gandhi, the first reaction was, “phew! A holiday…”

  
Once Mahatma Gandhi said, "I will give you a talisman. Whenever you are in doubt, or when the self becomes too much with you, apply the following test. Recall the face of the poorest and the weakest man or woman whom you may have seen, and ask yourself, if the step you contemplate is going to be of any use to him or her. Will he or she gain anything by it? Will it restore him or her to a control over his or her own life and destiny? In other words, will it lead to swaraj freedom for the hungry and spiritually starving millions? Then you will find your doubts and yourself melt away."- (One of the last notes left behind by Gandhi in 1948, expressing his deepest social thought). These words are worth thinking but does this practice apply in the present scenario when about 27 crore people live below poverty line in our country. When such a huge population is poor will it be feasible for us to recall a particular face. Everyday many underprivileged people are dying and a new line of underprivileged are being born in this country, rich are getting richer and poor are getting poorer so my point is that in a country where millions of people die in earthquakes, tsunamis or epidemics and no billionaire help them with a penny so merely recalling their faces is not enough. If you were present today Mr Gandhi, even you would have got confused with their faces because every person you will meet today is dying of hunger and suffering from this disease called ‘poverty’!

We do not leave any chance to remember and praise this great person. He is still loved by all and I think the robbers love him the most because they are so obsessed with collecting his photographs on the currency notes that no one else. Sanjay Dutt was seen doing Gandhigiri in his successful flick. He spread the fever of Gandhism among the youth. He was seen following the path of truthfulness in the movie but later Dutt was sent behind the bars for illegal possession of weapons….. where was the Gandhi follower gone! And the Gandhigiri was then nowhere to be seen….

Mahatma Gandhi was shot to death by Nathu Ram Godse on this January day 66 years back. He became the biggest enemy of the country. Before him about 6 attempts were made till 1934 to kill Gandhi but Gandhi’s name was written on Godse’s bullet. Nand Lal Mehta filled the FIR againt Godse for murdering his hero. With ‘Hey Ram’ as his last word, Mahatma left this world. Godse was a murderer but think the other way…. He freed the most honest person of the world from the country of cheats yet to come.

Thanks to Godse he saved Gandhi from a severe heart attack which he would have experienced after seeing the Godhra riots. Thanks to Godse for saving the Mahatma from getting a nervous breakdown which would have got after seeing the ‘dirty politics’ of this country. Just think for a while, what would have happened to the person who always taught ‘Satya’ as the road to success when he would have seen the CWG or 2G graft in the country. He could not have made eye contact with Kalmadi or Raja….

The present condition of the country doesn’t allow much to say about it….. I would only say, Thank God you are not alive Mr Gandhi!   

Thursday, 16 January 2014

अकेला डॉक्टर......भाग-4

                                                लेखक : आशुतोष अस्थाना


पता नहीं क्यों उस वक़्त मेरा बहुत मन हुआ की मैं उनसे जाके मिलूं लेकिन फिर मैंने सोचा की वो उनका निजी मामला है मैं क्यों जाके पूछूं, उन्हें जब क्लिनिक खोलनी होगी तब खोलेंगें और इनही विचारों के साथ मैं घर लौट गया. लगता है उस दिन मेरा उनसे मिलना निश्चित था क्युंकि जैसे ही मैं घर गया मेरी माता जी ने मुझे दावा लाने के लिए भेज दिया. आज मन में उत्सुक्ता थी डॉक्टर साहब से मिलने की. मैंने घडी में समय देखा, 8 बज रहे थे तो मैं तुरंत निकल गया घर से ये सोच के की कही वो दुकान बंद ना कर दें. वहा कोई मरीज़ नहीं था जब मैं गया तो मैंने बहार से ही बोल, “अंकल”,
कोई उत्तर नहीं......
“अंकल!”                                                                                              फिर कोई उत्तर नहीं...........                                                                              मैंने सोचा शायद उनकी आँख लग गई होगी तो मैं अन्दर चला गया. मैंने देखा डॉक्टर साहब कुछ सोच रहे थे और कुर्सी पे टेक लगाये छत की ओर एक टक देख रहे थे. मैंने फिर बोला, “अंकल!”, तो वो चौंक गए और मेरी ओर देख कर बोले, “अरे तुम!”, “जी अंकल, वो मैं दावा लेने आया था” मैंने बड़े ही शांत स्वर में बोला. मेरा ध्यान उनकी आँखों पर गया जो थोड़ी भीगी थीं लेकिन मैंने अनदेखा कर दिया.
उन्होंने मुझसे बीमारी पूछी और मैंने सब बता दिया. पर्चे पे लिखने के बाद वो दावा बनाने चले गये. कुछ बहुत ही अजीब होरहा था! उन्होंने ना मेरा हाल पूछा और नाही अपनी कोई बात कही........कहा गया वो कभी न छुप होने वाला डॉक्टर! मैं भी उनके पीछे बाहर वाले कमरे में गया और मरीजों वाली कुर्सी पे बैठ गया. वो मरे सामने बैठ के दावा बना रहे थे लेकिन न मेरी ज़बान चली और नाही उन्होंने कुछ बोला. वो बहुत अजीब सी शांति थी जो चुभ रही थी. गाड़ियों का बजता हॉर्न भी उस शांति को नहीं भेद पारहा था. आखिर मैंने हिम्मत करके उनसे पूछा- “आप कैसे हैं अंकल?”, तबतक मेरी दावा बन चुकी थी. उसको पन्नी में रखते हुए उन्होंने बड़े ही नीरस से स्वर में बोला, “मैं ठीक हूँ बेटा”. उस ‘ठीक हूँ’ को सुन के कोई बच्चा भी बता सकता था की वो ठीक नहीं हैं! उन्होंने मुझे दावा दी और बोले-“घर में सब कैसे हैं?”, मैंने सबकी बात बताई और कथा के निमंत्रण के बारे में बताये लेकिन वो कुछ नहीं बोले. फिर मैंने उनसे थोड़ी और हिम्मत जुटा के पूछा, “आप क्लिनिक नहीं खोल रहे थे काफी दिनों से, तबियत तो ठीक है ना आपकी?”, अचानक से उनकी आँखों में आंसु आगये और उन्होंने कहा, “मेरी पत्नी का निधन होगया है, बस इसीलिए मैंने क्लिनिक नहीं खोली थी.” मैं सुन कर दुखी होगया लेकिन अपने आप को संभाला. मुझे नहीं समझ आरहा था की अब मैं क्या बोलूं और कुछ पल के लिए हम दोनों शांत होगये थे. मुझे उनके लिए बहुत अफ़सोस होरहा था, वो बिचारे बिलकुल अकेले थे. पहले माँ फिर पत्नी, अब वो किसके सहारे इस बुढ़ापे में रहेंगे. मैं अपने चेहरे पे आए दया के भावों को उन्हें नहीं दिखाना चाहता था इसलिए मैं अपनी दावा की ओर देखने लगा. तभी उन्होनें उन भरी हुई आँखों से मेरी ओर देखा, मेरे अन्दर अब और हिम्मत नहीं थी की मैं उनको देखूं, शायद मेरी स्थिति वो समझ गए थे तो उन्होंने मुझसे नज़र उठा के घडी की ओर देखा. साढ़े 9 बज गये थे. घडी देख के वो अचानक बोल उठे, “अरे काफी दिर होगई है, राधा इंतज़ार कर....”, इतना बोल कर वो छुप होगये. मैंने तभी उनकी ओर देखा, आंसू की एक बड़ी सी बूंद उनके गाल से होते हुए नीचे गिरी. फिर कुछ देर शांत रहने के बाद उन्होंने बोला, “अच्छा बेटा अब मुझे घर जाना है” और ये बोल के उन्होंने एक बहुत गहरी सांस ली.

हम दोनों क्लिनिक से बहार निकले, उन्होंने ताला लगाया और मुझसे बोले, “खूब मन लगा के पढो बेटा”. इतना कह के वो दूसरी ओर देखने लगे शायद इस बार वो अपने आंसू मुझे नहीं दिखाना चाहते थे. मैं बिना हिले, बिना पलके झपकाए वोही खड़ा था.
फिर उन्होंने अपनी पुराणी स्कूटर स्टार्ट की और धुंए का बड़ा सा झोंका मेरे चेहरे पे आया लेकिन पता नहीं मुझे क्या होगया था उस वक़्त, तबभी मेरी आंखें नहीं झपकी! चलने से पहलें उन्होंने एक बार अपनी क्लिनिक की ओर देखा और चले गए. उस बड़े शहर की बड़ी सड़क पर बड़ी-बड़ी गाड़ियों की भीड़ में वो अकेला डॉक्टर कुछ ही देर में खो गया........  

Monday, 13 January 2014

अकेला डॉक्टर.......भाग-3

                              लेखक : आशुतोष अस्थाना
उस दिन के बाद से मैंने प्रण लिया की मैं उनसे दावा लेने नहीं जाऊंगा. अक्सर मैं जब अपने घर की गली से निकलता तो डॉक्टर साहब मुझे अपनी क्लिनिक के बहार खड़े हुए दिख जाते और मैं किसी तरह वहा से छुप कर निकलता. कभी वो मुझे मरीजों की कुर्सी पे बैठकर अख़बार पढ़ते दिख जाते तब मैं दूर से ही समझ जाता की कारोबार कुछ ठंडा चल रहा है.

कारोबार तो ठंडा था ही लेकिन वो दिन भी बहुत ठंडा था जब मुझे मेरा प्रण तोड़ना पड़ा और परिवार में से ही किसी की दावा लेने उनके यहाँ जाना पड़ा. अन्दर घुसते ही मैंने देखा की २-३ मरीज़ बैठे हैं तो मैं बाहर ही आके खड़ा होगया और गुज़रती हुई गाडियों को देखने लगा. तभी डॉक्टर साहब की आवाज़ पीछे से आई तो मैंने मुड़ के देखा और देख कर थोड़ा सा चौंक गया, डॉक्टर साहब खुद दावा बना रहे थे और तभी मैंने ध्यान दिया की कम्पाउण्डर बाबु नहीं दिख रहे हैं. डॉक्टर साहब दावा बनाते-बनाते एक मरीज़ से बातें कर रहे थे तभी उनका ध्यान मेरी ओर गया. “अरे बेटा तुम कब आए? कहो कैसे आना हुआ आज?” डॉक्टर साहब ने नीचे दावा की ओर देखते हुए कहा. मैं उनकी ओर एक टक देख रहा था और यही सोच रहा था की आज ये क्यों दावा बनारहे हैं, तभी उन्होंने मुझे फिर से देखा. मुझे देख कर वो थोड़ा मुस्कुराए और बोले, “कहा खोगये? अच्छा ये....वो क्या है ना की कम्पाउण्डर जी ने कोई और कम शुरू करदिया है तो उन्हें यहाँ से जाना पड़ा, अब कोई नहीं है इसीलिए मैं ही करले रहा हूँ”. मेरे मुह से कोई शब्द नहीं निकले और मैं बस मुस्कुरा के रहगया. दावा बनाते-बनाते ही उन्होंने ने तकलीफ पूछी और दूसरों की दावा बनाने के बाद मेरी दावा बनाने लगे. मुझे बाज़ार से कुछ सामान भी खरीदना था तो तबतक मैं वो लेने चला गया. थोड़ी देर बाद जब मैं वापिस आया तो मेरी दावा तैयार थी और एक मरीज़ और आचुका था तो मैंने अपनी दावा ली उन्हें नमस्ते किया और लौट आया. आज बहुत ख़ुशी होरही थी कि मुझे उनके किस्से नहीं सुनने पड़े लेकिन थोड़ा ख़राब लग रहा था जिसकी वजह मैं नहीं समझ पाया.

अब डॉक्टर साहब के दिन और लम्बे होने लगे थे. पहले कम्पाउण्डर जी रहते थे तो थोड़ा मन लगा रहता था भले ही वो उनसे बात नहीं करते थे लेकिन अब, अब तो घड़ी की सुई ने जैसे चलना ही बंद करदिया था. पहले डॉक्टर साहब अपनी क्लिनिक सुबह 11 बजे से रात के 9 बजे तक खोला करते थे लेकिन कम्पाउण्डर जी के जाने के बाद वो कभी भी न तो समय से क्लिनिक खोलते थे और ना ही बंद करते थे. डॉक्टर साहब अब घर से दो पत्रिकाएँ, अख़बार और अपना चहेता, छोटा सा रेडियो लाया करते थे. लेकिन इन सभी चीजों से दोपहर तक ही उब जाते, फिर शुरू होता एक लम्बा अकेला दिन जिसमें वो अकेला डॉक्टर कभी हँसता, कभी सोचता, कभी सोता तो कभी अपना बचपन याद करके रो देता और अगर ये सब नहीं तो अपने आप को किसी उधेड़ बुन में डालने की कोशिश करता ताकि समय बीते लेकिन ये समय भी उनका साथ नहीं देरहा था. कभी-कभी ऊपर वाले की कृपा होजाती तो मरीज़ भी आजाते थे.

 मुझे काफी दिन होगये थे उनके यहाँ गए, जब कभी मैं उस ओर से निकलता था तो उनकी क्लिनिक की तरफ नज़रे चली ही जाती थी लेकिन बिना कोई विशेष ध्यान दिए चला जाता था. घर में कोई कथा होनी थी तो मुझे डॉक्टर पाण्डेय को निमंत्रण देने की जिम्मेदारी सौंपी गई. शाम को जब मैं खाली हुआ तो उनको निमंत्रण देने उनके क्लिनिक गया लेकिन क्लिनिक बंद थी. मुझे कुछ अजीब सा मेहसूस हुआ कि शाम के 6 बजे ही वो घर कैसे चले गए! लेकिन मैंने एक राहत की साँस ली, और सोचा की शायद मैं बहुत किस्मत वाला हूँ जो उनकी असीमित बातें नहीं सुन पाया. अगले दिन कथा थी तो किसी कम से मैं बाज़ार गया था जब क्लिनिक पड़ी तो सोचा तभी कथा के लिए कह दूँ लेकिन उस दिन भी क्लिनिक बंद थी तब मैंने बगल वाले दुकानदार से पूछा डॉक्टर साहब के बारे में लेकिन उसे कुछ नहीं पता था तो मैं घर चला गया.
देखते-देखते कई दिन गुज़र गए लेकिन डॉक्टर साहब ने क्लिनिक नहीं खोली और हर आम मरीज़ की तरह मैंने भी जानने की कोशिश नहीं की लेकिन एक दिन मैं उस तरफ से गुज़र रहा था तो मैंने क्लिनिक खुली देखी....

(शेष कहानी अगले भाग में.....)